मेरा आँगन

मेरा आँगन

Thursday, December 15, 2011

ओ मेरी मैया !



-रामेश्वर काम्बोज ’हिमांशु’
बात सुनो  ओ मेरी मैया !
ला दो मुझको ,सोनचिरैया
उसको दाना ,रोज़ खिलाऊँ
जीभर उससे ,मैं बतियाऊँ
उड़ना सीखूँ,मैं भी उससे
उसको मैं हँसना सिखलाऊँ
-0-

Thursday, November 10, 2011

आगत का स्वागत


welcome to the world
1-भावना कुँअर-
नन्हीं सोनपरी ने
जब धरती पर आकर
आँखे खोली
सभी परिवार जनों के चेहरों पर
खुशियों की लहर दौड़ी
दद्दू ने तो नन्हीं परी के लिए
फटाफट प्यारी सी रचना भी रच डाली,
जिसमें उमड़ा है दद्दू का अथाह स्नेह,
दादी की ममता,माँ का वात्स्ल्य
और पिता का दुलार।
नन्हीं सी परी के लिए
हमारी ओर से
ढेरों ढेरों रों रों रों शुभकामनाओं के साथ
इस धरती पर स्वागत है
काम्बोज जी के समस्त परिवार को भावना की ओर से हार्दिक अनगिनत बधा
याँ!!.
-0-
2-सोनपरी
-कमला निखुर्पा

हाथों में लिये
जादू की नन्ही छड़ी
सितारों जड़ी
लो आई सोन परी
.छूना ना कोई
उजरी निखरी है।
हो ना वो मैली.
है निर्मल कोमल
ये सोनपरी
सपने अपने- से
.मुट्ठी में भरे ,
अधखुली अँखियाँ,
मुसकाई है
जाने क्यों निंदिया में
दुलारी ये सोनपरी.
-0-
3-डॉ हरदीप कौर सन्धु
सोनपरी के जन्म पर ढेरों शुभकामनाएँ !
दादा -दादी की दुलारी
माता -पिता की प्यारी
नन्ही सोनपरी को बहुत सा प्यार!
कितना सुन्दर तोहफा मिला है हमारी सोनपरी को
दादा के दिल में पगता मोह शब्द बनकार इस रचना में उतरा है !
इसी भाव -परम्परा में मेरे हाइकु-
1
दादा-दादी की
है अब ये दुनिया
प्यारी गुड़िया
2
जन्मी बिटिया
खुशबू ही खुशबू
आँगन खिला
 3
कौन है आया
है किसका उजाला
जन्मी बिटिया
 4
गोद में नन्हीं
माँ के आँचल में ज्यों
खिली चाँदनी
 5
नन्ही -सी परी
है पिता की दुलारी
जग से प्यारी
 6
नन्ही को पिता
जब गोद उठाए
दुनिया भूले
 7
बिटिया जन्मी
हृदय -धड़कन
ज्यों माँ की बनी
 -डॉ हरदीप सन्धु
-0-
4-रचना श्रीवास्तव
  दादा जी बन
हिमांशु जी प्रसन्न
दादी भी खुश
पाई जो  नन्ही परी
छोटे से हाथ
गुलाबी पंखुड़ियाँ
मन को मोहे
अधरों में कियाँ की
मीठी आवाज
माँ की नर्म गोद में
परी मुस्काई
नई दुनिया भाई  
माँ -पिता संग
बाबा दादी को देख
मन हर्षाया
प्रभु को यहीं पाया
धन्य हुई मै
आपकी गोद पा के
स्नेह- जल से
खुद को भिगोकर
गुलाबी  रंग
कमरे को सजाना
गुलाबी ड्रेस
मुझको पहनाना
थोड़ी  बड़ी हो
सबको  दौड़ाऊँगी
दादा को घोडा,
पापा को बना हाथी
करूँ सवारी।
सपनो से भरी है-
बंद  है मुट्ठी 
मेरे, कुछ आपके
भर दूँगी मै
घर में घडकन
नन्हे पैरों से!
जन्म देने के लिए
शत शत नमन !!  

-0-
5-ॠता शेखर ‘मधु’
कितनी प्यारी
आई राजदुलारी
दादी चहके
दादा बोले ह़ँसके
ये मेरी 'सोनपरी'।

नव जीवन
का,करके सृजन
माँ है हर्षित
पाए नन्हीं गुड़िया
पिता का आलिंगन।

जग ने जाना
सोनपरी का आना
झूमी धरती
खिला है उपवन
बसी सबके मन।

   -0-
6-प्रियंका गुप्ता
बाँहों में आके
नन्हीं परी मुस्काई
खुशियाँ लाई
-0-
7-सीजा
दादा दादी की पोती आई
मम्मी पापा की बिटिया आई
दो भा
यों की बहन है आई
घर की सारी खुशियाँ लाई
आते ही घर में धूम मचाई

मम्मी जी पापा जी, मेरी और से गुडिया को बहुत बहुत प्यार देना
मिहिर मयंक की और से भी प्यार देना
अंजना को मम्मी बनने पर बधाई
-आपकी बेटी सीजा
 -0-
8-देवी नागरानी
रामेश्वर भाई आपको बधाई!

खुशियाँ लाई
लक्ष्मी घर में आई
तुम्हें बधाई
*
लाड़ो का आना
दादा औ दादीजी ने
पावन माना
*
आप भी खाओ
मोतीचूर के लड्डू
हमें खिलाओ
बहुत शुभकामनाओं के साथ
-0-
9-मंजु मिश्रा , कैलिफ़ोर्निया
बेटियां तो भोर का सूरज होती हैं, उनके आने से जीवन में ख़ुशी की धूप भर जाती है.  बिटिया को जीवन में सदैव सर्वश्रेष्ठ ही मिले ऐसी कामना है!
 तुम !
भोर का सूरज,
तुम आयीं तो 
तुम्हारे साथ 
ज़िंदगी की 
सुबह आई 
 तुम
एक नन्हा सा फ़रिश्ता 
तम्हे गोद में ले कर,
माँ-पापा , दादा-दादी
सब के अरमान 
हुए पूरे !

तुम
वक़्त के हाथों मिला हुआ 
एक ख़ूबसूरत तोहफा,
तुम्हारे आने से 
ज़िंदगी सज गयी 

हार्दिक स्नेह सहित 
मंजु मिश्रा , कैलिफ़ोर्निया
-0-
10-रवि रंजन
दादा की गोद
पौत्री की किलकारी
स्वर्णिम पल
हाइकु चोका ताँका
आशीर्वादों का ताँता|
बधाई और शुभकामनाएँ|

-0-
11-डॉ सुधा गुप्ता
1
दिल्ली है सूनी
भैया हिमांशु बिना
धीरज धरा
शुभागता-स्वागत
हर्ष-कमल खिला ।
2
सुख छलका
मन में न समाया
इतना पाया
मिली ख़ुशख़बरी
आई है सोनपरी ।
3
जगी है आशा
पूरे परिवार में
खिली जो कली
सुख की वर्षा हुई
वर्षों की साध फली ।
4
आँखों की ज्योति
मन -सीपी का मोती
हीरक-कनी
शब्द अधूरे पड़े
शोभा है ऐसी घनी ।
-0-

12-मुमताज टी एच खान
1
नन्हीं गुड़िया
चिड़िया -सी चहके
खिले फूल -सी
खुशबू-सी महके
आपके आँगन में ।
2
संग लाई है
वो क़िस्मत भी ऐसी
परियों -जैसी
ज़न्नत से वो माँग
देखे सारा जहान
-0-
14/11/2011

Saturday, November 5, 2011

दुनियादारी सीखी गुलाब ने


दुनियादारी सीखी गुलाब ने

          सुबह की पहली किरण के साथ गुलाब की नन्ही-सी कली ने अपनी आँखें खोल कर धीरे से बाहर झाँका। ओस की बूंद उसकी आँखों में गि र पड़ी तो कली ने गबरा कर अपनी पंखुड़ियाँ फैला दी। अपनी लाल-लाल कोमल पंखुड़ियों पर वह खुद ही मुग्ध हो गई। थोड़ी देर इधर-उधर का नज़ारा देखने के बाद उसे कहीं से बातें करने की आवाज़ सुनाई दी। घूम कर देखा तो जूही और बेला के फूल आपस में बतिया रहे थे। गुलाब ने भी उनसे बातें करनी चाही,"बड़े भाइयों,"मैं भी आपसे बात करना चाहता हूँ...।"
"तुम बेटे...अभी बच्चे हो," जूही -बेला के फूलों ने विनोद से झूमते हुए कहा,"थोड़ी दुनियादारी सीख लो तब शामिल होना हमारी मंडली में...।"
वे फिर आपस में बातें करने लगे तो गुलाब ने सिर को झटका दिया,"हुँ...बच्चा हूँ...। कैसी बोरियत भरी दुनिया है...। क्या मेरा कोई दोस्त नहीं है...?" दुःखी होकर उसने सिर झुका लिया।
"दुःखी क्यों होते हो दोस्त," कहीं से बड़ी प्यार-भरी आवाज़ आई,"हम तुम्हारे दोस्त हैं न...। तुम्हारे लिए हम पलकें बिछाए हुए हैं। आओ, हमारे दोस्त बन जाओ...।"
गुलाब ने सिर उठा कर चारो तरफ़ देखा। कौन बोला ये? फिर अचानक काँटों को अपनी ओर मुख़ातिब पा उसने मुँह बिचका दिया,"दोस्ती और तुमसे...? शक्ल देखी है अपनी...? क्या मुकाबला है मेरा और तुम्हारा? न मेरे जैसा रूप, न कोमलता...और उस पर से मेरे लिए पलकें बिछाए बैठे हो...। न बाबा न, तुम्हारी पलकें तो मेरे नाजुक शरीर को चीर ही डालेंगी।"
गुलाब की कड़वी बातों ने काँटों का दिल ही तोड़ दिया। पर उसे बच्चा समझ उन्होंने उसे माफ़ कर दिया और मुस्कराते रहे पर बोले कुछ नहीं।
"पापा,देखो! कितना प्यारा गुलाब है...।" तीन वर्षीय बच्चे को अपनी तारीफ़ करते सुन कर गुलाब गर्व से और तन गया।
           ऐसे ही प्यारे लोग मेरी दोस्ती के क़ाबिल हैं, गुलाब ने सोचा और काँटों की ओर देख कर व्यंग्य से मुस्करा दिया।
"पापा, मैं तोड़ लूँ इसे? अपनी कॉपी में इसकी पंखुड़ियाँ रखूँगा।" बच्चे की बात सुन गुलाब सहम गया,"ओह! कोई तो मुझे तोड़े जाने से बचा लो...। आज ही तो मैने अपनी आँखें खोली हैं। अभी मैने देखा ही क्या है?" गुलाब ने आर्त स्वर में दुहाई दी,"मैं क्या बेमौत कष्टकारी मौत मारा जाऊँगा?"
"नहीं दोस्त! काँटों की गंभीर आवाज़ सुनाई दी,"तुम चाहे हमें दोस्त समझो या न समझो, पर हम तुम्हारा बाल भी बांका नहीं होने देंगे...।"
इससे पहले कि बच्चे का हाथ गुलाब तोड़ पाता, काँटों ने अपनी बाँहें फैला दी। बच्चा चीख मारता हुआ, सहम कर वापस चला गया। गुलाब ने चैन की साँस ली।
थोड़ी देर बाद बगीचे के फूलों के हँसी-ठहाकों में गुलाब और काँटों की सम्मिलित हँसी सबसे तेज़ थी।
गुलाब अब दुनियादारी सीख चुका था...।
-0-

Thursday, November 3, 2011

मेरे खोए हुए हीरे

किसी के हीरे खो जाएँ तो कितना दु:ख होगा! और अगर मिल जाएँ तो कितनी खुशी होगी! धरती जितने बड़े आँचल में भी नहीं समाएगी! आँसू भी उमड आएँगे । मेरे दो जुड़वा छात्र आयुश्री और अनिरुद्ध, जिनका कभी 1994 में कक्षा एक में प्रवेश हुआ था , छह साल मेरे सम्पर्क में रहे । उसके बाद बिछुड़ गए आज चीन में पढ़ाई कर रहे हैं । इनका पत्र दे रहा हूं                                                                                                      -namashkar sir...aapko itne dino baad pakar badi hi khushi huyi......mujhe bilkul vishawas hi nahi ho pa raha hai ki aapko aakhirkar itni mahnat k baad maine dhoond hi liya..wo bhi ek sociel networking site par.....aapko main yaad hu ye sochkar man ko badi hi shanti mili....kyuki meri jaisi chhatra aapko anginat baar mili hongi par aapke jaisa sikshak mujhe jeevan me kahi nahi mila.....mere bachpan ko sunhara banane me aap logo ki bahut yaadein judi huyi hai...
k.v.chirimiri k purane teachers jab bhi yaad aate hai to jaise aankho me paani bhar aata hai....kuch dino pahle Moghe madam ko pakar bhi meri yahi dasha huyi thi
main aapko yakeen nahi dila sakti ki main aaj kitni khush hu.... i am very very happy sir
maine aapki kavitao ki kitabo ko aaj bhi sanjokar rakha hai....
main abhi china me hu...apni medical ki parayi poori kar rahi hu..
aakhiri saal chal raha hai....aniruddh bhi mere sath yahi hai....
hum sath me parh rahe hai.....papaji hume 2 saal pahle hi chhorkar ishwar k paas chale gaye hai....par unke sankalp, mummy ki kathor mehnat aur aap sabhi k aashirwad ki wajah se humlog itne aage tak pahuch sake hai....yakeen mainiye aapke jane k baad humlogo ne aapka contact no. dhoondne ki bahut koshish ki par aap nahi mile....par aaj bhagwanji ki daya se aap mil hi gaye....apna contact no. plz send kar dijiyega...mujhe bahut khushi hogi....

Wednesday, November 2, 2011

कच्चे साँचे -पक्के साँचे



दीपावली के दिन  फुलझड़ी पटाखे तो छोड़ने के लिए मिले ही । इससे बढ़कर मिहिर और मयंक को मिल गए साँचों के साथ क्ले और रंग भी । फिर नींद आती भी तो कैसे ! मम्मी -पापा सो रहे थे कि दोनों भाई चुपचाप सुबह चार बजे जाग गए । क्ले निकाली , साँचे सँभाले। नीला और पीला रंग मिलाकर हरा रंग भी तैयार कर लिया । नींद को बिदा करके इन दोनों पंचवर्षीय बच्चों ने क्या किया ? आप भी देखिए !


Thursday, October 13, 2011

The Soldier.


Anviksha Srivastava 
class 5th,age   10 years
school : Plainview  Elementary  School,  Ardmore Oklahoma ,        America         

रक्षक फ़ाउण्डेशन  के द्वारा आयोजित  ''गौरव  गाथा '''प्रतियोगिता में १० साल की अन्वीक्षा को  इस कविता के लिए  सांत्वना पुरस्कार मिला है .
नन्ही अन्वीक्षा की कविताएँ और कहानियाँ डैलस की पत्रिका फन एशिया और आर्डमोर के पुस्तकालय की पत्रिका , ऑनलाइन कृत्या और लेखनी  में प्रकाशित होती रहती हैं

The Soldier. 

Anviksha Srivastava 

I walk alone ,
so others
 
can walk with
their father.
Mom puts out
3 plates but,we're
only two.
I celebrate my
holidays alone,
so others
can share
their happiness
together.

I practice sports alone,
so others can practice
with their father
I sleep uncuddled,
so others can
cuddle with their father
everybody listens to the news
in concern
but, I
listen for my father.
I am proud that he is there
 
so the nation can sleep fearless
 
because, my dad is a sold
ier. 
-0-

Thursday, October 6, 2011

रंगोली-युशरा ख़ान

मेरी भानजी ( मुमताज और श्री टी एच खान की छोटी बेटी) युशरा ख़ान ने अपने विद्यालय की रंगोली प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है । अवलोकन करके आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा ।
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Tuesday, September 20, 2011

शिक्षक -चोका



[शिक्षार्थी के लिए हर दिन शिक्षक दिवस है । ज्ञान की देवी सरस्वती शिक्षक के माध्यम  से ही हमारे हृदय तक पहुँचती है ।स्कूल या कॉलिज ही नहीं , जीवन में वह शिक्षक हमें किसी भी मोड़ पर, किसी भी रूप में मिल सकता है । आवश्यकता है उसको पहचानने की ।
- ऋता शेखर मधु
तेजस्वी थे वो
विलक्षण थी सोच
प्रखर वक्ता
जीवंत अभिव्यक्ति
थे वो हमारे
द्वितीय राष्ट्रपति
राधाकृष्णन
आदर्श शिक्षक भी
जन्मदिवस
बना सम्मान दिन
हमारे लिए
शिक्षक दिवस भी
मेरे शिक्षक
निस्पृह औ निश्छल
बन जाते जो
पथ के प्रदर्शक
देते रहते
सदा मार्गदर्शन
सीख लेते हैं
आत्मविश्वास हम
कर जाते जो
स्फ़ुरित, चिंतन को
आगे उनके
नतमस्तक हम
शत शत नमन !
-0-

Saturday, September 10, 2011

मेरी माँ : एक फ़रिश्ता



प्रियंका सैनी

कक्षा 10 स
राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय ,रोहिणी सेक्टर -11 ,
 नई दिल्ली 

जाती थी माँ हर रोज़
उस हवेली  में
पूछा मैंने हर रोज़
हवेली जान के बारे में,
कहती माँ हर रोज़ यही
‘दुनिया का स्वर्ग है वहीं’
सोचा करती मैं ख़्यालों में-
वो हवेली माँ की तो नहीं ?
याद आई मुझे वो एकादशी की रात
कर रही थी जब मैं
अपने जन्म-दिन की बात
कहा था माँ ने -‘
दूँगी तुझे एक मधुर उपहार
अबकी बार ;
पर नहीं थे पैसे  माँ के पास ।
एक दिन पहुँची मैं माँ के पीछे-पीछे,
देखा-खड़ी है वहाँ एक औरत
माँ कह रही थी उसे ठकुराइन,
ठकुराइन गुर्राकर बोली-
‘जा बनाकर ला मेरे लिए कॉफ़ी’
उसका बोलना लगा मुजे बेढंगा
समझ गई थी मैं अब सब कुछ
जोड़ रही थी पैसे माँ
मेहनत करती थी दिन-रात
मुझे देना चाहती थी मधुर उपहार ।
माँ कह रही थी ठकुराइन को-
‘ कल मुझे जाना है रात होने से पहले
देना है अपनी लाडो को प्यारा उपहार’-
सुनकर इतना ढरके मेरे आँसू
गीली हो गईं हथेलियाँ ।
‘ओह ! मेरी माँ !’ -निकला मेरे मुँह से ।
ढली चाँदनी, आई सुबह नई !
सबसे प्यारा उपहार मुझे मिला
वह उपहार था -मेरी नई स्कूल ड्रेस,
मेरी माँ भला क्या कम है
किसी आकाश से उतरने वाले फ़रिश्ते से !
सचमुच फ़रिश्ता है मेरी माँ !!
-0-

Sunday, September 4, 2011

क्या हुआ इंसान को


-अभिषेक सिंहल

क्या हुआ इंसान को , संवेदना से भी झिझकता है,
अपरिचित की हत्या पर, केवल चर्चा करता रहता है ।
मरने वाले के परिजनों को रोते-बिलकते देखता है,
आँखों को मूँद कर तनाव मुक्त सुषुप्त हो जाता है ।
विचारहीन बातें कर, चाय की चुस्कियाँ लेता है,
तर्क-वितर्क कर, सरकार और व्यवस्था को कोसता है ।
देश और सरकार की निंदा कर, आक्रोश प्रकट करता है,
देश का कुछ नहीं हो सकता, कहते-कहते हँसता है ।
देश के प्रति कर्तव्य पर, नेताओं पर प्रश्न चिह्न लगता है ,
वोट डालने की प्रक्रिया पर, चुप्पी साधे रहता है।
निर्लज्ज है यह मनुष्य, जो कि जानवर से भी बदतर है ,
जानवर तो अपनी प्रजाति को ही अपना अस्तित्व समझता है ।
समाज में हुए उपद्रव को, परिवार से भिन्न क्यों समझता है ?
क्या अपने किसी परिजन के साथ कुछ होने की प्रतीक्षा करता है?
जब तक नहीं होगा हमारा नारा , “मेरा समाज मेरा परिवार”,
तब तक होते रहेंगे अत्याचार
हम पर हर बार, हर बार , हर बार
-0-