मेरा आँगन

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Sunday, November 11, 2007

3-बाल कविताएँ

अलका सिन्हा

1-लाल पतंग

नीले- नीले आसमान में
देखो उड़ती लाल पतंग।

इक पतली सी डोर सहारे
पूरब पश्चिम खूब निहारे
देख हवा से होड़ लगाते
रह जाते पंछी भी दंग।


कभी अटक पुच्छल तारे- सी
कभी यह लाल अंगारे- सी
गोल -गोल ये भँवर बनाती
नए- नए करतब के ढंग।

जात -धर्म का भेद न माने
ये तो केवल उड़ना जाने
हिन्दू –मुस्लिम- सिख उड़ाएँ
उड़ती जाए सबके संग।

नीले- नीले आसमान में
देखो उड़ती लाल पतंग।




2-कागज और पेड़

दो अक्षर लिखकर क्यों
फाड़ दिया पन्ना सारा
भूल हुई है तुमसे लेकिन
भुगत रहा यह बेचारा

क्यों हड़बड़ में गड़बड़ कर दी
कुछ तो सब्र किया होता
लिख लेते कुछ देर बाद में
पहले सोच लिया होता

तुम क्या जानो पेड़ बेचारा
खुद को घायल करता है
बरसों रहता सड़ा–गला तब
पन्ना एक संवरता है

दो अक्षर पर पेज फाड़ना
पड़ता है मंहगा कितना
एक–एक है पेड़ कीमती
धरती का सुंदर गहना

पेड़ कटें तो आँधी पानी
बन जाता है ये मौसम
पड़ने लगती गरमी भारी
रिमझिम का संगीत खतम

कोयल गीत कहाँ गायेगी
कैसे महकेंगी कलियाँ
तेज धूप में जरा छाँव को
तरसेंगी सूनी गलियाँ

टीचर मेरी बतलाती है
जब भी कोई पेज फटा
सोच समझ लो प्यारे बच्चो
बेकसूर इक पेड़ कटा ।

ये अन्याय न होने देंगे
व्यर्थ फटे कोई पन्ना
अब तो पेड़ लगायेंगे हम
हराभरा और घना–घना।



3-वाह चुहिया !

वाह चुहिया का नहीं जवाब ।

खदर -बदर कर भाग रही है
इधर–उधर से झांक रही है
मन मर्जी की मालिक जैसे
हम हों नौकर, यही नवाब ।

टीवी से सोफे पर भागी
ऊपर–नीचे दौड़ लगा दी
तुम क्या इससे जीत सकोगे
है हिम्मत तो भिड़ो जनाब ।

महक सूँघकर दौड़ी आती
कागज–कपड़ा सब ले जाती
यहाँ छुपाती ,वहाँ छुपाती
खाती रोटी और कबाब ।

रात–रात भर पढ़ना पड़ता
जिस किताब का पन्ना -पन्ना
तूने उसे कुतर ही डाला
तुझे मिलेगा खूब सवाब ।

अटकाया रोटी का टुकड़ा
उसमें थोड़ा घी भी चुपड़ा
मगर गंध चूहेदानी की
समझा देती सभी हिसाब ।

वाह !चुहिया का नहीं जवाब !

1 comment:

Shubham said...

पेड़ पर कविता बहुत अच्छी थी |