सहज साहित्य: अमलतास के झूमर
पतंग की उड़ान
Monday, July 11, 2011
Sunday, July 10, 2011
त्रिलोक सिंह ठकुरेला की बाल कविताएँ
त्रिलोक सिंह ठकुरेला
जन्म तिथि :01–10–1966
जन्म स्थान :नगला मिश्रिया (हाथरस), उत्तर प्रदेश
साहित्य सृजन :विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में, कविता, दोहे, गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्डलियां, बालगीत, लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित
प्रकाशित कृति :नया सवेरा (बालगीत संग्रह)
संकलन :सृजन संगी, निर्झर, कारवाँ, फूल खिलते रहेंगे,
देषभक्ति की कविताएँ (काव्य संकलन),नवगीत : नई दस्तकें (नवगीत संकलन)
हाइकु–2009 (हाइकु संकलन), कई संकलनों में लघुकथाएँ
सम्मान : कई सम्मान प्राप्त
संप्रति:उत्तर पश्चिम रेलवे में इंजीनियर
सम्पर्क:बंगला संख्या – एल – 99,रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबूरोड –307026 (राजस्थान)
मोबाइल :09460714267
trilokthakurela@yahoo.com
त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुछ बाल कविताएँ ।ये कविताएँ इनके नए संग्रह 'नया सवेरा' से ली गई हैं ।
1-नया सवेरा लाना तुम
टिक टिक करती घडि़याँ कहतीं
मूल्य समय का पहचानो ।
पल पल का उपयोग करो तुम
यह संदेश मेरा मानो ।।
जो चलते हैं सदा, निरन्तर
बाजी जीत वही पाते ।
और आलसी रहते पीछे
मन मसोस कर पछताते ।।
कुछ भी नहीं असम्भव जग में ,
यदि मन में विश्वास अटल ।
शीश झुकायेंगे पर्वत भी ,
चरण धोयेगा सागर -जल।।
बहुत सो लिये अब तो जागो ,
नया सवेरा लाना तुम ।
फिर से समय नहीं आता है ,
कभी भूल मत जाना तुम ।।
2-मीठी बातें
मीठे मीठे बोल सुनाती ,
फिरती डाली डाली ।
सब का ही मन मोहित करती
प्यारी कोयल काली ।।
बाग बाग में , पेड़ पेड़ पर,
मधुर सुरों में गाती ।
रूप नहीं , गुण प्यारे सबको
सबको यह समझाती ।।
मीठी मीठी बातें कहकर
सब कितना सुख पाते ।
मीठी-मीठी बातें सुनकर
सब अपने हो जाते ।।
कहती कोयल प्यारे बच्चो !
तुम भी मीठा बोलो ।
प्यार भरी बातों से तुम भी
सब के प्यारे हो लो ।।
3-सीख
वर्षा आई , बंदर भीगा ,
लगा काँपने थर थर थर ।
बया घोंसले से यूँ बोली
भैया क्यों न बनाते घर ।।
गुस्से में भर बंदर कूदा ,
पास घोंसले के आया ।
तार तार कर दिया घोंसला
बड़े जोर से चिल्लाया ।।
बेघर की हो भीगी चिडि़या ,
दे बन्दर को सीख भली ।
मूरख को भी क्या समझाना,
यही सोच लाचार चली ।।
सीख उसे दो जो समझे भी ,
जिसे जरूरत हो भरपूर ।
नादानों से दूरी अच्छी ,
सदा कहावत है मशहूर ।।
-0-
Sunday, June 26, 2011
Tuesday, May 24, 2011
Saturday, May 14, 2011
Wednesday, April 20, 2011
Saturday, April 16, 2011
मूर्खता की नदी
सुधा भार्गव
एक लड़का था । उसका नाम मुरली था । उसको किताबें बहुत पसंद थीं । मगर वह उनकी भाषा नहीं समझता था । खिसियाकर अपना सिर खुजलाने लगता । उसकी हालत देख किताबें खिलखिलाकर हँसने लगतीं ।
एक दिन उसने वकील साहब को मोटी सी किताब पढ़ते देखा । उनकी नाक पर चश्मा रखा था । जल्दी -जल्दी उसके पन्ने पलट रहे थे ।
कुछ सोचकर वह कबाड़ी की दुकान पर गया जहाँ पुरानी और सस्ती किताबें मिलती थीं
-चाचा मुझे बड़ी से ,मोटी सी किताब दे दो ।
-किताब का नाम ?
-कोई भी चलेगी ।
-कोई भे चलेगी ....कोई भी दौड़ेगी ......!तू अनपढ़ ...किताब की क्या जरूरत पड़ गई ।
-पढूँगा ।
-पढ़ेगा---- !चाचा की आँखों से हैरानी टपकने लगी ।
-कैसे पढ़ेगा ?
-बताऊँ ...।
-बता तो ,तेरी खोपड़ी में क्या चल रहा है ।
-बताऊँ ..बताऊँ ...।
मुरली धीरे से उठा , कबाड़ी की तरफ बढ़ा और उसका चश्मा खींचकर भाग गया ।
भागते भागते बोला --चाचा ..चश्मा लगाने से सब पढ़ लूँगा । मेरा मालिक ऐसे ही पढ़ता है । २-३ दिन बाद तुम्हारा चश्मा,और किताब लौटा जाऊँगा ।
एक दिन उसने वकील साहब को मोटी सी किताब पढ़ते देखा । उनकी नाक पर चश्मा रखा था । जल्दी -जल्दी उसके पन्ने पलट रहे थे ।
कुछ सोचकर वह कबाड़ी की दुकान पर गया जहाँ पुरानी और सस्ती किताबें मिलती थीं
-चाचा मुझे बड़ी से ,मोटी सी किताब दे दो ।
-किताब का नाम ?
-कोई भी चलेगी ।
-कोई भे चलेगी ....कोई भी दौड़ेगी ......!तू अनपढ़ ...किताब की क्या जरूरत पड़ गई ।
-पढूँगा ।
-पढ़ेगा---- !चाचा की आँखों से हैरानी टपकने लगी ।
-कैसे पढ़ेगा ?
-बताऊँ ...।
-बता तो ,तेरी खोपड़ी में क्या चल रहा है ।
-बताऊँ ..बताऊँ ...।
मुरली धीरे से उठा , कबाड़ी की तरफ बढ़ा और उसका चश्मा खींचकर भाग गया ।
भागते भागते बोला --चाचा ..चश्मा लगाने से सब पढ़ लूँगा । मेरा मालिक ऐसे ही पढ़ता है । २-३ दिन बाद तुम्हारा चश्मा,और किताब लौटा जाऊँगा ।
वकील साहब की लायब्रेरी में ही जाकर उसने दम लिया । कालीन पर आराम से बैठ कर अपनी थकान मिटाई । चश्मा लगाया और किताब खोली ।
किताब में क्या लिखा है ...कुछ समझ नहीं पाया । उसे तो ऐसा लगा जैसे छोटे -छोटे काले कीड़े हिलडुल रहे हों । कभी चश्मा उतारता,कभी आँखों पर चढ़ाता ।
-क्या जोकर की तरह इधर-उधर देख रहा है । चश्मा भी इतना बड़ा .....आँख -नाक सब ढक गये ,चश्मा है या तेरे मुँह का ढक्कन । किताब ने मजाक उड़ाया ।
-बढ़ -बढ़ के मत बोल । इस चश्मे से सब समझ जाऊँगा तेरे मोटे से पेट में क्या लिखा है ।
-अरे मोटी बुद्धि के - - चश्मे से नजर पैनी होती है बुद्धि नहीं । बुद्धि तो तेरी मोटी ही रहेगी । धेल्ला भर मुझे नहीं पढ़ पायेगा ।
मुरली घंटे भर किताब से जूझता रहा पर कुछ उसके पल्ले न पड़ा । झुँझलाकर किताब मेज के नीचे पटक दी ।
रात में उसने लाइब्रेरी में झाँका देखा -- मालिक के हाथों में पतली -सी किताब है । बिजली का लट्टू चमचमा रहा है और उन्होंने चश्मा भी नहीं पहन रखा है ।
मुरली उछल पडा --रात में तो मैं जरूर --पढ़ सकता हूं । चश्मे की जरूरत ही नहीं ।
सुबह होते ही वह किताबों की दुकान पर जा पहुँचा ।
-लो चाचा अपनी किताब और चश्मा । मुझे तो पतली- सी किताब दे दो । लट्टू की रोशनी में चश्मे का क्या काम है ।
बिना चश्मे के कबाड़ी देख नहीं पा रहा था । उसे पाकर बहुत खुश हुआ बोला -
-तू एक नहीं दस किताबें ले जा पर खबरदार ---मेरा चश्मा छुआ तो......।
मुरली ने चार किताबें बगल में दबायीं । झूमता हुआ वहाँ से चल दिया । घर में जैसे ही पहला बल्ब जला उसके नीचे किताब खोलकर बैठ गया । पन्नों के कान उमेठते -उमेठते उसकी उँगलियाँ दर्द करने लगीं पर वह एक अक्षर न पढ़ सका
कुछ देर बाद लाइब्रेरी में रोशनी हुई । मुरली चुपके से अन्दर गया और सिर झुकाकर बोला -मालिक आप मोटी किताब के पन्ने पलटते हो ,उसमें क्या लिखा है --सब समझ जाते हो क्या ?
-समझ तो आ जाता है ,क्यों ?क्या बात है ?
-मैं मोटी किताब लाया ,फिर पतली किताब लाया मगर वे मुझसे बातें ही नहीं करतीं ।
-बातें कैसे करें !तुम्हें तो उनकी भाषा आती नहीं । भाषा समझने के लिए उसे सीखना होगा । सीखने के लिए मूर्खता की नदी पार करनी पड़ेगी ।
--नदी --।
-हाँ ,,,। अच्छा बताओ ,तुम नदी कैसे पार करोगे ?
-हमारे गाँव में एक नदी है। एक बार हमने देखा छुटकन को नदी पार करते । किनारे पर खड़े होकर जोर से उछल कर वह नदी में कूद गया ।
-तब तो तुम भी नदी पार कर लोगे ।
-अरे हम कैसे कर सके हैं । हमें तैरना ही नहीं आता - - ड़ूब जायेंगे ।
-तब तो तुम समझ गये --नदी पार करने के लिए तैरना आना जरूरी है ।
-बात तो ठीक है ।
-इसी तरह मूर्खता की नदी पार करने के लिए पढ़ना जरूरी है। पढ़ाई की शुरुआत भी किनारे से करनी होगी ।
वह किनारा कल दिखाऊँगा ।
कल का मुरली बेसब्री से इन्तजार करने लगा । उसका उतावलापन टपका पड़ता था ।
-माँ ---माँ ,कल मैं मालिक के साथ घूमने जाऊँगा
-क्या करने !
-तूने तो केवल नदी का किनारा देखा होगा ,मैं पढ़ाई का किनारा देखने जाऊँगा ।
माँ की आँखों में अचरज झलकने लगा ।
दूसरे दिन मुरली जब अपने मालिक से मिला,वे लाईब्रेरी में एक पतली सी किताब लिये बैठे थे । मुरली को देखते ही वे उत्साहित हो उठे --
-मुरली यह रहा तुम्हारा किनारा !किताब को दिखाते हुए बोले ।
-नदी का किनारा तो बहुत बड़ा होता है ---यह इतना छोटा !इसे तो मैं एक ही छलांग में पार कर लूंगा ।
-इसे पार करने के लिए अन्दर का एक -एक अक्षर प्यार से दिल में बैठाना होगा । इन्हें याद करने के बाद दूसरी किताब फिर तीसरी किताब - - - -।
-फिर मोटी किताब ---और मोटी किताब --मुरली ने अपने छोटे -छोटे हाथ भरसक फैलाये ।
कल्पना के पंखों पर उड़ता वह चहक रहा था। थोड़ा थम कर बोला --
-क्या मैं आपकी तरह किताबें पढ़ लूँगा ?
-क्यों नहीं !लेकिन किनारे से चलकर धीरे -धीरे गहराई में जाओगे । फिर कुशल तैराक की तरह मूर्खता की नदी पार करोगे । उसके बाद तो मेरी किताबों से भी बातें करना सीख जाओगे ।
मुरली ने एक निगाह किताबों पर डाली वे हँस-हँसकर उसे अपने पास बुला रही थीं । लेकिन मुरली ने भी निश्चय कर लिया था -किताबों के पास जाने से पहले उनकी भाषा सीख कर ही रहूँगा ।
वह बड़ी लगन से अक्षर माला पुस्तक खोलकर बैठ गया तभी सुनहरी किताब परी की तरह फर्र -फर्र उड़कर आई ।
बोली --मुरली , तुम्हें पढ़ता देख कर हम बहुत खुश हैं । अब तो हँस -हंसकर गले मिलेंगे और खुशी के गुब्बारे उड़ायेंगे
मुरली के गालों पर दो गुलाब खिल उठे और उनकी महक चारों तरफ फैल गई
-तब तो तुम भी नदी पार कर लोगे ।
-अरे हम कैसे कर सके हैं । हमें तैरना ही नहीं आता - - ड़ूब जायेंगे ।
-तब तो तुम समझ गये --नदी पार करने के लिए तैरना आना जरूरी है ।
-बात तो ठीक है ।
-इसी तरह मूर्खता की नदी पार करने के लिए पढ़ना जरूरी है। पढ़ाई की शुरुआत भी किनारे से करनी होगी ।
वह किनारा कल दिखाऊँगा ।
कल का मुरली बेसब्री से इन्तजार करने लगा । उसका उतावलापन टपका पड़ता था ।
-माँ ---माँ ,कल मैं मालिक के साथ घूमने जाऊँगा
-क्या करने !
-तूने तो केवल नदी का किनारा देखा होगा ,मैं पढ़ाई का किनारा देखने जाऊँगा ।
माँ की आँखों में अचरज झलकने लगा ।
दूसरे दिन मुरली जब अपने मालिक से मिला,वे लाईब्रेरी में एक पतली सी किताब लिये बैठे थे । मुरली को देखते ही वे उत्साहित हो उठे --
-मुरली यह रहा तुम्हारा किनारा !किताब को दिखाते हुए बोले ।
-नदी का किनारा तो बहुत बड़ा होता है ---यह इतना छोटा !इसे तो मैं एक ही छलांग में पार कर लूंगा ।
-इसे पार करने के लिए अन्दर का एक -एक अक्षर प्यार से दिल में बैठाना होगा । इन्हें याद करने के बाद दूसरी किताब फिर तीसरी किताब - - - -।
-फिर मोटी किताब ---और मोटी किताब --मुरली ने अपने छोटे -छोटे हाथ भरसक फैलाये ।
कल्पना के पंखों पर उड़ता वह चहक रहा था। थोड़ा थम कर बोला --
-क्या मैं आपकी तरह किताबें पढ़ लूँगा ?
-क्यों नहीं !लेकिन किनारे से चलकर धीरे -धीरे गहराई में जाओगे । फिर कुशल तैराक की तरह मूर्खता की नदी पार करोगे । उसके बाद तो मेरी किताबों से भी बातें करना सीख जाओगे ।
मुरली ने एक निगाह किताबों पर डाली वे हँस-हँसकर उसे अपने पास बुला रही थीं । लेकिन मुरली ने भी निश्चय कर लिया था -किताबों के पास जाने से पहले उनकी भाषा सीख कर ही रहूँगा ।
वह बड़ी लगन से अक्षर माला पुस्तक खोलकर बैठ गया तभी सुनहरी किताब परी की तरह फर्र -फर्र उड़कर आई ।
बोली --मुरली , तुम्हें पढ़ता देख कर हम बहुत खुश हैं । अब तो हँस -हंसकर गले मिलेंगे और खुशी के गुब्बारे उड़ायेंगे
मुरली के गालों पर दो गुलाब खिल उठे और उनकी महक चारों तरफ फैल गई
-0-
Wednesday, January 26, 2011
Tuesday, January 25, 2011
Thursday, January 6, 2011
HAPPY NEW YEAR
|
Saturday, November 20, 2010
राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह
राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह एवं बटुकेश्वर दत्त जन्मशती के अवसर पर
पुस्तकों का लोकार्पण संपन्न
कामरेड बटुकेश्वर दत्त जन्म “शताब्दी के अवसर पर दिनांक 19 नवम्वर 2010 लखनऊ माण्टेसरी इन्टर कालेज पुराना किला सदर के प्रांगण में नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया, नई दिल्ली एवं ‘शहीद स्मारक स्वतन्त्रता संग्राम “शोध केन्द्र’ के सौजन्य से पुस्तक लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह की मुख्य अतिथि “शहीद बटुकेश्वर दत्त की पुत्री श्रीमती भारती दत्त बागची थी। विशेष अतिथि प्रो जगमोहन सिंह (सरदार भगत सिंह के भानजे) थे। नेशनल बुक ट्रस्ट ने हिन्दी भाषी लोगों के लिए बटुकेश्वर दत्त पर प्रथम पुस्तक प्रकाशित की है। जिसका “शीर्षक ‘‘बटुकेश्वर दत्तः भगत सिंह के साथी’’, के लेखक श्री अनिल वर्मा है। इसके अलावा अन्य दो पुस्तकें क्रमशः ‘भारत के संरक्षित वन क्षेत्र’ लेखक महेन्द्र प्रताप सिंह और संजीव जायसवाल, कृत बाल पुस्तक ‘चंदा गिनती भूल गया’ का भी लोकार्पण किया गया।
विमोचन कार्यक्रम से पूर्व प्रातः विद्यालय के बच्चों ने विद्यालय प्रंkगण में स्वतन्त्रता संग्राम एवं कामरेड बटुकेश्वर दत्त से सम्बन्धित अविस्मरर्णीय साम्रगी एवं दुर्लभ विषयों को पोस्टर के माघ्यम से प्रदर्शित किया। जिसमें विजेता बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ एडवोकेट श्री उमेश चन्द्रा जी ने की। श्री बैजनाथ सिंह द्वारा अतिथियों के स्वागत के साथ प्रारंभ हुए कार्यक्रम में बटुकेश्वर दत्त पुस्तक के लेखक अनिल वर्मा, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, म.प्र. ने बताया कि इस पुस्तक के लिए उन्होंने किस तरह से और कहाँ- कहाँ से सामग्री एकत्र की। श्री महेन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी पुस्तक ‘भारत के संरक्षित वन क्षेत्र’ का परिचय देते हुए बताया कि जब तक हिंदी का साहित्य ज्ञान-विज्ञान के विषयों से नहीं जुड़ेगा, उसका विस्तार नहीं हो पाएगा । श्री सिंह ने बताया कि इस पुस्तक को तैयार करने में उन्हें कई राज्यों के कई साथियों का सहयोग मिला। श्री संजीव जायसवाल ने अपनी पुस्तक की जानकारी देते हुए बताया कि एक अच्छा लेखक वही है जोकि बच्चों के लिए लिखे।
पुस्तकों की समीक्षा की ‘शृंखला में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. प्रमोद कुमार ने बटुकेश्वर दत्त पुस्तक को एक सार्थक प्रयास बताते हुए कहा कि भारत के इतिहासकारों ने क्रांतिकारियों का सही आकलन नहीं किया। इतिहास का उद्देश्य होता है कि हम अपने आप को समझें। प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित ने भारत के संरक्षित वन पुस्तक की समीक्षा करते हुए कहा कि आज की आवश्यकता है कि ज्ञान-विज्ञान विषयों पर हिंदी में पुस्तकें समय की माँग हैं। मुख्य अतिथि भारती बागची ने अपने पिता से जुड़ी कई यादों को साझा करते हुए कहा कि बटुकेश्वर दत्त की जन्मशती के अवसर पर उन पर डाक टिकट, एक स्मारक का निर्माण जरूर होना चाहिए। प्रो. जगमोहन सिंह ने स्पष्ट किया कि बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह सदैव से एक रहे हैं , उनका आकलन अलग-अलग रख कर नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि भगत सिंह जेल में बटुकेश्वर दत्त से बांग्ला सीखा करते थे। अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री उमे’k चंद्राजी ने ऐसे विचारों के प्रचार-प्रसार की जरूरत पर बल दिया ,जिनसे अलगववादी ताकतें कमजोर हों। श्री जयप्रकाश जी ने आभार व्यक्त किया। ‘
इस आयोजन की महत्त्वपूर्ण घोषणा यह भी रही कि “शहीद स्मारक स्वतन्त्रता संग्राम शोध केन्द्र’, लखनऊ के परिसर में बहुत जल्दी नेशनल बुक ट्रस्ट की पुस्तकों का स्थायी बिक्री केंद्र खुल जाएगा। कार्यक्रम का संचालन नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया, नई दिल्ली, के श्री पंकज चतुर्वेदी के द्वारा किया गया जिन्होंने अपनी संस्था के विषय में लोगो को अवगत कराया। कार्यक्रम स्थल पर ट्रस्ट की पुस्तकों की बिक्री बेहद उत्साहजनक रही।
प्रो. प्रमोद कुमार पंकज चतुर्वेदी
मंत्री सहायक संपादक
Friday, November 5, 2010
दीपावली-सन्देश
दीपावली के इस खूबसूरत त्योहार के लिए सुख -समृद्धि और प्रेरणा का सन्देश लेकर आ रही हैं -तीन संवेदनशील कवयित्रियाँ-डॉ भावना कुँअर , रचना श्रीवास्तव और मंजु मिश्रा , आस्ट्रेलिया , और अमेरिका से । आशा है इनका सन्देश आपको जीवन में नई संकल्प शक्ति से समृद्ध करेगा। प्रस्तुति -रामेश्वर काम्बोज हिमांशु'
1-डॉ भावना कुँअर
रंगोली सजे
दीपों की रोशनी में
अँधेरा मिटे ।
दीपों की कतार से
हरेक कोना ।
झूम रहे हैं
घर-आँगन ।
हँसी रोशनी
जीत पर अपनी
अँधेरा रोया ।
करो रोशन
बुझते चिराग़ों को
इस पर्व में ।
-0-
स्नेह की ,उन्नति की ,ज्ञान की ,वैभव की रौशनी आप को और आप के पूरे परिवार को सदा महकाती रहे -
मस्ज़िद में जलूँ या मंदिर में
झोपड़ी में जलूँ या महल में
भजन में जलूँ या दरगाह पर
चौखट में जलूँ या राह पर
प्रेम गीत गुनगुनाऊँगा
मै दिया हूँ रौशनी फैलाऊँगा ।
झोपड़ी में जलूँ या महल में
भजन में जलूँ या दरगाह पर
चौखट में जलूँ या राह पर
प्रेम गीत गुनगुनाऊँगा
मै दिया हूँ रौशनी फैलाऊँगा ।
-0-
"आँधियों की टक्करों में
दीप कितने बुझ गए हों
पर भला कब हार माने
हैं, अँधेरों से उजाले
एक दीपक फिर जला ले।"
Tuesday, September 21, 2010
ओ मम्मी, ये कैसा युग है !
प्रियंका गुप्ता
[वह कविता मैने तब लिखी थी जब मैं आठवीं में पढ़ती थी ।]
ओ मम्मी, ये कैसा युग है
कितने रावण जनम रहे हैं
राम कहाँ हैं बोलो मम्मी
लव-कुश यूँ जो बिलख रहे हैं
पिछ्ली बार तो हम ने मम्मी
खाक किया था रावण को
फिर किसने है आग लगाई
घर घर यूँ जो दहक रहे हैं
क्यों मम्मी खामोश हो गई
कण-कण आज पुकार रहे हैं
हर बच्चे को राम बनाओ
फिर चाहे कितने ही रावण
जन्मे इस धरती पर मम्मी
हम उनका दस शीश कुचलने को
लो वानर सेना बना रहे हैं.
-0-
Wednesday, September 15, 2010
सामूहिक -रचना -कौशल
प्रीति,तुषार और आकांक्षा
वर्षा का मनभावन मौसम
वर्षा का मनभावन मौसम
वर्षा का मनभावन मौसम
हर्षित हो जाता है तन-मन ।
वर्षा से हरियाली होती
वर्षा ही खुशहाली बोती ।
जब काले बादल घिर आते
तब वे सबके मन को भाते ।
पकौड़ी माँ ने तभी बनाई
सबने मिलकर जमकर खाई ।
वर्षा है अमृत की धारा
जिसको पीता चातक प्यारा
ये है सबसे प्यारा मौसम
ये है सबसे न्यारा मौसम
मोर नाचकर मन बहलाते
बच्चे कूदें शोर मचाते ।
चुन्नू-मुन्नू भोलू मिलकर
पानी में सब नाव चलाते।
सबके मन में छाई उमंग ,
नभ में लाखों उड़ी पतंग।
झूम-झूमकर नाचे मोर ,
काले-काले बादल छाते
हवा सुहानी लेकर आते ।
सबके मन को बादल भाते
संग बादल के हम भी गाते ।
डाल-डाल पर बोले कोयल ।
मिसरी कानों में घोले कोयल
-0-
[ राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, सैक्टर -11 , नई दिल्ली-110085 ]
[ राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय, सैक्टर -11 , नई दिल्ली-110085 ]
Subscribe to:
Posts (Atom)















