मेरा आँगन

मेरा आँगन

Wednesday, September 17, 2008

नन्हीं कविताएँ

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-maorI naanaI

maorI naanaI AcCI naanaI

baatoM maOMnao saarI maanaI

rat hao ga[- mauJao saunaaAao

piryaaoM vaalaI ek khanaI

vahI khanaI baD,I puranaI

ijasamao Mhao

piryaaoM naanaI

­ maalaI

saIcaM saIMcakr hr paOQao kao

hra­Bara krta hO maalaI.

rMga ibarMgao fUlaaoM sao inat

baigayaa kao Barta hO maalaI.

hr paOQao sao AaOr poD, sao

baigayaa maoM haotI hiryaalaI.

.


-BaarI basta

maaÐ mauJasao yah nahIM ]zogaa

basta [tnaa BaarI.

[sa basto ko Aagao maorI

ihmmat ibalkula harI.

baaoJa kra dao kuC kma [saka

sauna laao baat hmaarI ।

­maata -ipta

maata - ipta bahut hI AcCo

jaI Bar krto hmakao Pyaar.

saubah jaagakr sabasao phlao

]nhoM krto hma namaskar.

-baapU

sabasao imalakr rhao p`oma sao

paz pZayaa baapU nao.

AajaadI laokr maanaoMgao

hmaoM isaKayaa baapU nao.

-itrMgaa

sada itrMgaa JaNDa Pyaara

}Ðcaa [sao ]zaeÐgao hma.

caaho jaana hmaarI jaae

[sakao nahIM JaukaeÐgao hma.

.

-fla

sabasao maIza AaOr rsaIlaa

saBaI flaaoM ka raja Aama.

ek saoba jaao Kae raoja,

]sao baImaarI sao @yaa kama.

naaXapatI ¸kolaa¸AMgaUr

ppIta BaI KaAao ja,$r.

laIcaI ¸naarMgaI ¸Anaanaasa

naIMbaU ka rsa sabasao Kasa .

Saturday, July 12, 2008

अमृतमय हो जीवन


हरियाली छाई हो हर कदम पर सदा
बने रिमझिम– रिमझिम फुहारों -सा जीवन ।
कहीं भी तपन न हो पथ में तुम्हारे
हर पल हो सुखद बयारों का जीवन ।
पावन हों सम्बन्ध गंगा की तरह
अमृतमय हो सब किनारों का जीवन ।

Saturday, May 31, 2008

बाल कविता

कल्लू मोटा

कल्लू मोटा ना है खोटा

रखे हाथ में ,मोटा सोटा

रोज़ नहाता ,भर भर लोटा ।

चन्दू भाई ,है हलवाई

खुद ना खाता ,कभी मिठाई

इसीलिए कोठी बनवाई

माधो मट्टू,बड़ा निखट्टू

आदत से है अड़ियल टट्टू

सिर है उसका ,जैसे लट्टू ।

है बरजोरा, बड़ा चटोरा

खाता खीर बाइस कटोरा

तन है उसका जैसे बोरा ।

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Monday, April 7, 2008

जब सूरज जग जाता है

जब सूरज जग जाता है
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

आँखें मलकर धीरे-धीरे
सूरज जब जग जाता है ।
सिर पर रखकर पाँव अँधेरा
चुपके से भग जाता है ।
हौले से मुस्कान बिखेरी
पात सुनहरे हो जाते ।
डाली-डाली फुदक-फुदक कर
सारे पंछी हैं गाते ।
थाल भरे मोती ले करके
धरती स्वागत करती है ।
नटखट किरणें वन-उपवन में
खूब चौंकड़ी भरती हैं ।
कल-कल बहती हुई नदी में
सूरज खूब नहाता है
कभी तैरता है लहरों पर
डुबकी कभी लगाता है ।
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घर में आई बिल्ली


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

जब से घर में आई बिल्ली
खा गई दूध –मलाई बिल्ली ।
ताक लगाए बैठी रहती
बन गई चुश्त सिपाही बिल्ली ।।
बिल में चूहे दौड़ लगाते
भूख के मारे बैठ न पाते
बाहर आने से अब डरते
दिन भर उपाय विचारा करते ।
फिर भी घबराते रहते हैं
कर न दे कहीं खिंचाई बिल्ली ।।
हफ़्ते भर में हिम्मत टूटी
बचने की उम्मीद भी छूटी ।
सब बोले-“अब छोड़ो यह घर
दिल से नहीं हट पाता है डर
कहीं और गुज़ारा कर लेंगे”-
सुन मन में मुस्काई बिल्ली ॥

Saturday, March 22, 2008

शुभ कामनाएँ !

डा प्रियंका मिश्र

पूर्व छात्रा के वि 1 आगरा

फागुन की रुत में

रंगों की बहार ।

पिचकारी की फुहार में

खुशियों की बौछार ।

गुझियों की मिठास में

प्रियजनों का प्यार ।

मुबारक हो आपको

होली का त्यौहार !

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Wednesday, March 19, 2008

हाथी दादा की होली




रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

मोटू हाथी लाया भरकर
सूँड में अपनी रंग ।
लिए खड़े थे जो पिचकारी
वे सब रह गए दंग ॥
रंग सभी पर बरसा करके
दादा जी मुस्काए ।
किसमें दम जो मेरे ऊपर
आज रंग बरसाए।
भीगे बन्दर, भालू ,चीता
खेली ऐसी होली ।
हाथी के आगे टिक पाई
नहीं एक भी टोली ।।
हुई शाम को दावत जमकर
लाए सभी मिठाई ।
आधी खाई हाथी जी ने
आधे में सब भाई ।।

सुस्त गधेराम



डा .भावना कुँअर


गधेराम थे सुस्त बड़े
सो जाते थे खड़े- खड़े।

भाता नहीं था कोई काम
हर पल करते थे आराम।

मालिक रोज़ उन्हें समझाता
गधे राम को समझ न आता।

मालिक कहते 'काम करोगे'
खूब फलोगे स्वस्थ रहोगे।

सुनते थे वो कान दबाये
बिना आँख से आँख मिलाये।

आज़ पड़े हैं वो बीमार
घुटने हो गये हैं बेकार।

टप-टप आँसू खूब बहाये
पर घुटनों से उठ ना पाये।

रोज़ ही करते गर वो काम
स्वस्थ ही रहते सुबहो शाम।
………………………………………

Monday, February 11, 2008

धूप की चादर

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


घना कुहासा छा जाता है ,
ढकते धरती अम्बर ।
ठण्डी-ठण्डी चलें हवाएँ ,
सैनिक -जैसी तनकर ।
भालू जी के बहुत मज़े हैं-
ओढ़ लिया है कम्बल ।
सर्दी के दिन बीतें कैसे
ठण्डा सारा जंगल ।


खरगोश दुबक एक झाड़ में
काँप रहा था थर-थर ।
ठण्ड बहुत लगती कानों को
मिले कहीं से मफ़लर ।
उतर गया आँगन में सूरज
बिछा धूप की चादर ।
भगा कुहासा पल भर में ही
तनिक न देखा मुड़कर ।

आ भाई सूरज

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'


आ भाई सूरज-
उतर धरा पर
ले आ गाड़ी
भरकर धूप ।
आ भाई सूरज-
बैठ बगल में
तापें हाथ
दमके रूप ।
आ भाई सूरज-
कोहरा अकड़े
तन को जकड़े
थके अलाव ।
आ भाई सूरज
चुपके-चुपके
छोड़ लिहाफ़
अपने गाँव ।
.........................

Saturday, February 9, 2008

चुनमुन

–नवीन चतुर्वेदी

सुबह हो गई,
कोहरे की चादर फिर भी छाई है।
चुनमुन ने
सोते रहने की कसम उठाई है।
अब जब सूरज
उठा रहा है कोहरे की चादर
तब चुनमुन की दादी
उसे उठाने आईं है।

चूहे का सूट

–नवीन चतुर्वेदी

सर्दी पडी बहुत, चूहे ने
अपना सूट सिलाया।
दो कतरन ऊनी कपडे की
चार रेशमी लाया।
दर्जी बोला–‘‘समय नहीं है,
कहीं और तुम जाओ,
और किसी छोटे दर्जी से
अपना सूट सिलाओ।‘‘
अपने पैने दांत दिखा
जब चूहे ने धमकाया
नाप लिया फौरन चूहे का
मन ही मन घबराया।

जाडे का सूरज



–नवीन चतुर्वेदी

जाडे के मारे सूरज ने
ओढ लिया कुहरा।

मुर्गे ने जब बांग लगाई
सूरज बन गया बहरा।

आठ बजे के बाद दिखाया
उसने अपना चेहरा ।

और शाम के छह बजते ही
भागा, फिर ना ठहरा।

Tuesday, January 1, 2008

चण्टू –बण्टू का नया साल








रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु

नए साल में क्या करेंगे ?’
-बण्टू बोला ।
चण्टू बोला –‘भाई मेरे
गाना गाएँगे ।’
‘गाना गाकर क्या करोगे ?’
‘दिल बहलाएँगे ।’
‘दिल बहलाकर क्या करोगे ?’
‘सुख बरसाएँगे ।
सुख बरसाकर इस भूमि पर
प्यार उगाएँगे ।’
बण्टू बोला –हम दोनों फिर
नाच दिखाएँगे ।
शैतानी भी खूब करेंगे
न घबराएँगे ।
जिसे भी सोता देखेंगे
उसे जगाएँगे ।
…………………

31-12-2007

Thursday, December 20, 2007

सोनमछरिया



रमेश तैलंग
ताल में जी ताल में
सोनमछरिया ताल में ।
मछुआरे ने मन्तर फूँका
जाल गया पाताल में ।

थर-थर काँपा ताल का पानी
फँसी जाल में मछली रानी
तड़प-तड़पकर सोनमछरिया
मछुआरे से बोली –भैया !

मुझे निकालो , मुझे निकालो
दम घुटता है जाल में ।
मछुआरे ने सोचा पलभर,
कहा-‘छोड़ दूँ तुझे मैं अगर

उठ जाएगा दाना-पानी
क्या होगा फिर मछली रानी ?’
मछली बोली ,रोती-रोती-
‘मेरे पास पड़े कुछ मोती ।

जल में छोड़ो ले आऊँगी
सारे तुझको दे जाऊँगी ।’
मछुआरे को बात जँच गई
बस मछली की जान बच गई।

मछुआरे को मोती देकर
जल में फुदकी मचली रानी !
सोनमछरिया मछुआरे की
खत्म हुई इस तरह कहानी ।

[ आलेख संवाद :नवम्बर 2005 से साभार ]


Sunday, November 25, 2007

टालूराम

नवीन सागर

करना है दस दिन में काम
हाँ! हाँ!
बोले टालूराम।

हमने कहा समझ लो काम
बोले कभी समझ लेंगे
हमने कहा करोगे कब
वो जब चाहोगे तब
पर पहले समझोगे तो!
बोले तभी समझ लेंगे।

जैसे–तैसे समझा काम
दसवें दिन हम उनका नाम
पूछ–पूछ के मार तमाम
लौटे जब थककर के शाम
घर के आगे टालूराम
बोले भैया जै जै राम!
हमने कहा हो गया काम?
फौरन बोले कैसा काम!
हमने कहा अरे वो काम,
बोले अच्छा–अच्छा वो
भूल रहा हूँ क्या था काम!
हमने याद दिलाया काम
बोले दिल से टालूराम
कर देंगे हाँ
कर देंगे।

फिर से दस दिन गुजर गए
गुजर गए दस दिन फिर से
हम गुस्से में भरे हुए
उनके आगे खड़े हुए
हमने कहा हो गया काम!
बोले दस दिन तो हो लें
हमने कहा हो चुके हैं
बोले अभी और होंगे
और हँस पड़े टालूराम।

उनके जाने कितने काम
इसी तरह से किए तमाम!

Wednesday, November 14, 2007

आमंत्रण

बालोपयोगी रचनाएँ आमंत्रित हैं। ई- मेल द्वारा कृतिदेव या यूनिकोड में रचनाएँ भेजे।मानदेय की व्यवस्था नहीं है।
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' rdkamboj@gmail.com

दो बाल कथाएँ




:सुकेश साहनी

ऊँचाई



उदघाट्न समारोह में बहुत से रंगबिंरगे, खुबसूरत, गोल–मटोल गुब्बारों के बीच एक काला, बदसूरत गुब्बारा भी था, जिसकी सभी हँसी उड़ा रहे थे।
‘‘देखो, कितना बदसूरत है,’’ गोरे चिट्टे गुब्ब्बारे ने मुँह बनाते हुए कहा, ‘‘देखते ही उल्टी आती है।’’
‘‘अबे, मरियल!’’ सेब जैसा लाल गुब्बारा बोला, ‘‘तू तो दो कदम में ही टें बाल जाएगा, फूट यहाँ से!’’
‘‘भाइयों! ज़रा इसकी शक्ल तो देखो,’’ हरे–भरे गुब्बारे ने हँसते हुए कहा, ‘‘पैदाइशी भुक्खड़ लगता है।’’
सब हँसने लगे, पर बदसूरत गुब्बारा कुछ नहीं बोला। उसे पता था ऊँचा उठना उसकी रंगत पर नहीं बल्कि उसके भीतर क्या है, इस पर निर्भर है।
जब गुब्बारे छोड़े गए तो काला, बदसूरत गुब्बारा सबसे आगे था।


अक्ल बड़ी या भैंस




स्कूल से घर लौटते ही उदय ने चक्की के दो भारी पाट जैसे–तैसे स्टोर से बाहर निकाल लिए। फिर उन्हें लोहे की एक छड़ के, दोनों सिरों पर फंसा कर भारोत्तोलन का प्रयास करने लगा। चक्की के पाट बहुत भारी थे। प्रथम प्रयास में ही उसके पीठ में दर्द जागा और वह चीख पड़ा।
उसकी चीख सुनकर माँ रसोईघर से दौड़ती हुई आ गई। उदय की पीठ में असहनीय पीड़ा हो रही थी। उन्होंने उदय को तब कुछ नहीं कहा। वे उदय को एक तरह से एक अच्छा लड़का मानती थी। उदय जब कुछ राहत–सी महसूस करने लगा तो उन्होंने कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें आज यह क्या सूझी?’’
जवाब में उदय की आँखें भर आईं, ‘‘माँ, आज स्कूल में मदन ने फिर मेरा हाथ उमेठ दिया। वह मुझसे बहुत तगड़ा है। मैं उससे भी ज्यादा तगड़ा बनूँगा।’’
‘‘अच्छा, पहले यह बताओ, स्कूल में तुम्हारे अध्यापक किसे अधिक चाहते हैं, तुम्हें या मदन को?’’
‘‘मुझे।’’
माँ ने उसे समझाया ‘‘तुम्हारी बातों से स्पष्ट है कि मदन में शारीरिक बल है, बुद्धि नहीं है। बुद्धिमान आदमी अपने गुण की डींगे नहीं हाँकता। तुम चाहो तो अपनी बुद्धि के बल पर उसका घमंड दूर कर सकते हो।’’
माँ के समझाने से उदय को नई शक्ति मिली! वह सोचने लगा सोचते–सोचते उसकी आँखें खुशी से चमक उठीं।
अगले दिन खेल के मैदान में उदय अपने कुछ मित्रों के साथ खड़ा था। तभी वहाँ मदन भी आ गया। अपनी आदत के मुताबिक आते ही उसने डींग हाँकनी शुरू की, ‘‘देखो, मैं यह पत्थर कितनी दूर फेंक सकता हूँ।’’ इतना कहकर वह एक भारी से पत्थर को फेंक कर दिखाने लगा।
‘‘मदन, मुझसे मुकाबला करोगे?’’ उदय ने पूछा,
‘‘अब तू! जा मरियल, तू क्या खा कर मेरा मुकाबला करेगा?’’ मदन ने उसकी खिल्ली उड़ाते हुए कहा।
‘‘ज्यादा घमंड ठीक नहीं होता, ‘‘उदय ने अपना रूमाल उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा ‘‘इस रूमाल को ही जरा उस पत्थर तक फेंक कर दिखा दो।’’
‘‘बस ये....ये लो।’’ मदन ने पूरी ताकत से रूमाल फेंका। रूमाल हवा में लहराता हुआ पास ही गिर गया।
उदय ने हँसते हुए कहा, ‘‘तुम इस जरा से रूमाल को ही फेंक पाए, पर मैं इस रूमाल के साथ–साथ एक पत्थर को भी तुमसे अधिक दूरी पर फेंक सकता हूँ।’’ यह कह कर उदय ने रूमाल में पत्थर लपेटा और उसे काफी दूर फेंक दिया। सभी लड़के जोर–जोर से तालियाँ बजाकर हंसने लगे। मदन का चेहरा मारे शर्म के लाल हो गया। वह चुपचाप वहाँ से खिसक गया।
शाम को उदय खुशी–खुशी स्कूल से लौट रहा था। वह आज की घटना जल्दी से जल्दी अपनी माँ को बताना चाहता था।