विजया दशमी मंगलमय हो !
विजया दशमी मंगलमय हो !
जीवन सबका सदा अभय हो !
दूर अभावों की बस्ती से,
हो प्यार ,तन-मन निरामय हो !
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
विजया दशमी मंगलमय हो !
विजया दशमी मंगलमय हो !
जीवन सबका सदा अभय हो !
दूर अभावों की बस्ती से,
हो प्यार ,तन-मन निरामय हो !
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

‘वैशाली काम्बोज कक्षा 9 ब
आँखों में ख्वाब लिये हम सब चल दिये।
रस्ता था ऐसा कभी देखा नहीं,
कठिनाई भी इतनी कभी सही नहीं,
आँखों में था ख्वाब कि कुछ कर दिखाना है,
और अपनी मंजिल को पाना है ।
आँखों में ख्वाब लिये हम सभी जवान चल दिये।
अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाना था,
मंजिल को पाना था, दुश्मनों को मार गिराना था,
देश का नाम बढ़ाना था, और बढ़ते ही जाना था,
आँखों में ख्वाब लिये हम सभी जवान चल दिये।
सर्द मौसम से लड़ते हुए, पहाड़ियों पर चढ़ते हुए,
सीनों पर गोली खाते हुए दुश्मनों को मार गिराते हुए,
मंजिल को पाते हुए आँखों में ख्वाब लिये,
हम सभी जवान चल दिये।
मुश्किलों का सामना कर दिखाया,
अपनी मँजिल को पाया।
पर्वत शिखर पर भारत का झंडा लहराया,
यह था ऐसा लम्हा जिसे मुश्किल था भूल पाना,
बस अपने देश पर है मर मिट जाना,
यही संदेश है हमारा, यही संदेश है हमारा।
वैशाली काम्बोज
कक्षा 9 ब
केन्द्रीय विद्यालय, आवडी
चेन्नै-55
भावना का फल
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
अँधेरी रात थी । हाथ को हाथ नहीं सूझता था ।एक बूढ़ा साधु गाँव में पहुँचा । वह थककर चूर हो चुका था ।जिसका घर सबसे पहले पड़ेगा; वहीं रुकना ठीक रहेगा- उसने सोचा । सामने ही एक बहुत बड़ा मकान था ।उसने दरवाज़ा खटखटाया ।एक भारी-भरकम आदमी निकलकर आया –“क्यों क्या बात है ? किससे मिलना है ? क्या काम है ?”
“ मुसाफ़िर हूँ ।रात भर ठहरना चाहता हूँ ।थक गया हूँ ।सुबह होते ही चला जाऊँगा। “
सुबह होते ही चला जाऊँगा”- मोटा आदमी मिनमिनाया-“जाओ ! अपना रास्ता नापो चले आते हैं चोर-उचक्के साधु बनकर “-और उसने भड़ाक् से दरवाज़ा बन्द कर लिया। दरवाज़ा बन्द करने वाले थे सेठ मगन लाल। इनके यहाँ कोई खास रिश्तेदार भी आ जाए तो उसे जितने दिन खिलाते-पिलाते, उतने दिन का किश्तों में उपवास ज़रूर रखते थे।
साधु आगे बढ़ा ।एक खण्डरनुमा घर में दिया टिमटिमा रहा था । दरवाज़ा खटखटाया तो एक कमज़ोर औरत ने दरवाज़ा खोला । साधु ने अँधेरा होने की बात की तो वह बोली –“आइए महाराज !इसे अपना ही घर समझिए।”
घर में जो रूखा –सूखा था, औरत ने साधु को आग्रहपूर्वक खिलाया । साधु की दृष्टि घर की हालत को परख रही थी । औरत बोली-“ मेरे पति कई साल पहले स्वर्ग सिधार गए ।थोड़ी-बहुत मेहनत –मज़दूरी करती हूँ । उसी से घर चलता है । आपका ज़्यादा स्वागत सत्कार नहीं कर पाई। बच्चे भी छोटे-छोटे हैं ।इन्हें भी अच्छा खिला-पिला नहीं सकती । आपको इस घर में दिक्कत हो तो माफ़ करना।”
सुबह साधु जब चलने लगा तो बोला-“तुम सुबह के समय जो काम करने लगोगी , वही शाम तक करती रहोगी।औरत कुछ नहीं समझी । साधु अपनी राह निकल गया ।
वह उठी और बच्चों के लिए कुर्ता सिलने के लिए कपड़ा नापने लगी ।शाम तक कपड़ा ही नापती रह गई घर में कपड़े का ढेर लग गया । कपड़ा कई हज़ार का रहा होगा । वह उस कपड़े को बेचकर बरसों तक घर का खर्च चला सकती थी ।
सेठ मगनलाल के कानों में यह भनक पड़ी तो वह उतावला हो उठा और इस रहस्य का पता लगाने लगा ।
साधु कि बात सुनकर वह बहुत पछताया । उसने अपने दो नौकर साधु को ढूँढने के लिए पीछे-पीछे दौड़ा दिए ।अगले दिन वह साधु दूर के गाँव में मिला । आग्रह करके दोनों नौकर साधु को वापस ले आए। सेठ ने उसको खूब खिलाया –पिलाया। साधु कई दिन तक सेठ के यहाँ खूब खाता-पीता रहा ।सेठ मन ही मन बहुत कुढ़ता रहा , पर बोला कुछ नहीं।जब साधु चलने लगा तो सेठ से बोला-“तुम सुबह ही जो करने लगोगे ,शाम तक करते रहोगे”-सुनकर सेठ की आँखें खुशी से चमक उठीं।
साधु कुछ ही दूर गया होगा कि सेठ के बगीचे में एक गधा घुस गया । सेठ का सहज क्रोध जाग उठा । गधे की इतनी हिम्मत कि बगीचे में आ घुसे !। वह गधे को निकालने के लिए दौड़कर गया । गधा उसे देखकर भागा ।सेठ भी पीछे –पीछे दौड़ा ।गधा भी कभी इस गली में तो कभी उस गली में घुस जाता । सेठ जी भी पीछे –पीछे ।
गाँव के सब लोग हँस रहे थे ; परन्तु सेठ को इसकी फ़िक्र नहीं थी ।वह थककर चूर हो गया ।दम निकला जा रहा था ।थकने के कारण गधा भी धीरे-धीरे चलने लगा ।सेठ ने भी रफ़्तार कम कर दी। सूर्यास्त होने तक सेठ जी उसके पीछे घूमते रहे । गधा गिर पड़ा ।सेठ जी भी बेदम होकर उसके पैरों के पास गिर पड़े ।
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रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
गाँव में एक ज़मीदार रहता था ।उसके तीन बेटे थे । मरते समय उसने अपने तीनों बेटों को पास बुलाकर कहा –“मेरे पास सतरह ऊँट हैं ।इन्हें तुम आपस में बाँट लेना ।इतना ध्यान रहे कि किसी को भी उसके निर्धारित भाग से कम न मिले । बड़ा आधे ऊँट रख ले ।मँझला एक तिहाई और सबसे छोटा कुल ऊँटों का नौवाँ हिस्सा। बड़े के हिस्से में आधे ऊँट आते थे अर्थात् 8½ ऊँट ।वह ऊँट किस प्रकार ले ?आठ वह ले नहीं सकता था ।
मँझले के सामने भी यही परेशानी थी ।उसके हिस्से में छह ऊँट से कुछ कम आते थे । छोटे बेटे के हिस्से में दो ऊँट से कुछ कम , पूरे दो ऊँट भी नहीं । कई दिनों तक कुछ फ़ैसला नहीं हो सका ।
हारकर तीनों भाई पास के गाँव वाले एक बुद्धिमान् किसान के पास पहुँचे और उसे अपनी समस्या बताई । किसान ने कहा –‘ जितना तुम्हारा भाग है , तुम्हें उससे कुछ ज़्यादा ही मिल जाएगा ।इस पर तुम्हें एक दूसरे से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए ।
सबने किसान की बात मान ली। किसान के पास एक ऊँट था ।उसने वह भी उन ऊँटों में मिला दिया । इस प्रकार अठारह ऊँट हो गए ।किसान ने सबसे पहले बड़े बेटे से कहा –“ तुम नौ ऊँट ले जा सकते हो । बस मेरा ऊँट नहीं लेना है।"
वह नौ ऊँट लेकर जल्दी से चलता बना ।
इसी प्रकार मँझले से कहा –“ तुम्हें छह ऊँट से कम मिलने थे । तुम मेरा ऊँट छोड़कर कोई छह ऊँट ले जा सकते हो।”
वह भी छह ऊँट लेकर खुशी से चलता बना ।
सबसे छोटे से कहा –“तुम दो ऊँट ले जा सकते हो।"
वह भी दो ऊँट लेकर चल दिया ।किसान का ऊँट बच गया और उनका बँटवारा भी ठीक ढंग से हो गया ।
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मास्टर जी ने कहा था :कमल चोपड़ा
ए आर एस पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स
1362, कश्मीरी गेट,
दिल्ली – 110 006
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इस बाल उपन्यास में एक ऐसे शरारती लड़के की कहानी है जिसका नाम किन्नू है। किन्नू अपने माँ–बाप की इकलौती संतान है। पिता गाँव के जमींदार हैं। रूप्ए–पैसे वाले आदमी हैं। गाँव में उनका बड़ा रौब है। इसी कारण अक्सर लोग उनसे घबराते कतराते हैं।
बेटा किन्नू अपने पिता के नक्शे–कदम पर चल रहा था। गांव की पाठशाला में आए दिन अपने सहपाठियों को तंग करता था। उसको यह सब करना अच्छा लगता था। चाहे किसी का दिल दुखे, इसकी परवाह वह नहीं करता था। आए दिन कक्षा अध्यापक से उलझ जाता। पिटाई खाता और अध्यापक से बदला लेने की फिराक में रहता है ।
अध्यापक हमेशा उसे सुधर जाने की नसीहत देते। पर वह तो चिकना घड़ा था। इस कान से सुनता और दूसरे कान से अनसुना कर निकल जाता।
किन्नू की शरारत के कारण ही अध्यापक को स्कूल छोड़ना पड़ा। स्कूल किन्नू के पिता की दान राशि पर चलता था।
अचानक किन्नू के घर आग गई। माँ–बाप घर में फँस गए। पिता को लोग बचा नहीं पाए। माँ अकेली रह गई। किन्नू पढ़ा–लिखा नहीं था। मुनीम ने जमीन–जायदाद पर कब्जा कर लिया। हार कर किन्नू शहर आ गया। किन्नू कई मुसीबतों में घिरा, अत्याचार भी सहा, ऐसे में उसे एक अपाहिज लड़की मिली जिसने किन्नू को भाई माना। किन्नू को समझ में आने लगा था कि काश उसने पढ़ाई को गंभीरता से लिया होता ! पुस्तक में कई रोचक प्रसंग हैं। लेखक की शैली वाकई प्रभावशाली है। पुस्तक का चित्रांकन सुन्दर है।
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-ललित किशोर मंडोरा



E.Mail: sundershyam60@gmail.com

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चिन्तन के क्षण
प्रसन्न
निराशा भले ही कुछ भी हो़, लेकिन कोई धर्म नहीं है।सदा मुस्कराते हुए प्रसन्न रहकर तुम ईश्वर के समीप पहॅंच सकते हो।क्या खोया , क्या पाया इससे ऊपर उठकर मन को सदा हल्का रखने में एक परम आनन्द है।यह काम किसी भी प्रार्थना से अधिक शक्तिशाली है।
क्षमा
आत्म–प्रशंसा , वैमनस्य–भावना तथा ईर्ष्या का पूर्णतया परित्याग करो।तुम सभी को धरती मॉं की तरह क्षमाशील होना चाहिए।यदि तुममें इस प्रकार की क्षमाशीलता होगी तो संसार तुम्हारे चरणों में झुक जायेगा।क्षमा न करने से जीवन की गति अवरुद्ध हो जायेगी।
संघर्ष
पवित्र रहने के लिए संघर्ष करते हुए समाप्त हो जाओ।हजार बार मृत्यु का स्वागत करो।निराश मत होओ।कष्ट के समय में भी धैर्य रखते हुए आशा का पल्ला मत छोड़ो। घबराकर गलत मार्ग पर मत बढ़ो। यदि अमृत प्राप्त नहीं हो सका तो कोई कारण नहीं कि विष ही पी लिया जाये।
पहचान
प्रशस्त होने का प्रयत्न करो।याद रखो गति और प्रगति में ही जीवन है।लेकिन जीवन में गति और प्रगति आती है–विनम्रता , कृतज्ञता और अपने उपकारी के प्रति सच्ची भावना से।अपने कार्य के प्रति निष्ठावान रहते हुए सभी के प्रति उचित सम्मान देना भी सीखो।
संचार
शक्ति और साधन खुद प्राप्त हो जायेंगे। तुम केवल अपने –आपको कार्य में रत कर दो और तब तुम्हें ज्ञात होगा कि एक जबरदस्त शक्ति तुम्हारे भीतर आ रही है। दूसरों के प्रति किया गया जरा सा काम भी हमारे भीतर शक्ति का संचार कर देता है। दूसरों के प्रति भलाई के विचार ही हमारी शक्ति के मूल साधन हैं।
उदारता
उदारता से बढ़कर कोई गुण नहीं ।नीचतम मनुष्य वह है जो केवल लेने के लिए हाथ बढ़ाता है।वह उच्चतम मनुष्य है जे सदा देता ही रहता है।हाथ देने के लिए ही बनाये गये हैं।भले ही तुम्हारे प्राण निकल रहे हों तो भी अपनी रोटी का अन्तिम टुकड़ा दे दो ,तुरन्त पूर्ण मनुष्य बन जाओगे।एकदम देवता।
प्रयत्न
असफलताओं के लिए खेद मत करो।वे स्वाभाविक हैं।वे जीवन का सौन्दर्य हैं।इन असफलताओं के बिना जीवन है ही क्या ? यदि जीवन में संघर्ष नहीं है , तो वह जीवन जीने योग्य नहीं। इसलिए एक हजार बार प्रयत्न करो और यदि एक हजार बार भी असफल रहो तो प्रयत्न और करो।
उत्पत्ति
कार्यशीलता एक अच्छा गुण है ; लेकिन उसकी प्राप्ति भी विचारशीलता से होती है।अत: अपने मस्तिष्क को उच्च विचारों और उच्च आदर्शों से परिपूर्ण करो।रात–दिन उन्हें अपने सम्मुख रखो और स्मरण करो।फिर उनमें से अपने आप महान कार्यो की उत्पत्ति होगी।
पक्षपात
पक्षपात को ही सभी बुराइयों की जड़ समझो।पक्षपात दूसरों के मन में अलगाव पैदा कर देता है। अलगाव पैदा होना अच्छी बात नहीं है।इससे व्यक्ति का विश्वास उठ जाता है और वह मान लेता है कि पक्षपात करने वाला अपने चरित्र से गिर गया है।अत: पक्षपात को अपने से दूर रखो तो आपदाएँ भी दूर रहेंगी।
जाग्रति
उठो और जागो और उस वक्त तक मत रुको जब तक कि मंजिल नही मिल जाती।तुम्हारी मंजिल तुम्हें ही खोजनी है और तुम्हें ही उस तक पहुँचना है।यदि तुम यह मानकर बैठे हो कि कोई आयेगा और तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हारी मंजिल की तरफ ले जायेगा तो तुम भारी भूल के शिकार हो गये हो।अपनी मंजिल की ओर तुम्हें खुद ही बढ़ना है।
विश्वास
मैं उस धर्म और भगवान में विश्वास नहीं रखता जो विधवा के आँसू न पोंछ सके या किसी अनाथ व भूखे तक रोटी का टुकड्रा न ले जा सके।मैं उस धर्म में भी विश्वास नहीं रखता जो किसी को सहारा न दे सके ,किसी डूबते को न बचा सके।धर्म का मूल मंत्र ही यह है कि हम दूसरों के काम आयें।
बुद्धिमान
मृतक वापस नहीं लौटते ।बीती रातें फिर नहीं आतीं ।उतरी हुई लहर फिर नहीं उभरती।मनुष्य फिर से वही शरीर नहीं धारण कर सकता।इसलिए बीती हुई बातों को भूलकर वर्तमान को पूजो।नष्ट और खोई हुई शक्ति अथवा वस्तु का चिन्तन करने की अपेक्षा नये रास्ते पर चलो।जो बुद्धिमान होगा वह इस बात को अवश्य समझेगा।
पुरुषार्थ
पुरुषार्थ आलस्य का शत्रु है। आलस्य को हर प्रकार से रोकना चाहिए। पुरुषार्थ करते रहने का अभिप्राय है आलस्य को रोकना सभी बुराइयों को रोकना ;मानसिक व शारीरिक बु्राइयों को रोकना ।और जब तुम ये बुराइयाँ रोकने में सफल हो जाओगे, तो शान्ति और समृद्धि स्वयं तुम्हारे पास आ जायेगी।
परिणाम
प्रत्येक कार्य का परिणाम अच्छाई और बुराई का मिश्रण है।कोई भी अच्छा काम नहीं जिसमें थोडी बहुत बुराई न हो।अग्नि के साथ धुएँ की तरह बुराई भी प्रत्येक कार्य में रहती है।लेकिन हमें अपनेआप को अधिक से अधिक ऐसे कामों में लगाना चाहिये जिनका अच्छा परिणाम अधिक हो और बुरा काम से कम।
विचार
अपवित्र कल्पना और विचार भी अपवित्र कार्य की तरह बुरे हैं।नियंत्रित इच्छाएँ ही उच्च परिणाम तक पहुँचती हैं।मनुष्य अपवित्र कार्य तभी करता है जब उसके मन में अपवित्र विचार आते हैं।वे अपवित्र विचार उसे बुरे कार्य की ओर घसीट ले जाते हैं।मिर्च खाकर किसका मुँह मीठा हुआ है।
महापाप
दूसरों की निन्दा करना महापाप है।इससे पूर्णतया बचो।अनेक बातें दिमाग में आती हैं।यदि उन्हें प्रकट करने का प्रयत्न किया जाये तो राई का पहाड़ बन जाता है।प्रत्येक बात समाप्त हो जाती है यदि तुम चुप हो जाओ व भूल जाओ और क्षमा कर दो।निन्दा की बात पर हमें चुप रहने भूलने और क्षमा करने का गुण अपनाना चाहिए।
सन्तोष
सुख व्यक्ति के सामने अपने सिर पर दुख का ताज पहनकर आता है।जो सुख का स्वागत करना चाहता है उसे दुख का स्वागत करने के लिए भी सदा तैयार रहना चाहिये।सुख को मात्र सुख मानकर चलने वाला भविष्य में अधिक दुखी भी हो सकता है।अत: ऐसे सुख की कामना करो जो सभी के लिए कल्याणकारी हो।
साभार: विवेक के आनन्द से
प्रस्तुति : चन्द्र देव राम प्राचार्य के वि जवाहर नगर(बिहार)