मेरा आँगन

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Monday, June 1, 2009

हर कदम परीक्षा



कमल चोपड़ा
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काम की तलाश में इधर–उधर धक्के खाने के बाद निराश होकर मधुकांत घर लौटने लगा तो पीछे से आवाज आई, ‘ऐ भाई, यहाँ कोई मजदूर मिलेगा क्या?’
मधुकांत ने मुड़कर देखा तो एक झुकी हुई कमर वाला बूढ़ा तीन गठरियाँ उठाए हुए खड़ा है। मधुकांत ने कहा, ‘‘हाँ बोलो क्या काम है? मैं ही मजदूरी कर लूँगा।’’
मुझे रामपुर जाना है....। दो गठरियाँ मैं उठा लूँगा पर.... मेरी एक गठरी रामपुर पहुँचवा दो, दो रूपए दूँगा। बोलो मंजूर है।
ठीक है। चलो.... आप बुजुर्ग हैं। आपकी इतनी मदद करना तो मैं यों भी फर्ज समझता हूँ।
मधुकांत ने गठरी उठाते हुए कहा, ‘चलिये काफी भारी गठरी है।’
‘हाँ.... इसमें एक–एक रुपये के सिक्के हैं।’ बूढ़े ने फुसफुसाते हुए कहा।
मधुकांत ने सुना तो सोचा, ‘होंगे मुझे क्या? मुझे तो अपनी मजदूरी से मतलब है।ये सिक्के कितने दिन चलेंगे? मधुकांत ने देखा, बूढ़ा उस पर नजर रखे हुए है। उसने सोचा ‘ये सोच रहा होगा कहीं ये भाग ही न जाए। पर मैं ऐसी बेईमानी और चोरी करने में विश्वास नहीं करता। मैं सिक्कों के लालच में फंसकर किसी के साथ बेईमानी नहीं करूँगा।
चलते–चलते आगे एक नदी आ गई। मधुकांत तो नदी पार करने के लिए झट से पानी में उतर गया पर बूढ़ा नदी के किनारे खड़ा रहा। मधुकांत ने कहा.....क्या हुआ? रूक क्यों गए?
‘बूढ़ा आदमी हूँ।’ मेरी कमर ऊपर से झुकी हुई है। दो–दो गठरियों का बोझ नहीं उठा सकता....कहीं मैं नदी में डूब ही ना जाऊँ। तुम एक गठरी और उठा लो....‘मजदूर एक रुपया और ले लेना।’
‘ठीक है लाओ।’
‘पर इसे लेकर कहीं तुम भाग तो नहीं जाओगे?’
‘क्यों, मैं क्यों भागूँगा?’
‘‘इसमें चाँदी के सिक्के हैं’
‘‘मैं आपको ऐसा चोर बेईमान दीखता हूं क्या?... बेफिक्र रहें मैं चांदी के सिक्कों के लालच में किसी को धोखा देने वालों में से नहीं हूँ.... लाइए ये गठरी मुझे दे दीजिये।’
दूसरी गठरी उठाकर मधुकांत ने नदी पार कर ली। चांदी के सिक्कों का लालच भी मधुकांत को नहीं डिगा पाया। थोड़ी दूर आगे चलने के बाद सामने एक पहाड़ी आ गई।
मधुकांत धीरे–धीरे पहाड़ी पर चढ़ने लगा लेकिन बूढ़ा अभी नीचे ही रूका हुआ था। मधुकांत ने कहा, ‘आइये ना, रुक क्यों गये?’’
‘‘मैं बूढ़ा आदमी हूं। ठीक से चल तो पाता नहीं हूँ , ऊपर से कमर पर एक गठरी का बोझ और उसके भी ऊपर पहाड़ी की दुर्ग चढ़ाई।’’
‘‘तो लाइये ये गठरी भी मुझे दे दीजिये। बेशक और मजदूरी भी मत देना।’’
‘‘पर इसे कैसे दे दूं? इसमें सोने के सिक्के हैं और अगर तुम लेकर भाग गए तो मैं बूढ़ा तुम्हारे पीछे भाग भी नहीं पाऊँगा।’’
‘‘बाबा मैं ऐसा आदमी नहीं हूं। ईमानदारी के चक्कर में ही तो मुझे मजदूरी करनी पड़ रही है वरना पहले मैं एक लाला जी के यहां मुनीम की नौकरी करता था। लालाजी मुझसे हिसाब में गड़बड़ करके लोगों को ठगने को कहते थे। मैंने ऐसा करने से मना कर दिया और नौकरी छोड़ कर चला आया।’ मधुकांत ने यों ही गप हाँकी।
‘‘पता नहीं तुम सच कह रहे हो या.....। खैर उठा लो ये सोने के सिक्कों वाली तीसरी गठरी भी। मैं धीरे–धीरे आता हूं। तुम मुझसे पहले पहाड़ी पार कर लो तो दूसरी तरफ नीचे रूककर मेरा इंतजार करना।’
मधुकांत सोने के सिक्कों वाली गठरी उठाकर चल पड़ा। बूढ़ा बहुत पीछे रह गया था। मधुकांत के दिमाग में आया, ‘अगर मैं भाग जाऊँ तो ये बूढ़ा तो मुझे पकड़ नहीं सकता और मैं एक झटके में मालामाल हो जाऊँगा। मेरी पत्नी जो मुझे रोज कोसती रहती है कितना खुश हो जाएगी। इतनी आसानी से मिलने वाली दौलत ठुकराना भी बेवकूफी है..... एक ही झटके में धनवान हो जाऊँगा। पैसा होगा तो इज्जत ऐश–आराम सब कुछ मिलेगा मुझे....।
मधुकांत के दिल में लालच आ गया और बिना पीछे देखे भाग खड़ा हुआ। तीन–तीन भारी गठरियों का बोझ उठाए–उठाए भागते–भागते उसकी साँस फूल गई।
घर पहुँचकर उसने गठरियां खोलकर देखीं तो अपना सिर पीटकर रह गया। गठरियों में सिक्कों जैसे बने हुए मिट्टी के ढेले ही थे। मधुकांत सोच में पड़ गया कि बूढ़े को इस तरह नाटक करने की जरूरत ही क्या थी। तभी उसकी पत्नी को मिट्टी के सिक्कों के ढेर से एक कागज मिला जिस पर लिखा था, यह नाटक इस राज्य के खजाने की सुरक्षा के लिए ईमानदार सुरक्षा मंत्री खोजने के लिए किया गया। परीक्षा लेने वाला बूढ़ा और कोई नहीं स्वयं महाराज ही थे। अगर तुम भाग न निकलते तो तुम्हें मंत्रिपद और मान सम्मान सब कुछ मिलता पर.....।
मधुकांत अपना सिर पीटकर रह गया, ‘मैं लालच ना करता तो मेरा ये जीवन की सफल हो जाता। कुछ नहीं तो कम से कम मजदूरी तो मिलती पर अब.... अब दोबारा जाऊँ या किसी को बताऊँ तो पकड़ा जाऊँगा।
अगले दिन उसे पता चला कि उस परीक्षा में और कोई नहीं मधुकांत का ही बचपन का दोस्त सत्यव्रत सफल हुआ है। मारे जलन के मधुकांत अपने बाल नोचकर रह गया। फिर भी वह अपने दोस्त सत्यव्रत को बधाई देने गया तो वह बोला – ‘‘भाई मेरा तो ख्याल है कि हर आदमी को हर वक्त अपनी ईमानदारी से काम करना चाहिए। ना जाने कब कहाँ कौन किसकी परीक्षा ले रहा हो और परीक्षा में सफल होकर कब किसकी जिन्दगी ही बदल जाए। जैसा कि मेरे साथ हुआ।


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कमल चोपड़ा
1600/114, त्रिनगर,
दिल्ली – 110035.

3 comments:

महामंत्री - तस्लीम said...

अरे वाह, ये तो मेरी पसंदीदा कहानियों में से एक है। इसे प्रकाशित करने हेतु धन्यवाद।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

रावेंद्रकुमार रवि said...

अगर तुम भाग न निकलते तो तुम्हें मंत्रिपद और मान सम्मान सब कुछ मिलता पर.....।

यह प्रेरक कहानी यहीं पर समाप्त हो जाती है!

कमल चोपड़ा जैसे रचनाकार को
इसके आगे के दो अवतरण
लिखने की आवश्यकता पड़ गई -
यह चिंता की बात है!

KAHI UNKAHI said...

ये कहानी कमल जी ने बच्चो के लिए लिखी है , कभी-कभी बच्चे अधूरी बातो का रहस्य समझ नहीं पाते । बेशक कहानी वहीं समाप्त हो जाती है , पर उसे बच्चों के लिए और सरल बनाने के लिए अगर दो अवतरण लिखे गए हैं , तो मुझे नहीं लगता कि कुछ गलत हुआ ।