Sunday, December 29, 2019
Friday, January 27, 2012
Saturday, April 25, 2009
पुस्तक-परिचय
लेखक : गिजुभाई बधेका
अनुवाद , रूपान्तरण और चित्रांकन: आबिद सुरती
मूल्य:35 रुपये ,पृष्ठ :40 (आवरण पृष्ठ सहित)
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्र्स्ट इण्डिया ,नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया वसन्तकुंज फेज़-2 ,नई दिल्ली-110070
गिजुभाई जी ने बरसों पहले कहानी के बारे में शिक्षकों से कहा था –“आप इन्हें रसीले ढंग से कहिए ,कहानी सुनाने के लहज़े में कहिए ।कहानी भी ऐसी चुनें ,जो बच्चों की उम्र से मेल खाती हो । भैया मेरे ,एक काम आप कभी न करना ।ये कहानियाँ आप बच्चों को रटाना नहीं।बल्कि ,पहले आप खुद अनुभव करें कि ये कहानियाँ जादू की छड़ी–सी हैं।…।पण्डित बनकर कभी कहानी नहीं सुनाना।कील की तरह बोध ठोंकने की कोशिश नहीं करना । कभी थोपना भी नहीं।”
इन पंक्तियों में कहानी सुनाने में जो उद्देश्य निहित है, वह स्पष्ट है-
1-कहानी पढ़ाने की चीज़ नहीं-कहने की चीज़ है।
2-कहानी कहने का ढंग रसीला होना चाहिए ।
3-कहानी आयु-वर्ग के अनुकूल हो ।
4- कहानी रटवाई न जाए ।
5- कहानी सुनाने में सहजता हो , पाण्डित्य प्रकट न हो ।
6- बोध कील की तरह न ठोंकना न थोपना । बोधगम्यता सहज और स्वाभाविक हो ।
बच्चों को भाषा सिखाने में कहानियों की भूमिका बहुत गहरी है । इस संग्रह में ये आठ कहानियाँ हैं ,जो अपने आप में रोचकता लिये हुए हैं –चूहा सात पूँछोंवाला,जो न बोले सो निहाल ,सौ के साठ ,चिरौटा चार सौ बीस ,किस्सा एक दाने का ,जोगी या भोगी ,फूफू बाबा ,करते हो सो कीजिए ।प्रत्येक कहानी का तेवर और स्वर अलग-अलग है ।
इन कहानियों का हिन्दी अनुवाद प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आबिद सुरती जी ने किया है । अनुवाद अत्यन्त सरल, सहज एवं ग्राह्य है । चित्रों के साथ लोककथाओं का रंग इन्हें और रोचक बना देता है । बच्चों तक अगर ये कहानियाँ पहुँचती हैं तो नि:सन्देह भाषा के प्रति और अधिक रुचि जाग्रत होगी ।
-रामेश्वर काम्बोज’हिमांशु’
Tuesday, November 11, 2008
देश हमारा है

देश हमारा है
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
आँखों का तारा है ,प्राणों से प्यारा है ।
सब देशों से अच्छा , ये देश हमारा है ॥
इसका तन कुन्दन है ,
पावन मन चन्दन है।
साँसों में फूलों की
डूबी हर धड़कन है ॥
षड् ॠतुओं ने आकर फिर रूप सँवारा है ।
नयनों से रहा बरस।
केशों से लिपटी है
अमावस –निशा बरबस ।
अगणित नदियाँ इसकी ममता की धारा हैं।
मिट्टी में छुपी सुगन्ध,
मुट्ठी में पौरुष बन्द ।
नित मुकुट हिमालय से
झरता रहा मकरन्द ।
सागर ने हाथों से पदरज को पखारा है।
भाषा व वेश अनेक ,
प्राण हैं फिर भी एक ।
विश्व-पट पर गौरव का ,
लिखा है हमने लेख ।
गुण सदियों से इसके गाता जग सारा है ।
Monday, October 27, 2008
धरती हिन्दुस्तान की
धरती हिन्दुस्तान की
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
जहाँ आकरके रही लौटती सेनाएँ तूफ़ान की।
हमको प्राणों से भी प्यारी धरती हिन्दुस्तान की ॥
चारों वेदों के मन्त्रों से गूँजा ये आकाश था
जिसके चप्पे-चप्पे में सत् विद्या का प्रकाश था ।
जगद्गुरु बनकरके पताका ऊँची की सम्मान की ॥
गंगा–जमुना नहीं हैं नदियाँ पावन दूध की धारा हैं ।
इन्हीं के बलबूते पर हमने शत्रु को ललकारा है ।
इसी अमृत को पीकर हमने बाजी लगाई जान की ॥
बाहें मिलाकर वीर बाँकुरे शेरों से भी खेले हैं
अंगारों की बरसातों में वार भयंकर झेले हैं ।
गूँज रही अब तक हुंकारें 'वन्देमातरम्' गान की ॥
बहिनों ने भाई के माथे लहू के तिलक लगाए हैं
हाथों में तलवारें लेकर रण में जौहर दिखाए हैँ ।
मार –मार कर दुश्मन की सेनाएँ लहू-लुहान की ॥
अडिग हिमालय हम सब वासी सागर से गम्भीर हैं
दुश्मन की गर्दन की खातिर, हम पैनी शमशीर है ।
आई जिसे सींचती वाणी गीता और क़ुरान की ॥
हमको प्राणों से भी प्यारी धरती हिन्दुस्तान की ॥
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बाल-कविता(हास्य)
गधा आदमी से अच्छा
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
छज्जू मास्टर एक रोज़ बच्चों को पढ़ा रहे थे॥
जो नहीं पढ़ पाता उसको मुर्ग़ा बना रहे थे ।।
पतली छड़ी से पीट-पीट कह रहे थे ऊँचे स्वर से॥
गधे से बनोगे तुम आदमी इस पिटने के डर से ।।
नन्दू कुम्हार पास से गुज़रा तो सुनकर चकराया ।
छज्जू मास्टर के चरणों में जा अपना शीश झुकाया ॥
“एक गधा घर मेरे बँधा है आदमी उसे बना दो॥
जो भी इसकी फ़ीस लगेगी झटपट मुझे बता दो॥”
छज्जू बोले-“नन्दू भैया !कुल रुपए लगेंगे बीस ।
गधे से आदमी बनने में दिन गुज़रेंगे तीस।”
यह सुनकरके नन्दू अपने मन में बहुत हर्षाया ।
तीस दिनों के बाद वह फिर विद्यालय में आया ॥
उसे देखकर छजू मास्टर पड़ा बहुत चक्कर में ।
बेच चुका था उस गधे को वह पूरे सत्तर में ॥
नन्दू से फिर यूँ बोला-“सीधे थाने जाओ।
दरोग़ा बना गधा तुम्हारा जल्दी से ले आओ॥”
पहुँचा नन्दू जब थाने में दरोगा पड़ा दिखाई।
“मेरे गधे घर चल जल्दी”-ये आवाज़ लगाई ॥
बार –बार जब कहा गधा तो लात दरोगा ने मारी ।
बोला नन्दू-“आदमी बनकर भी न आदत गई तुम्हारी॥
तुम्हें आदमी बनाने में गधा हाथ से खोया ।
आज बने हो तुम दरोगा कल तक बोझा ढोया॥”
बुरी तरह पिटकरके नन्दू जब घर वापस आया
‘गधा आदमी से अच्छा’ –मन को यूँ समझाया ॥
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Wednesday, September 17, 2008
नन्हीं कविताएँ
.
-maorI naanaI
maorI naanaI AcCI naanaI
baatoM maOMnao saarI maanaI
rat hao ga[- mauJao saunaaAao
piryaaoM vaalaI ek khanaI
vahI khanaI baD,I puranaI
ijasamao Mhao
piryaaoM naanaI
maalaI
saIcaM saIMcakr hr paOQao kao
hraBara krta hO maalaI.
rMga ibarMgao fUlaaoM sao inat
baigayaa kao Barta hO maalaI.
hr paOQao sao AaOr poD, sao
baigayaa maoM haotI hiryaalaI.
.
-BaarI basta
maaÐ mauJasao yah nahIM ]zogaa
basta [tnaa BaarI.
[sa basto ko Aagao maorI
ihmmat ibalkula harI.
baaoJa kra dao kuC kma [saka
sauna laao baat hmaarI ।
maata -ipta
maata - ipta bahut hI AcCo
jaI Bar krto hmakao Pyaar.
saubah jaagakr sabasao phlao
]nhoM krto hma namaskar.
-baapU
sabasao imalakr rhao p`oma sao
paz pZayaa baapU nao.
AajaadI laokr maanaoMgao
hmaoM isaKayaa baapU nao.
-itrMgaa
sada itrMgaa JaNDa Pyaara
}Ðcaa [sao ]zaeÐgao hma.
caaho jaana hmaarI jaae
[sakao nahIM JaukaeÐgao hma.
.
-fla
sabasao maIza AaOr rsaIlaa
saBaI flaaoM ka raja Aama.
ek saoba jaao Kae raoja,
]sao baImaarI sao @yaa
naaXapatI ¸kolaa¸AMgaUr
ppIta BaI KaAao ja,$r.
laIcaI ¸naarMgaI ¸Anaanaasa
naIMbaU ka rsa sabasao Kasa .
Saturday, July 12, 2008
अमृतमय हो जीवन
Saturday, May 31, 2008
बाल कविता
कल्लू मोटा
कल्लू मोटा ना है खोटा
रखे हाथ में ,मोटा सोटा
रोज़ नहाता ,भर भर लोटा ।
चन्दू भाई ,है हलवाई
खुद ना खाता ,कभी मिठाई
इसीलिए कोठी बनवाई ।
माधो मट्टू,बड़ा निखट्टू
आदत से है अड़ियल टट्टू
सिर है उसका ,जैसे लट्टू ।
है बरजोरा, बड़ा चटोरा
खाता खीर बाइस कटोरा
तन है उसका जैसे बोरा ।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
Monday, February 11, 2008
धूप की चादर

घना कुहासा छा जाता है ,
ढकते धरती अम्बर ।
ठण्डी-ठण्डी चलें हवाएँ ,
सैनिक -जैसी तनकर ।
भालू जी के बहुत मज़े हैं-
ओढ़ लिया है कम्बल ।
सर्दी के दिन बीतें कैसे
ठण्डा सारा जंगल ।
खरगोश दुबक एक झाड़ में
काँप रहा था थर-थर ।
ठण्ड बहुत लगती कानों को
मिले कहीं से मफ़लर ।
उतर गया आँगन में सूरज
बिछा धूप की चादर ।
भगा कुहासा पल भर में ही
तनिक न देखा मुड़कर ।
आ भाई सूरज
Tuesday, January 1, 2008
चण्टू –बण्टू का नया साल


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
‘नए साल में क्या करेंगे ?’
-बण्टू बोला ।
चण्टू बोला –‘भाई मेरे
गाना गाएँगे ।’
‘गाना गाकर क्या करोगे ?’
‘दिल बहलाएँगे ।’
‘दिल बहलाकर क्या करोगे ?’

‘सुख बरसाएँगे ।
सुख बरसाकर इस भूमि पर
प्यार उगाएँगे ।’
बण्टू बोला –हम दोनों फिर
नाच दिखाएँगे ।
शैतानी भी खूब करेंगे
न घबराएँगे ।
जिसे भी सोता देखेंगे
उसे जगाएँगे ।
…………………
31-12-2007
Monday, November 12, 2007
5-कविताएँ
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1-मेरी नानी
मेरी नानी अच्छी नानी
बातें मैंने सारी मानी ।
रात हो गई मुझे सुनाओ
परियों वाली एक कहानी।
वही कहानी बड़ी पुरानी
जिसमें हो परियों की रानी ।
2- भारी बस्ता
माँ मुझसे यह नहीं उठेगा
बस्ता इतना भारी ।
इस बस्ते के आगे मेरी
हिम्मत बिल्कुल हारी
बोझ करा दो कुछ कम इसका
सुनलो बात हमारी ।
3-पत्ता
टूट गया जब डाल से पत्ता
उड़कर जा पहुँचा कलकत्ता
भीड़ देख्कर वह घबराया
धूल –धुएँ से सिर चकराया.
शोर सुना तो फट गए कान
वापस फिर बगिया में आया ॥
4- दादा जी
ये मेरे प्यारे दादा जी
हैं सबसे न्यारे दादा जी।
उठ सवेरे घूमने जाते
सूरज उगते वापस आते।
नहा-धोकर पूजा करत
जोश सभी के मन में भरते ।
.
5-रोमा
रोमा घर की पहरेदार
साथ में उसकी पिल्ले चार ।
चारों पिल्ले हैं शैतान
इधर- उधर हैं दौड़ लगाते
बिना बात भौंकते हैं जब
डाँट बहुत रोमा की खाते ।




