डॉ हरदीप कौर सन्धु
कितनी भोली और मासूम सी
फूलों जैसे खिला है चेहरा
खिल-खिल वह हँसती है
कद से वह लम्बी दिखती
अभी भोली बातें करती है
भर ओक बाँटे वह खुशियाँ
दुःख कभी न आएँ अंगना
हर पल एक नई सौगात बन जाए
जिन्दगी सतरंगी कायनात बन जाए
रहे भरता सदा रब
उसकी तमन्नाओं की पिटारी को
चल काला टीका लगा दूँ
कहीं नजर न लग जाए
मेरी परियों जैसी धी -रानी को
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