मेरा आँगन

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Friday, March 2, 2012

भर ओक बाँटे वह खुशियाँ


डॉ हरदीप कौर सन्धु

हमारे घर आई एक नन्हीं परी 
कितनी भोली और मासूम सी 
फूलों जैसे खिला है चेहरा
खिल-खिल वह हँसती है
कद से वह लम्बी दिखती 
अभी भोली बातें करती है 
भर ओक  बाँटे वह खुशियाँ 
दुःख कभी न आएँ अंगना
हर पल एक नई  सौगात बन जाए 
जिन्दगी सतरंगी कायनात बन जाए 
रहे भरता सदा रब 
उसकी तमन्नाओं की पिटारी को 
चल काला टीका लगा दूँ 
कहीं नजर न लग जाए 
मेरी परियों जैसी धी -रानी को 
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