मंजूषा ‘मन’
दादी ने रखा था शहर
में पाँव।
भाई नहीं उनको यहाँ की हवा
चल ही न पाई ये जीवन की नाव।
ना दिखी थी धरती ना आसमान
जँची न किसी तरह उनको ये ठाँव।
पौधे ना थे न
फूलों की बगिया
चिड़िया की चूँ चूँ न कौए की काँव।
समझ आ गया मुझे दादी का
दुख
लो चलते हैं अब हम फिर से गाँव।
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