मेरा आँगन

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Tuesday, November 18, 2008

कमज़ोर दृष्टिवाले बच्चे


कमज़ोर दृष्टि वाले बच्चे
( प्राथमिक विद्यालयोंके अध्यापकों के लिए एक संदर्शिका)
लेखिका : अनीता जुल्का
मूल्य :26 रुपए ,पृष्ठ :56, प्रकाशक :राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद् ,श्री अरविन्द मार्ग नई दिल्ली-110016
कक्षा का रूप प्राय: सामान्य को ध्यान में रखकर निर्धारित किया गया है ।किसी भी प्रकार की कमज़ोरी वाले बच्चे के लिए उसमें अलग से कोई स्थान नहीं है।शिक्षण को छात्र केन्द्रित करने के लिए हर छात्र की विशेषता और कमी का ध्यान रखना ज़रूरी है ।इस कार्य को सजग शिक्षक ही कर सकता है ।यह पुस्तक ऐसे जागरूक शिक्षकों को दिशानिर्देश देने की सजग पहल करती है । यह पुतक छह अध्यायों में बाँटी गई है :-1-परिचय ,2-कमज़ोर दृष्टि वाले बच्चों के लिए कक्षा का व्यवस्थापन,3-पढ़ना और लिखना,4-अनुदेश का स्तर ,5-मनोसामाजिक समस्या ,6-विचारणीय विषय के अन्तर्गत विभिन्न पहलुओं पर विचार किया गया है । प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों को यह पुस्तक ज़रूर पढ़नी चाहिए

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

लौट के बुद्धू घर को आए


लौट के बुद्धू घर को आए:डॉ सरोजिनी प्रीतम
पृष्ठ : 32 , मूल्य :25 रुपए।
प्रकाशक: चिल्ड्रन बुक ट्रस्ट नेहरू हाउस ,
4 बहादुरशाह ज़फ़रमार्गनई दिल्ली-110002
हास परिहास के क्षेत्र में बच्चों के लिए बहुत कम लिखा गया है ; वह भी कविता में। डॉ सरोजिनी प्रीतम की यह पुस्तक इस कमी को पूरा करती है।यह एक नितान्त बुद्धू कहे जाने वाले बालक की अक़्लमन्दी तक पहुँचने की यात्रा है ।कवयित्री ने ने विभिन्न कविताओं को एक सूत्र में रोचक घटनाओं के एक सूत्र में पिरोया है ।इस प्रकार 22 कविताएँ मिलकर कथा को रोचकता प्रदान करती हैं।
इनमेंसे कुछ रोचक कविताएँ हैं:-
1. मैंने तो बस खाया चाँटा
2. कौन है बन्दर
3. बुद्धू का पिंजरा
4. बिल्ली ने जब रस्ता काटा
5. लौट के बुद्धू घर को आए
6. गंजे सिर पर ओले बरसे
7. असली मास्टर नकली मास्टर
8. फिर बुद्धू ने बस्ता फेंका
कविताओं के साथ चित्रों का संयोजन उन्हें और भी प्रभावशाली बना देता है ।यह पुस्तक छोटे बच्चों को ज़रूर पसन्द आएगी
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Tuesday, November 4, 2008

चिटकू : सुरेखा पाणंदीकर



चित्रांकन :मृणाल मित्र ;अनुवाद : मनमोहन पुरी
पृष्ठ :24 ;मूल्य :20 रुपए
प्रकाशक :चिल्ड्रन्स बुक ट्र्स्ट नेहरू हाउस ,4 बहादुरशाह ज़फ़र मार्ग
नई दिल्ली-110002

चिटकू”बालकथा का मुख्यपात्र चिटकू चूहा है , जो बहुत छोटा और चंचल है।अपनी चंचलता के कारण सूँ-सूँ करता पनीर की गन्ध सूँघता इधर –उधर दौड़ता है और मुन्नू कि प्लेट तक पहुँच जाता है। भागने पर मुन्नू की हॉकी स्टिक की चोट से उसकी दुम का एक सिरा अलग हो जाता है । चिटकू की माँ उसे अकेले बाहर जाने से मना करती है। माँ की बात को वह बहुत जल्दी भूल जाता है और लड्डू खाने के लोभ पर नियंत्रण नहीं कर पाता है; जिससे वह लड्डुओं के ढेर में दब जाता है । चुहिया माँ उसे किसी तरह बाहर निकालती है । एक बार फिर चिटकू बिल्ली के पंजे में फँस जाता है और भाग्य से किसी प्रकार बच जाता है । कहानी में रोचकता शुरू से आखिर तक बनी हुई है । छोटे बच्चों के मानसिक स्तर के अनुसार लिखी गई कहानियाँ बहुत कम हैं ।यह पुस्तक इस कमी की पूर्ति करने में सहायक है ।
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रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’’