मेरा आँगन

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Thursday, April 11, 2024

173-क्रिकेट की कला

 विजय जोशीपूर्व ग्रुप महाप्रबंधकभेल

 

क्रिकेट एक विशिष्ट खेल हैजिसमें न केवल एकाग्रता बल्कि खेल कला का अदभुत समायोजन हैयही कारण है अंतिम बाल तक रोमांचकारी इस खेल को देखने के लि लोग महीनों पहले से लालायित रहते हैं और कई बार तो अंतिम चरण तक उनकी साँसें थमी रहती हैंखिलाड़ियों के लि भी चुस्तदुरुस्त होने के साथ ही साथ एकाग्र चित्त से हर बाल को खेल पाना एक अनिवार्य शर्त हैलेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस में प्रबंधन की दृष्टि से भी अनेक संदेश छुपे हुए हैंइए उन पर एक नज़र डालें:-


1सफलता (Success) : खिलाड़ी पूरे मन से खेलते हुए जब शतक की आखरी बाल को खेलता है, तो सारा मैदान अभिनंदन की मुद्रा में झूम उठता हैजीवन में सफलता भी एक शतक की तरह ही हैइसे प्राप्त करने का भरसक और ईमानदार प्रयास कीजिसंदेश मात्र यह कि सफलता एक शतक है – इसे प्राप्त कीजिए। 

 2समस्या (Problem) : समस्याएँ जीवन का एक अनिवार्य अंग हैइनसे आपको कठिन से कठिन परिस्थितियों से जूझकर पार पाने की क्षमता हासिल होती हैये फेंके जाने वाली फिरकी गेंद के समान हैं इनको पूरे आत्मविश्वास के साथ खेलिसमस्या एक फिरकी या यार्कर है – इसका सामना कीजिए। 

 3असफलता (Failure) :  जीवन में सफलता के साथ ही साथ असफलता की संभावना भी सदैव बनी रहती है और इसके प्रभाव में आकर यदि आपने अपने मनोबल को प्रभावित होने दिया, तो फिर जीवन का प्रयोजन तक समाप्त हो सकता हैअत: इसे जाने दीजिइसकी उपेक्षा कीजियेअसफलता एक बाउंसर है – इसे जाने दीजिए। 

 


4भाग्य (Luck) : भाग्य भी कई बार आदमी का साथ दे जाता हैअत: ऐसे अवसर प्राप्त होने पर उनका पूरा सदुपयोग कीजिए।ऐसे मौकों पर जरा सा भी आलस या गफलत बहुत महँगी पड़ सकती हैबुद्धिमान इंसान हाथ आई किस्मत को कभी नहीं जाने देताइसे फुल टॉस बाल की तरह खेलिए।भाग्य एक फुल टॉस है – इसका पूरा उपयोग कीजि 

 

5- अवसर (Opportunity) : अवसर भी भाग्य का समानार्थी हैइसका सही समय पर सधा हुआ और सामयिक उपयोग आपके लि सफलता के द्वार खोल देता हैहमारी चिंता या चिंतन इसे ठीक से भुना पाने का होना चाहिए।एक फ्री हिट बॉल के समान ही इसे पूरे साहस के साथ खेलिए।अवसर एक फ्री हिट है – इसे कभी मत चूकि  

 यही है क्रिकेट की कला को जीवन रण में साहस और सम्मान के साथ खेल पाने का सहीसामयिक और सार्थक सूत्र

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Friday, November 9, 2007

तनाव के त्रिभुज में घिरे बच्चे


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
आज का दौर तरह-तरह के तनाव को जन्म देने वाला है ,घर-परिवार ,कार्यालय ,सामाजिक परिवेश का वातावरण निरन्तर जटिल एवं तनावपूर्ण होता जा रहा है ,इसका सबसे पहले शिकार बनते हैं निरीह बच्चे ।घर हो या स्कूल , बच्चे, समझ ही नहीं पाते कि आखिरकार उन्हें माता-पिता या शिक्षकों के मानसिक तनाव का दण्ड क्यों भुगतना पड़ता है। घर में अपने पति /पत्नी या बच्चों से परेशान शिक्षक अपने छात्रों पर गुस्सा निकालकर पूरे वातावरण को असहज एवं दूषित कर देते हैं। विद्यालय से लौटकर घर जाने पर फिर घर को भी नरक में तब्दील करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते ।यह प्रतिक्रियात्मक दृष्टिकोण छात्रों के मन पर गहरा घाव छोड़ जाता है । कोरे ज्ञान की तलवार बच्चों को काट सकती है ,उन्हें संवेदनशील इंसान नहीं बना सकती है ।शिक्षक की नौकरी किसी जुझारू पुलिसवाले की नौकरी नहीं है,जिसे डाकू या चोरों से दो-चार होना पड़ता है ।शिक्षक का व्यवसाय बहुत ज़िम्मेदार, संवेदनशील ,सहज जीवन जीने वाले व्यक्ति का कार्य है ; मानसिक रूप से रुग्ण व्यक्ति का कार्य- क्षेत्र नहीं है । आज नहीं तो कल ऐसे दायित्वहीन,असंवेदनशील लोगों को इस क्षेत्र से हटना पड़ेगा या हटाना पड़ेगा।प्रशासन को भी यह देखना होगा कि कहीं इस तनाव के निर्माण में उसकी कोई भूमिका तो नहीं है ?
छात्रों पर बढ़ता निरन्तर पढ़ाई का दबाव ,अच्छा परीक्षा-परिणाम देने की गलाकाट प्रतियोगिता कहीं उनका बचपन ,उनका सहज जीवन तो नहीं छीन ले रही है ?घर,विद्यालय ,कोचिंग सैण्टर सब मिलकर एक दमघोंटू वातावरण का सर्जन कर रहे हैं । बच्चे मशीन नहीं हैं ।बच्चे चिड़ियों की तरह चहकना क्यों भूल गए हैं? खुलकर खिलखिलाना क्यों छोड़ चुके हैं ?माता-पिता या शिक्षकों से क्यों दूर होते जा रहे हैं ? उनसे अपने मन की बात क्यों नही कहते ? यह दूरी निरन्तर क्यों बढ़ती जा रही है ?अपनापन बेगानेपन में क्यों बदलता जा रहा है? यह यक्ष –प्रश्न हम सबके सामने खड़ा है। हमें इसका उत्तर तुरन्त खोजना है ।मानसिक रूप से बीमार लोगों को शिक्षा क्षेत्र से दूर करना है ।मानसिक सुरक्षा का अभाव नन्हें-मुन्नों के अनेक कष्टों एवं उपेक्षा का कारण बनता जा रहा है ।क्रूर और मानसिक रोगियों के लिए शिक्षा का क्षेत्र नहीं है ।जिनके पास हज़ारों माओं का हृदय नहीं है ,वे शिक्षा के क्षेत्र को केवल दूषित कर सकते हैं ,बच्चों को प्रताड़ित करके उनके मन में शिक्षा के प्रति केवल अरुचि ही पैदा कर सकते हैं।हम सब मिलकर इसका सकारात्मक समाधान खोजने के लिए तैयार हो जाएँ ।