मेरा आँगन

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Tuesday, October 20, 2015

दादी


मंजूषा मन

छोड़ अपना गाँव पीपल की छाँव।
दादी ने रखा था  शहर में पाँव।

भाई नहीं उनको  यहाँ की हवा
चल ही न पाई ये जीवन की नाव।

ना दिखी थी धरती ना आसमान
जँची न किसी तरह  उनको ये ठाँव।

पौधे  ना थे न फूलों की बगिया
चिड़िया की चूँ चूँ न कौए की काँव।

समझ आ गया मुझे दादी का दुख
लो चलते  हैं अब हम फिर से गाँव।

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Saturday, July 13, 2013

सुनहरी सुबह




पंछियों ने चहककर कहा-
उठो, जागो, प्यारे बच्चो कि तुम्हे स्कूल बुला रहा है |

चुपके से ठंडी हवा ने कपोलों को छूकर कहा-
खिड़कियाँ खोलो जरा, देखो तुम्हें नजारा बुला रहा है
वो देखो बादलों की रजाई में दुबका सूरज भी कुनमुनाकर जाग उठा है
तुम भी आलस छोडो प्यारे बच्चो कि तुम्हे स्कूल बुला रहा है |

पलकें उठाकर तो देखो अपनी बगिया को
रंग बिरंगी यूनिफार्म में सजकर तितलियाँ भी पराग लेने चल पड़ीं हैं
तुम भी चल पड़ो बस्ता लेकर कि तुम्हें स्कूल बुला रहा है |

पन्ने फडफड़ाकर कब से तुम्हें जगा रही है तुम्हारी प्यारी कॉपी
कह रही, संग चलूंगी मैं भी, छोड़ न देना मुझे घर पे अकेली |
अरे रे ..मचल उठी है नन्हीं कलम भी , हाथों में आने को बेकल
लुढ़क ना जाए रूठकर उसे थाम लो तुम
लिख डालो नई इबारत कि तुम्हें स्कूल बुला रहा है |

आओ कि बाहें फैलाकर खड़ा है विद्यालय प्रांगण
हँसा दो अपनी खिलखिलाहट से कि गूँजे दिशाएँ
आओ कि पेड़ों ने तुम्हारी राहों में फूल बिखराए है
नन्हे हाथों से तुमने रोपे थे जो पौधे
प्यास उनकी बुझा दो कि तुम्हे स्कूल बुला रहा है |

देखो तो ज़रा , द्वार पे खड़ा सुरक्षा- प्रहरी
तुम्हारे स्वागत में, मूँछों में मुस्कराया है |
तोतली मीठी बोली में काका सुनकर मन उसका हरषाया है |
बाँध लो सबको पावन रिश्तों में कि तुम्हें स्कूल बुला रहा है |

आशीष तुम्हे देने को कब से खड़ी माँ शारदा वागेश्वरी
वीणा के तारों को सुर दो कि तुम्हें स्कूल बुला रहा है |
नन्ही उँगलियों से थामकर कलम को
चल पड़ो सृजन पथ पर कि तुम्हें स्कूल बुला रहा है |

चले आओ प्यारे बच्चो कि तुम्हें स्कूल बुला रहा है |



कमला निखुर्पा 
प्राचार्य,
के.वि.क्रमांक २ सूरत 

Friday, May 15, 2009

नहीं व्यर्थ बहाओ पानी



श्याम सुन्दर अग्रवाल

सदा हमें समझाए नानी,
नहीं व्यर्थ बहाओ पानी ।
हुआ समाप्त अगर धरा से,
मिट जायेगी ये ज़िंदगानी ।
नहीं उगेगा दाना-दुनका,
हो जायेंगे खेत वीरान ।
उपजाऊ जो लगती धरती,
बन जायेगी रेगिस्तान ।
हरी-भरी जहाँ होती धरती,
वहीं आते बादल उपकारी ।
खूब गरजते, खूब चमकते,
और करते वर्षा भारी ।
हरा-भरा रखो इस जग को,
वृक्ष तुम खूब लगाओ ।
पानी है अनमोल रत्न,
तुम एक-एक बूँद बचाओ ।
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E.Mail: sundershyam60@gmail.com

चिड़िया


श्याम सुन्दर अग्रवाल

सुबह-सवेरे आती चिड़िया,
आकर मुझे जगाती चिड़िया ।
ऊपर बैठ मुंडेर पर,
चीं-चीं, चूँ-चूँ गाती चिड़िया ।
जाना है,नहीं स्कूल उसे
न ही दफ्तर जाती चिड़िया ।
फिर भी सदा समय से आती,
आलस नहीं दिखाती चिड़िया ।
थोड़ा सा चुग्गा लेकर भी,
दिन भर पंख फैलाती चिड़िया ।
इससे सेहत ठीक है रखती ,
नहीं दवाई खाती चिड़िया ।
छोटी-सी है फिर भी बच्चो,
बातें कई सिखाती चिड़िया ।
रखो सदा ध्यान समय का,
सबको पाठ पढ़ाती चिड़िया ।
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E.Mail: sundershyam60@gmail.com

चिड़िया और बच्चा


श्याम सुन्दर अग्रवाल


फर-फर करती आई चिड़िया,
चोंच में तिनका लाई चिड़िया।
जगह सुरक्षित उस को रख गई,
नीड़ बनाने में वह लग गई ।
एक-एक तिनका खूब सजाया,
उसने सुंदर नीड़ बनाया ।
बिस्तर जैसे नर्म गदेला,
उसमें अंडा दिया अकेला ।
सेया अंडा तो निकला बच्चा,
बड़ा ही प्यारा, बड़ा ही सच्चा।
चिड़िया चोंच में दाना लाती,
डाल चोंच में उसे खिलाती ।
रोज रात को लोरी गाती,
बड़े प्यार से उसे सुलाती ।
बच्चे से बतियाती चिड़िया,
सब कुछ उसे सिखाती चिड़िया ।
उड़ना सीख वह बड़ा हो गया,
दूर गगन में कहीं खो गया ।
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संपर्क: बी-I/575, गली नं. 5, प्रताप सिंह नगर,
कोट कपूरा(पंजाब)-151204

E.Mail: sundershyam60@gmail.com