मेरा आँगन

मेरा आँगन

Tuesday, July 21, 2015

मेरी माँ



जाह्नवी लाटियान,कक्षा 5
(वेंकटेश्वर ग्लोबल स्कूल,सैक्टर-13 रोहिणी, नई दिल्ली)

मेरी माँ है सबसे न्यारी ।
मैं हूँ उसकी राजदुलारी ।
मैं उनकी आँखों का तारा।
उन जैसा कोई मुझे न प्यारा।

मेरा हौसला  सदा बढ़ाती।
मुझको अच्छे से  है पढ़ाती।
मुझे देती वह अच्छा ज्ञान।
सदा रखूँगी मैं उनका मान।

दिन-रात वो करती  काम।
करती नहीं  पल भर आराम।
मेरे जगने से पहले उठ जाती।
 मेरे सोने के बाद  सो पाती।

देखा नहीं उन्हें करते आराम।
करती रहती वो सदा काम।
आती उनमें कहाँ से शक्ति।
करती हूँ मैं माँ की भक्ति।

उनके जैसा और न दूजा।
क्यों न करूँ मैं उनकी पूजा।
मेरी माँ है सबसे न्यारी।
मैं हूँ उसकी राजदुलारी।
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Friday, July 10, 2015

देश-प्रेम



सृष्टि
कक्षा 7वीं डी
विकास भारती पब्लिक स्कूल रोहिणी नई दिल्ली
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देश के लिए जो है जान गँवाते
नहीं कभी वे शीश झुकाते
स्वाभिमान से रहना सिखाते
देश के रक्षक वे कहलाते

सीमा के हैं वे अटल प्रहरी
दुश्मन की गोली सीने पर खाते
चित्र: गूगल से साभार
कभी न किसी को पीठ दिखाते
मरने पर वे शहीद कहाते

है वे भी किसी माँ के लाल
किसी के पिता किसी के भाई
इनके ही कारण हम चैन से सोते
देख सकते नहीं वे किसी को रोते

पढ़-लिख कर हम आगे बढ़ेंगे
अच्छे-अच्छे नित कर्म करेंगे
देश  का  मान  बढ़ाएँगें
अच्छे बच्चे कहलाएँगे

हम भी देश की सेवा करेगे
देश से भ्रष्टाचार मिटाएँगे
देश को आगे बढ़ाएँगे
खुशहाल सभी को बनाएँगें

हरा-भरा हो देश हमारा
धन-धान्य से हो यह पूरित
स्वच्छ रहे यह धरा हमारी
जन-जन रहे यहाँ का हर्षित


Monday, June 1, 2015

दो कविताएँ



1-जल
सपना मांगलिक

जल जीवन है,जल ही धन है
जल बिन धरती उजड़ा वन है
जहाँ देखो वहाँ जल की माया
बिन जल असंभव अन्न ,पेड़, छाया
मचे त्राहि-त्राहि जल बिन क्षण -क्षण
हो पशु -पक्षी या फिर कोई जन
जल वाष्प बदरा बन छाये
बिन जल सावन सोचो क्या बरसाए ?
गरमी  भीषण जीवन कहीं ना
धरा है गहना ,और जल नगीना
मैला कचरा बहाकर जल में
सोचो जरा क्या पाओगे?
जब जल ही ना होगा तब बोलो
तुम भी कहाँ जी पाओगे ?
ना करो व्यर्थ जल को बच्चो
करो संरक्षण धरा पर इसका
जल हो रहा अब यहाँ पर कम है
जल जीवन है जल ही धन है
जल बिन धरती उजड़ा वन है
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एफ-६५९ कमला नगर आगरा २८२००५
फोन-९५४८५०९५०८ ईमेल sapna8manglik@gmail.com
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2-प्रेम गणित - 
 सपना मांगलिक

प्रेम से करो हल बच्चो
नफरत के तुम सभी सवाल
भूलकर गलती दूजों की
करो ख़त्म तुम सभी बवाल
सुनो प्रेम को जोड़ो अबसे
नफरत को दो तुम घटा
कर गुणा स्नेह का दिल से
ईर्ष्या को दो शून्य दस बटा
शेष में रखो फिर प्रेम को ही तुम
बाकी दो सबकुछ फिर हटा
देखना इस प्रेम गणित का जादू
कितना देगा फिर तुम्हें मजा
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एफ-६५९ कमला नगर आगरा २८२००५
 फोन-९५४८५०९५०८ ईमेल sapna8manglik@gmail.com
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Saturday, May 30, 2015

तीन कविताएँ



 डॉ.रामनिवास  'मानव' की तीन कविताएँ

1-होगा विकास तभी 

बच्चो, पढ़ना बहुत ज़रूरी।
पर उतना ही खेल ज़रूरी।
तालमेल दोनों में होगा,
होगा व्यक्तित्वविकास तभी।

देशदेश का ज्ञान ज़रूरी,
और बड़ा विज्ञान ज़रूरी।
ज्ञान और विज्ञान मिलेंगे,
होगा व्यक्तित्वविकास तभी।

अधिकारकर्त्तव्य को जानो।
जीवनमंजिल को पहचानो।
जीवन क्या है ? जब समझोगे,
होगा व्यक्तित्वविकास तभी।

खेलकूद को जीवन समझो,
और काम को पूजन समझो।
कामकाज की आदत डालो,
होगा व्यक्तित्वविकास तभी।
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2-  मिलकर सोचें

मिलकर बैठें, मिलकर सोचें,
बातें करें विकास की।

आपस में हो भाईचारा।
मन हो ज्यों मन्दिरगुरुद्वारा।
रहे भावना भरी मनों में
मस्ती औ उल्लास की।

अलगअलग हों रंग सभी के।
अलगअलग हों ढंग सभी के।
फिर भी रहे एकता सब में,
डोरी हो विश्वास की।

नापें धरती, उड़ें गगन में।
संकल्पों का बल हो मन में।
स्वर्ग बनाना है धरती को,
आशा करें उजास की।
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3-दादी माँ

दादी माँ का क्या कहना है !
सोनेचाँदी का गहना है।
दयाधर्म की सूरत दादी।
ममता की है मूरत दादी।

अनुभव की गठरी है दादी।
जीवन की पटरी है दादी।
माना इनकी उम्र पकी है,
लेकिन दादी नहीं थकी है।

धीरेधीरे चलती दादी।
आशीषों में फलती दादी।
पूरे घर का हाथ बँटाती।
जीभर सब पर प्यार लुटाती।

दादी से घर, है घर दादी।
सबसे बड़ी धरोहर दादी।
प्यारभरी पिचकारी दादी।
लगती मां से प्यारी दादी।
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