Thursday, March 22, 2018
Sunday, December 31, 2017
145
सुनीता काम्बोज के दो बालगीत सुनने के लिए निम्नलिखित लिंक को क्लिक कीजिए-
1
मुझको पंख लगाने दो
2
छोटी चिड़िया मतवाली
Monday, November 27, 2017
144
बाल
कविताएँ : डॉ. ज्योत्स्ना शर्मा
1
हवा चली है सर-सर-सर
बादल आए मटकी भर
बादल आए मटकी भर
पानी बरसा झर-झर-झर
भीग गए चिड़िया के पर
काँप रही है थर-थर-थर
उसका भी बनवा दो घर
रहे चैन से जी भरकर
देखे आँखें मटका कर ।
2
साइकिल के हैं पहिए दो
तीन सहेलियाँ अब क्या हो
मोनू जी ले आए कार
हैं गाड़ी में पहिए चार ।
बिट्टू का है सुन्दर नाच
देख रहे हैं बच्चे पाँच ।
झूठी बातें कभी मत कह
तभी मिलेंगे लड्डू छह ।
नानी कहें कहानी सात
सुनते बीती पूरी रात ।
बाक़ी रह गया पढ़ना पाठ
उट्ठक-बैठक होंगी आठ।
सारे दिन बस करते शोर
नौ बच्चे पढ़ने के चोर ।
आ गई विद्यालय की बस
उसमें भी हैं खिड़की दस ।
3
गाँव गए थे चुन्नू जी
मिले वहाँ पर मुन्नू जी
दोनों ने मिल किया कमाल
गली, खेत में खूब धमाल
बाग़ों में घूमे दिनभर
बातें करते चटर-पटर
तोड़ रहे थे कच्चे आम
चुन्नू जी गिर पड़े धड़ाम
कान पकड़कर बोले राम !
कभी करूँ न ऐसा काम ।।
4
मूँछें
चाचा जी की प्यारी मूँछें
लगती कितनी न्यारी मूँछें
खूब मरोड़ें दिन भर इनको
ओ हो हो बेचारी मूँछें
ज़रा न झुकतीं सतर नुकीली
भैया बड़ी करारी मूँछें
मैं भी ऐसी मूँछ लगाऊँ
चाचा जी जैसे बन जाऊँ ।
-0-
Friday, November 24, 2017
143
हठ कर बैठी गुड़िया रानी
गुंजन अग्रवाल
हठ कर बैठी गुड़िया रानी, चाँद मुझे दिलवा दो।
दादी
बाबा नाना नानी, चाँद मुझे दिलवा दो।
छोड़ दिया है दाना
पानी, चाँद मुझे दिलवा दो।
करती
रहती आनाकानी,चाँद मुझे दिलवा दो।
चाँद गगन में दूर
बहुत है, समझो गुड़िया
रानी।
आते आते धरती पर हो,जाए सुबह
सुहानी।
खाओ पहले एक चपाती, पी लो थोड़ा पानी।
नींद अभी भर लो आँखों
में, करो नही मनमानी।
ममता की बाहों में घिरकर, सोई गुड़िया रानी।
सपन सलोने आए फिर तो,खोई
गुड़िया रानी।
मिलने आए नील गगन से, चन्दा मामा
प्यारे।
किन्तु शिकायत करती गुड़िया,लाए नही सितारे।
भूल गया मैं माफी
दे दो, गुड़िया रानी प्यारी।
लेकर के मैं आऊँगा
कल, तारों -भरी सवारी।
बढ़ती जाती देख माँग को,
चंदा भी घबराया।
नील गगन पर ही था अच्छा, क्योंकि सपने में आया।
रूठी मटकी बोली माँ से, गुड़िया सुबह सवेरे।
चन्दा झगड़ा करता अच्छे, खेल खिलौने
मेरे।
भूल गई थी अपनी जिद को, भूली सब मन मानी।
चहक रही थी घर आँगन में, अब तो गुड़िया
रानी।
-0-
Tuesday, November 14, 2017
142
सुनीता काम्बोज के 4 बालगीत
1
बन्दर की आई सरकार
शेर गया है अबकी हार
बैठा बन्दर
बड़ा कलन्दर
खुश होता है
अंदर- अंदर
नाचे गाए
खुशी मनाए
जो जीता अब
वही सिकन्दर
चूहा अब है थानेदार
बन्दर की आई सरकार
हौले- हौले
मनवा डोले
खड़ी गिलहरी
खिड़की खोले
शेर चला है
मुँह लटकाए
अब बेचारा
कैसे
बोले
लगता है जैसे बीमार
बन्दर की आई सरकार
राज मिला है
काज मिला है
बन्दर को अब
ताज मिला है
कूद रहा है
डाली- डाली
खुशियों का पल
आज मिला है
उसके गुण गाए अखबार
बन्दर की आई सरकार
बजी बधाई
जनता आई
बन्दर जी की
हुई सगाई
बने बराती
घोड़ा-
हाथी
कोयल गाती
ज्यों शहनाई
जंगल में जैसे त्योहार
बन्दर की आई सरकार
-०-
2
साइकिल मेरी छोटी-सी है
दिखती बड़ी कमाल
सीधी -सीधी चलती लेकिन
कभी बदलती चाल
पहिये इसके काले हैं ये
नीली है कुछ लाल
धोकर इसको मैं चमकाता
रखूँ सदा सँभाल
दादा जी ये
जन्मदिवस पर
लाए थे उपहार
इसमें मुझको दिखता अपने
दादा जी का प्यार
-०-
3
दादा जी एक पैसा दो
गोल-गोल हो ऐसा दो
टॉफ़ी लेकर आऊँगा
चूस-चूसकर खाऊँगा
मैं तो अच्छा बच्चा हूँ
सीधा -साधा सच्चा हूँ
रोज किताबें पढ़ता हूँ
नहीं किसी से लड़ता हूँ
बात हमारी मानो जी
छोटा बच्चा जानो जी
-०-
4
बन्दर झूले डाली-डाली
उसके पीछे भागा माली
माली बोला -नीचे आओ
मत पेड़ों के पात गिराओ
बन्दर बोला मेरी मर्जी
दौड़ा –दौड़ा आया दर्जी’
बन्दर बात नहीं अब माने
दर्जी ताली लगा बजाने
बन्दर को फिर गुस्सा आया
उसने अपना फोन मिलाया
फोन लगा था जाकर थाने
थानेदार लगा मुस्काने
बन्दर बोला मत मुस्काओ
पहले मेरी रपट लिखाओ
-०-
Friday, November 10, 2017
141
दादी अम्मा से सुनी कहानी
सत्या शर्मा ‘कीर्ति’
[ 14 वर्ष की अवस्था में लिखी कविता ]
बच्चों आज मैं तुम्हें एक ऐसी कहानी सुनाने जा रही हूँ
जिसे कभी मेरी प्यारी दादी अम्मा ने
सुनाया था ।
एक रात मैं सोई थी , लगा कोई बच्ची रोई थी ।
मैं उठी पर डर रही थी , क्योंकि घर में कोई बच्ची नहीं थी ।
रात की गहरी खामोशी सी थी , और मैं अकेली अनाड़ी सी थी ।
घर और आबादी में थी दूरी , ये भी थी एक मेरी मजबूरी ।
पर मैं खुद में साहस भर के,हाथों में फर्सा लेकरके ।
अपने बालों को समेट कर , चल दी ईश्वर को याद कर ।
दादी माँ की बातें सुनकर ,काँटा हो गई मैं सूख कर ।
दादी से मैं यूँ लिपट गई , जैसे सारी दुनिया सिमट गई।
दादी बोली- गुड़िया रानी, सुनो अब आगे की कहानी ....
दादी जो बोली आगे ,सुन कर सारे हिम्मत भागे ।
हाथों में फिर फर्सा लेकर ,सारे जग की हिम्मत भरकर ।
लगी ढूँढने आवाज को , खोजने लगी उस राज को ।
एक रात मैं सोई थी , लगा कोई बच्ची रोई थी ।
मैं उठी पर डर रही थी , क्योंकि घर में कोई बच्ची नहीं थी ।
रात की गहरी खामोशी सी थी , और मैं अकेली अनाड़ी सी थी ।
घर और आबादी में थी दूरी , ये भी थी एक मेरी मजबूरी ।
पर मैं खुद में साहस भर के,हाथों में फर्सा लेकरके ।
अपने बालों को समेट कर , चल दी ईश्वर को याद कर ।
दादी माँ की बातें सुनकर ,काँटा हो गई मैं सूख कर ।
दादी से मैं यूँ लिपट गई , जैसे सारी दुनिया सिमट गई।
दादी बोली- गुड़िया रानी, सुनो अब आगे की कहानी ....
दादी जो बोली आगे ,सुन कर सारे हिम्मत भागे ।
हाथों में फिर फर्सा लेकर ,सारे जग की हिम्मत भरकर ।
लगी ढूँढने आवाज को , खोजने लगी उस राज को ।
छत भी बड़ी थी, घर भी बड़ा था ।
कोना खिड़की सब ही बड़ा था ।
अकेले मैंने सब जगह खोजा , मेरे सिवा न था कोई दूजा ।
आखिर क्या बात है , इसमें क्या राज है ।
जरूर कोई भूत होगा, चाहे कोई प्रेत होगा ।
हो सकता है भगवान हो ,
कोना खिड़की सब ही बड़ा था ।
अकेले मैंने सब जगह खोजा , मेरे सिवा न था कोई दूजा ।
आखिर क्या बात है , इसमें क्या राज है ।
जरूर कोई भूत होगा, चाहे कोई प्रेत होगा ।
हो सकता है भगवान हो ,
मेरे जीवन का अरमान हो ।
फिर मुझे कुछ याद आया ,
फिर मुझे कुछ याद आया ,
खोलना भूल गई थी पीछे का दरवाजा ।
फिर हौले से जो दरवाजा खोली,
लगा चारों है ओर कोयल बोली।
वाह! क्या नजारा था ,
फिर हौले से जो दरवाजा खोली,
लगा चारों है ओर कोयल बोली।
वाह! क्या नजारा था ,
जैसे सब
हमारा था ।
चारों ओर हरियाली थी ,
चारों ओर हरियाली थी ,
आकाश में कुछ लाली थी ।
सुगंधित हवा चल रही थी,
सुगंधित हवा चल रही थी,
फूलों की
सुंदरता मन मोह रही थी ।
झरने सैकड़ों बह रहे थे
झरने सैकड़ों बह रहे थे
पंछी कलरव कर रहे थे ।
इन सबों के बीच में ,
इन सबों के बीच में ,
फूलों की
प्यारी सेज में ।
जैसे स्वर्ग की अप्सरा हो ,
जैसे स्वर्ग की अप्सरा हो ,
या परियों
की शहजादी हो ।
देखने में तो बड़ी सुंदर थी ,
देखने में तो बड़ी सुंदर थी ,
पर बेचारी रो रही थी ।
मैंने ख़ुशी और ममता से भरकर
चूम लिया उसे गोद में लेकर ।
फिर जाने क्या इत्तिफाक हुआ,
मैंने ख़ुशी और ममता से भरकर
चूम लिया उसे गोद में लेकर ।
फिर जाने क्या इत्तिफाक हुआ,
जैसे सब धुँधला सा गया ।
मुझे न फिर कुछ होश रहा ,
मुझे न फिर कुछ होश रहा ,
जग का भी कुछ न ध्यान रहा ।
बाद में जब होश आया ,
बाद में जब होश आया ,
वहाँ तो वीराना सा था छाया।
पर! गोद में एक हसीना थी,
पर! गोद में एक हसीना थी,
जो बहुत ही प्यारी थी ।
जानती हो वो कौन है , मैंने पूछा कौन है ।
मेरे पास जो सोई है , बातों में मेरे खोई है ।
वही है देखो बड़ी सयानी , मेरी प्यारी गुड़िया रानी ।
दादी माँ की बातें सुनकर , कुप्पा हो गई मैं फूलकर।
दादी को भी भूल गई, जैसे मुझे यहाँ आकर कोई भूल हुई ।
फिर दादी कुछ हामी भरकर, बोली मुझसे कुछ हँसकर ।
मैंने ये कहानी तब सुनी थी , जब तुमसे भी छोटी थी ।।
-0-
जानती हो वो कौन है , मैंने पूछा कौन है ।
मेरे पास जो सोई है , बातों में मेरे खोई है ।
वही है देखो बड़ी सयानी , मेरी प्यारी गुड़िया रानी ।
दादी माँ की बातें सुनकर , कुप्पा हो गई मैं फूलकर।
दादी को भी भूल गई, जैसे मुझे यहाँ आकर कोई भूल हुई ।
फिर दादी कुछ हामी भरकर, बोली मुझसे कुछ हँसकर ।
मैंने ये कहानी तब सुनी थी , जब तुमसे भी छोटी थी ।।
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Sunday, September 17, 2017
140
ज्योत्स्ना प्रदीप
1-राष्ट्रीय फूल
प्यारा सपना , जैसे जल का !
श्वेत
, गुलाबी कहीं नील है
घर इसके रे ताल, झील है ।
कीचड़ में भी खिल -खिल जाता
पाठ ये जीवन का सिखलाता ।
राष्ट्रीय फूल यही हमारा
मनमोहक ये प्यारा- प्यारा ।
2-हरी भरी सब्ज़ियाँ
रस-भरी सब्ज़ियाँ ।
आलू ,पालक,शलगम, गाजर
गोभी ,मूली , मटर ,टमाटर
।
धोकर माँ जब इन्हें पकाती
भैया को भी खूब सुहाती ।
करे न कोई आनाकानी
मज़े -मज़े से खाती रानी ।
3-राष्ट्रीय वृक्ष
नीचे बैठो इसके भैया ।
माँगे तुमसे कब मीठा जल !
हवा बहाए शीतल -शीतल ।
भू का ये वरदान सुखद है
पेड़ों में राजा बरगद है ।
वृक्ष ये बरगद का है प्यारा
राष्ट्रीय वृक्ष है यह हमारा ।
4- लोई
मेरी बिल्ली का नाम है लोई
आ जाती है जब माँ सोई ।
वो उजली, गोरी- गोरी है
उसकी मज़ेदार चोरी है ।
चुप से वो घर में आती है
दही,दूध चट कर जाती है ।
5- चींटी
चींटी देखो कितनी छोटी
सीधे- सीधे जाती है
सीधे -सीधे आती है ।
जब वो खाना पाती है
सबको पास बुलाती है ।
चीनी,टॉफी ढोती है
कभी नहीं ये सोती है ।
रहती है अपने दल में
घर में चाहे ,जंगल में ।
नहीं लगा मन दंगल में
श्रम करती है पलपल में ।
मेहनत इसको प्यारी है
हाथी पर भी भारी है !
-0-
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