Monday, August 15, 2016
Thursday, December 3, 2015
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तीन कविताएँ
डॉ•रामनिवास ‘मानव’
1-हुई सुबह
उठो मियाँ अब
हुई सुबह,
स्वच्छ धुली अनछुई सुबह।
उठकर चन्दा–तारे अब,
गये घूमने सारे तब।
तुम भी उठो, घूमो–फिरो,
क्यों सोये हो प्यारे अब !
ओस, फूल, खुशियाँ लेकर,
आई है जादुई सुबह।
कौआ कहता रोटी दो,
चाहे छोटी–मोटी
हो।
चिड़िया गुस्से में बैठी,
कहती मेरा गीत सुनो।
अब इनको क्या कहना है,
पूछती छुईमुई सुबह।
-0-
2-मोनू राजा
मोनू राजा आजा,
बैठ बजाएँ बाजा।
मिलकर सुनें कहानी,
राजा था या रानी।
खेलें चोर–सिपाही,
मेटें सभी बुराई।
तितली पकड़ें भागें,
परी–लोक में
जागें।
पीयें दूध–बताशा,
देखें खूब तमाशा।
नहीं किसी को डांटें,
जी–भर खुशियाँ
बांटें।
-0-
3- मोनू का उत्पात
पापाजी का पैन चुराकर,
मूँछ बनाई मोनू ने।
दादाजी का बेंत उठाकर,
पूँछ लगाई मोनू ने।
करने लगे उत्पात अनेक,
उछल–उछल कर
फिर घर में।
किया नाक में दम सभी का,
मोनूजी ने पल–भर में।
मम्मी के समझाने से भी,
न मोनू महाशय माने।
डंडाजी जब दिये दिखाई,
तब आए होश ठिकाने।
-0-
Friday, October 30, 2015
दीवाली
प्रकृति दोशी
फिर से दीवाली आई
संग लेकर खुशियाँ आई।
घर- घर हो
रही सफाई,
फिर से दीवाली आई।
अपने प्यारे घर में भी,
होगी लो आज
पुताई।
फिर से दीवाली आई।
दादी -मम्मी
मिलकर सब
बना रहे हैं मिठाई।
फिर से दीवाली आई।
हम भाई- बहनों
ने मिल
रंगोली है बड़ी सजाई।
फिर से दीवाली आई।
खूब बताशे खाएँगे हम
झोली भरकर मिलेगी लाई।
फिर से दीवाली आई।
घर के सब लोगों ने मिल
फुलझड़ी खूब चलाई।
फिर से दीवाली आई।
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Tuesday, October 20, 2015
दादी
मंजूषा ‘मन’
दादी ने रखा था शहर
में पाँव।
भाई नहीं उनको यहाँ की हवा
चल ही न पाई ये जीवन की नाव।
ना दिखी थी धरती ना आसमान
जँची न किसी तरह उनको ये ठाँव।
पौधे ना थे न
फूलों की बगिया
चिड़िया की चूँ चूँ न कौए की काँव।
समझ आ गया मुझे दादी का
दुख
लो चलते हैं अब हम फिर से गाँव।
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