मेरा आँगन

मेरा आँगन

Thursday, October 13, 2011

The Soldier.


Anviksha Srivastava 
class 5th,age   10 years
school : Plainview  Elementary  School,  Ardmore Oklahoma ,        America         

रक्षक फ़ाउण्डेशन  के द्वारा आयोजित  ''गौरव  गाथा '''प्रतियोगिता में १० साल की अन्वीक्षा को  इस कविता के लिए  सांत्वना पुरस्कार मिला है .
नन्ही अन्वीक्षा की कविताएँ और कहानियाँ डैलस की पत्रिका फन एशिया और आर्डमोर के पुस्तकालय की पत्रिका , ऑनलाइन कृत्या और लेखनी  में प्रकाशित होती रहती हैं

The Soldier. 

Anviksha Srivastava 

I walk alone ,
so others
 
can walk with
their father.
Mom puts out
3 plates but,we're
only two.
I celebrate my
holidays alone,
so others
can share
their happiness
together.

I practice sports alone,
so others can practice
with their father
I sleep uncuddled,
so others can
cuddle with their father
everybody listens to the news
in concern
but, I
listen for my father.
I am proud that he is there
 
so the nation can sleep fearless
 
because, my dad is a sold
ier. 
-0-

Thursday, October 6, 2011

रंगोली-युशरा ख़ान

मेरी भानजी ( मुमताज और श्री टी एच खान की छोटी बेटी) युशरा ख़ान ने अपने विद्यालय की रंगोली प्रतियोगिता में प्रथम पुरस्कार प्राप्त किया है । अवलोकन करके आप भी अपनी प्रतिक्रिया दीजिएगा ।
- रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Tuesday, September 20, 2011

शिक्षक -चोका



[शिक्षार्थी के लिए हर दिन शिक्षक दिवस है । ज्ञान की देवी सरस्वती शिक्षक के माध्यम  से ही हमारे हृदय तक पहुँचती है ।स्कूल या कॉलिज ही नहीं , जीवन में वह शिक्षक हमें किसी भी मोड़ पर, किसी भी रूप में मिल सकता है । आवश्यकता है उसको पहचानने की ।
- ऋता शेखर मधु
तेजस्वी थे वो
विलक्षण थी सोच
प्रखर वक्ता
जीवंत अभिव्यक्ति
थे वो हमारे
द्वितीय राष्ट्रपति
राधाकृष्णन
आदर्श शिक्षक भी
जन्मदिवस
बना सम्मान दिन
हमारे लिए
शिक्षक दिवस भी
मेरे शिक्षक
निस्पृह औ निश्छल
बन जाते जो
पथ के प्रदर्शक
देते रहते
सदा मार्गदर्शन
सीख लेते हैं
आत्मविश्वास हम
कर जाते जो
स्फ़ुरित, चिंतन को
आगे उनके
नतमस्तक हम
शत शत नमन !
-0-

Saturday, September 10, 2011

मेरी माँ : एक फ़रिश्ता



प्रियंका सैनी

कक्षा 10 स
राजकीय प्रतिभा विकास विद्यालय ,रोहिणी सेक्टर -11 ,
 नई दिल्ली 

जाती थी माँ हर रोज़
उस हवेली  में
पूछा मैंने हर रोज़
हवेली जान के बारे में,
कहती माँ हर रोज़ यही
‘दुनिया का स्वर्ग है वहीं’
सोचा करती मैं ख़्यालों में-
वो हवेली माँ की तो नहीं ?
याद आई मुझे वो एकादशी की रात
कर रही थी जब मैं
अपने जन्म-दिन की बात
कहा था माँ ने -‘
दूँगी तुझे एक मधुर उपहार
अबकी बार ;
पर नहीं थे पैसे  माँ के पास ।
एक दिन पहुँची मैं माँ के पीछे-पीछे,
देखा-खड़ी है वहाँ एक औरत
माँ कह रही थी उसे ठकुराइन,
ठकुराइन गुर्राकर बोली-
‘जा बनाकर ला मेरे लिए कॉफ़ी’
उसका बोलना लगा मुजे बेढंगा
समझ गई थी मैं अब सब कुछ
जोड़ रही थी पैसे माँ
मेहनत करती थी दिन-रात
मुझे देना चाहती थी मधुर उपहार ।
माँ कह रही थी ठकुराइन को-
‘ कल मुझे जाना है रात होने से पहले
देना है अपनी लाडो को प्यारा उपहार’-
सुनकर इतना ढरके मेरे आँसू
गीली हो गईं हथेलियाँ ।
‘ओह ! मेरी माँ !’ -निकला मेरे मुँह से ।
ढली चाँदनी, आई सुबह नई !
सबसे प्यारा उपहार मुझे मिला
वह उपहार था -मेरी नई स्कूल ड्रेस,
मेरी माँ भला क्या कम है
किसी आकाश से उतरने वाले फ़रिश्ते से !
सचमुच फ़रिश्ता है मेरी माँ !!
-0-

Sunday, September 4, 2011

क्या हुआ इंसान को


-अभिषेक सिंहल

क्या हुआ इंसान को , संवेदना से भी झिझकता है,
अपरिचित की हत्या पर, केवल चर्चा करता रहता है ।
मरने वाले के परिजनों को रोते-बिलकते देखता है,
आँखों को मूँद कर तनाव मुक्त सुषुप्त हो जाता है ।
विचारहीन बातें कर, चाय की चुस्कियाँ लेता है,
तर्क-वितर्क कर, सरकार और व्यवस्था को कोसता है ।
देश और सरकार की निंदा कर, आक्रोश प्रकट करता है,
देश का कुछ नहीं हो सकता, कहते-कहते हँसता है ।
देश के प्रति कर्तव्य पर, नेताओं पर प्रश्न चिह्न लगता है ,
वोट डालने की प्रक्रिया पर, चुप्पी साधे रहता है।
निर्लज्ज है यह मनुष्य, जो कि जानवर से भी बदतर है ,
जानवर तो अपनी प्रजाति को ही अपना अस्तित्व समझता है ।
समाज में हुए उपद्रव को, परिवार से भिन्न क्यों समझता है ?
क्या अपने किसी परिजन के साथ कुछ होने की प्रतीक्षा करता है?
जब तक नहीं होगा हमारा नारा , “मेरा समाज मेरा परिवार”,
तब तक होते रहेंगे अत्याचार
हम पर हर बार, हर बार , हर बार
-0-

Monday, August 15, 2011

पठनीय और संग्रहणीय पुस्तकें


पुस्तक परिचय
अमर शहीद खुदीराम बोस (जीवनी):पंकज चतुर्वेदी ,पृष्ठ :24 , मूल्य : 11 रुपये ,संस्करण :2010, प्रकाशक : नेशनल बुक ट्र्स्ट ,इण्डिया नेहरू भवन 5 , इन्स्टीट्यूशनल एरिया , फेज़-2 ,वसन्त कुंज , नई दिल्ली-110070
11अगस्त 1908 की सुबह किशोर खुदीराम बोस को फाँसी दे दी गई । अवस्था 19 वर्ष ।किंग्सफोर्ड को बम विस्फोट से मारने का प्रयास किया । उस दिन बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं थे, उनके स्थान पर उनके मित्र की पत्नी और बेटी मारी गई ।मुज़फ़्फ़रपुर के इस काण्ड  में खुदीराम को फाँसी की सजा सुनाई गई । मुज़फ़्फ़रपुर जेल के जल्लाद ने खुदीराम को फाँसी का फ़न्दा लगाने से मना कर दिया तो अलीपुर जेल के जल्लाद को बुलाया गया ।1857 के बाद का यह सबसे बलिदानी था । देश प्रेम की भावना इनकी नस-नस में समाई हुई थी ।पंकज चतुर्वेदी ने बहुत ही रोचक और सरल भाषा में खुदीराम बोस के जीवन और त्याग का चित्रण किया है ।यह पुस्तक किशोरों के लिए पठनीय ही नही वरन् संग्रहणीय भी है ।
विपिन चन्द्र पाल (जीवनी):पंकज चतुर्वेदी ,पृष्ठ :24 , मूल्य : 11 रुपये ,संस्करण :2010, प्रकाशक : नेशनल बुक ट्र्स्ट ,इण्डियानेहरू भवन 5 , इन्स्टीट्यूशनल एरिया , फेज़-2 ,वसन्त कुंज , नई दिल्ली-110070
सशस्त्र विद्रोह के हिमायती विपिन चन्द्र पाल ने वन्देमातरम् का नारा लगाने वाले पत्रकारों की पिटाई से व्यथित होकर ‘वन्देमातरम्’ अखबार शुरू करने का निश्चय किया । रवीन्द्र नाथ टैगौर और अरविन्द घोष ने इस कार्य में भरपूर सहयोग किया ।अपनी कलम से विपिनचन्द्र पाल ने आज़ादी के साथ -साथ सामाजिक चेतना जगाने का काम भी किया ।रूढ़ियों का विरोध कलम के द्वारा तो किया ही अपने जीवन में भी उन आदर्शों का पालन किया । सम्पादन के क्षेत्र में इनका विशिष्ट कार्य सदा याद किया जाएगा ।लन्दन से प्रकाशित अंग्रेज़ी पत्र ‘स्वराज ‘ का सम्पादन किया  । अंग्रेज़ी मासिक ‘हिन्दू रिव्यू’ की स्थापना की इलाहाबाद से मोती लाल नेहरू द्वारा प्रकाशित ‘डेमोक्रेट’ साप्ताहिक का भी सम्पादन किया । बहुमुखी प्रतिभा के धनी विपिन चन्द्र पाल का जीवन प्रत्येक भारतीय के लिए अनुकरणीय है । इस छोटी -सी पुस्तक में पंकज चतुर्वेदी जी ने  इनके जीवन के विभिन्न आयामों को बखूबी सहेजा है ।इस तरह की पुस्तकों की आज के दौर में ज़्यादा ज़रूरत है ।
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Saturday, August 13, 2011

पंकज चतुर्वेदी जी का रोचक बाल साहित्य


कहाँ गए कुत्ते के सींग ?
पहले दुनिया ऐसी नहीं थी; यह बात वैज्ञानिक भी मानते हैं और समाज भी। पूर्वोत्तर राज्यों में यह मान्यता है कि पहले कुत्ते के सींग होते थे। फिर वे सींग गए कहाँ ? कहीं तो गए होंगे ना ? यह पुस्तक नगालैण्ड की एक ऐसी ही मान्यता पर आधरित है।

लो गर्मी आ गई
मौसम का बदलना महसूस करना बेहद जटिल है। कहा नहीं जा सकता कि कल से अमुक ऋतु आ जाएगी। लेकिन भारतीय वार-त्योहार बदलते मौसम की ओर इशारा करते हैं। रंगों का त्योहार होली किस तरह से गर्मी के आने की दस्तक देता है ? जरा इस पुस्तक के रंगों में डूब कर तो देखो !

दूर की दोस्त
चिड़िया भी आसमान में उड़ती है और वायुयान भी, लेकिन दोनों एक दूसरे को देख कर दूर भागते हैं। यह कहानी है ऐसी ही दूर की दोस्ती की।

पहिया


गाँव के बच्चे का खिलौना, दोस्त, हमराही ; सभी कुछ एक उपेक्षित सा पड़ा पहिया बन जाता है। एक पहिए की नजर एक गाँव का सफर ।

Tuesday, August 2, 2011

हम छोटे छोटे बच्चे हैं



मंजु मिश्रा
हम छोटे -छोटे बच्चे हैं
पर काम हमारे अच्छे हैं
हम बच्चे मन के सच्चे हैं
हम जो चाहें कर सकते हैं
हम छोटे छोटे बच्चे हैं
मम्मी पापा दादी -दादा
नानी -नाना चाची -चाचा
प्यार हमें सब करते हैं
हम खुशियों से घर भरते है
हम छोटे छोटे बच्चे हैं 
 चाहें तो हम आसमान में
पंख बिना उड़ सकते हैं
चाहें तो हम सागर की
लहरों पर चल सकते हैं
हम छोटे छोटे बच्चे हैं
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Sunday, July 10, 2011

त्रिलोक सिंह ठकुरेला की बाल कविताएँ

त्रिलोक सिंह ठकुरेला
जन्म तिथि :01–10–1966
जन्म स्थान :नगला मिश्रिया (हाथरस), उत्तर प्रदेश
साहित्य सृजन :विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में, कविता, दोहे, गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्डलियां, बालगीत, लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित
प्रकाशित कृति :नया सवेरा (बालगीत संग्रह)
संकलन :सृजन संगी, निर्झर, कारवाँ, फूल खिलते रहेंगे,
देषभक्ति की कविताएँ (काव्य संकलन),नवगीत : नई दस्तकें (नवगीत संकलन)
हाइकु–2009 (हाइकु संकलन), कई संकलनों में लघुकथाएँ
सम्मान : कई सम्मान प्राप्त
संप्रति:उत्तर पश्चिम रेलवे में इंजीनियर
सम्पर्क:बंगला संख्या एल – 99,रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबूरोड –307026 (राजस्थान)
मोबाइल :09460714267
      trilokthakurela@yahoo.com
त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुछ बाल कविताएँ ।ये कविताएँ इनके नए संग्रह  'नया  सवेरा' से ली गई हैं ।
1-नया सवेरा लाना तुम

टिक टिक करती घडि़याँ कहतीं
मूल्य समय का पहचानो ।
पल पल का उपयोग करो तुम
यह संदेश मेरा मानो  ।।

जो चलते हैं सदा, निरन्तर
बाजी जीत वही पाते ।
और आलसी रहते पीछे
मन मसोस कर पछताते ।।

कुछ भी नहीं असम्भव जग में ,
यदि मन में विश्वास अटल ।
शीश झुकायेंगे पर्वत भी ,
चरण धोयेगा सागर -जल।।

बहुत सो लिये अब तो जागो ,
नया सवेरा लाना तुम ।
फिर से समय नहीं आता है ,
कभी भूल मत जाना तुम ।।


2-मीठी बातें

मीठे  मीठे बोल सुनाती ,
फिरती डाली  डाली ।
सब का ही मन मोहित करती
प्यारी कोयल काली  ।।

बाग बाग में , पेड़ पेड़ पर,
मधुर सुरों में गाती ।
रूप नहीं , गुण प्यारे सबको
सबको यह समझाती ।।

मीठी  मीठी बातें कहकर
सब कितना सुख पाते ।
मीठी-मीठी बातें सुनकर
सब अपने हो जाते ।।

कहती कोयल प्यारे बच्चो !
तुम भी मीठा बोलो ।
प्यार भरी बातों से तुम भी
सब के प्यारे हो लो ।।


3-सीख

वर्षा आई , बंदर भीगा ,
लगा काँपने थर थर थर ।
बया घोंसले से यूँ बोली
भैया क्यों न बनाते घर ।।

गुस्से में भर बंदर कूदा ,
पास घोंसले के आया ।
तार तार कर दिया घोंसला
बड़े जोर से चिल्लाया ।।

बेघर की हो भीगी चिडि़या ,
दे बन्दर को सीख भली ।
मूरख को भी क्या समझाना,
यही सोच लाचार चली ।।

सीख उसे दो जो समझे भी ,
जिसे जरूरत हो भरपूर ।
नादानों से दूरी अच्छी ,
सदा कहावत है मशहूर ।।
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Tuesday, May 24, 2011

रोचक पुस्तकें । समीक्षा


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
रेल भारती , मार्च -अप्रैल 2011 

Wednesday, April 20, 2011

नन्हें चित्रकार

मयंक ने रंग भरे
मिहिर ने रंग भरे