मेरा आँगन

मेरा आँगन

Monday, August 15, 2011

पठनीय और संग्रहणीय पुस्तकें


पुस्तक परिचय
अमर शहीद खुदीराम बोस (जीवनी):पंकज चतुर्वेदी ,पृष्ठ :24 , मूल्य : 11 रुपये ,संस्करण :2010, प्रकाशक : नेशनल बुक ट्र्स्ट ,इण्डिया नेहरू भवन 5 , इन्स्टीट्यूशनल एरिया , फेज़-2 ,वसन्त कुंज , नई दिल्ली-110070
11अगस्त 1908 की सुबह किशोर खुदीराम बोस को फाँसी दे दी गई । अवस्था 19 वर्ष ।किंग्सफोर्ड को बम विस्फोट से मारने का प्रयास किया । उस दिन बग्घी में किंग्सफोर्ड नहीं थे, उनके स्थान पर उनके मित्र की पत्नी और बेटी मारी गई ।मुज़फ़्फ़रपुर के इस काण्ड  में खुदीराम को फाँसी की सजा सुनाई गई । मुज़फ़्फ़रपुर जेल के जल्लाद ने खुदीराम को फाँसी का फ़न्दा लगाने से मना कर दिया तो अलीपुर जेल के जल्लाद को बुलाया गया ।1857 के बाद का यह सबसे बलिदानी था । देश प्रेम की भावना इनकी नस-नस में समाई हुई थी ।पंकज चतुर्वेदी ने बहुत ही रोचक और सरल भाषा में खुदीराम बोस के जीवन और त्याग का चित्रण किया है ।यह पुस्तक किशोरों के लिए पठनीय ही नही वरन् संग्रहणीय भी है ।
विपिन चन्द्र पाल (जीवनी):पंकज चतुर्वेदी ,पृष्ठ :24 , मूल्य : 11 रुपये ,संस्करण :2010, प्रकाशक : नेशनल बुक ट्र्स्ट ,इण्डियानेहरू भवन 5 , इन्स्टीट्यूशनल एरिया , फेज़-2 ,वसन्त कुंज , नई दिल्ली-110070
सशस्त्र विद्रोह के हिमायती विपिन चन्द्र पाल ने वन्देमातरम् का नारा लगाने वाले पत्रकारों की पिटाई से व्यथित होकर ‘वन्देमातरम्’ अखबार शुरू करने का निश्चय किया । रवीन्द्र नाथ टैगौर और अरविन्द घोष ने इस कार्य में भरपूर सहयोग किया ।अपनी कलम से विपिनचन्द्र पाल ने आज़ादी के साथ -साथ सामाजिक चेतना जगाने का काम भी किया ।रूढ़ियों का विरोध कलम के द्वारा तो किया ही अपने जीवन में भी उन आदर्शों का पालन किया । सम्पादन के क्षेत्र में इनका विशिष्ट कार्य सदा याद किया जाएगा ।लन्दन से प्रकाशित अंग्रेज़ी पत्र ‘स्वराज ‘ का सम्पादन किया  । अंग्रेज़ी मासिक ‘हिन्दू रिव्यू’ की स्थापना की इलाहाबाद से मोती लाल नेहरू द्वारा प्रकाशित ‘डेमोक्रेट’ साप्ताहिक का भी सम्पादन किया । बहुमुखी प्रतिभा के धनी विपिन चन्द्र पाल का जीवन प्रत्येक भारतीय के लिए अनुकरणीय है । इस छोटी -सी पुस्तक में पंकज चतुर्वेदी जी ने  इनके जीवन के विभिन्न आयामों को बखूबी सहेजा है ।इस तरह की पुस्तकों की आज के दौर में ज़्यादा ज़रूरत है ।
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Saturday, August 13, 2011

पंकज चतुर्वेदी जी का रोचक बाल साहित्य


कहाँ गए कुत्ते के सींग ?
पहले दुनिया ऐसी नहीं थी; यह बात वैज्ञानिक भी मानते हैं और समाज भी। पूर्वोत्तर राज्यों में यह मान्यता है कि पहले कुत्ते के सींग होते थे। फिर वे सींग गए कहाँ ? कहीं तो गए होंगे ना ? यह पुस्तक नगालैण्ड की एक ऐसी ही मान्यता पर आधरित है।

लो गर्मी आ गई
मौसम का बदलना महसूस करना बेहद जटिल है। कहा नहीं जा सकता कि कल से अमुक ऋतु आ जाएगी। लेकिन भारतीय वार-त्योहार बदलते मौसम की ओर इशारा करते हैं। रंगों का त्योहार होली किस तरह से गर्मी के आने की दस्तक देता है ? जरा इस पुस्तक के रंगों में डूब कर तो देखो !

दूर की दोस्त
चिड़िया भी आसमान में उड़ती है और वायुयान भी, लेकिन दोनों एक दूसरे को देख कर दूर भागते हैं। यह कहानी है ऐसी ही दूर की दोस्ती की।

पहिया


गाँव के बच्चे का खिलौना, दोस्त, हमराही ; सभी कुछ एक उपेक्षित सा पड़ा पहिया बन जाता है। एक पहिए की नजर एक गाँव का सफर ।

Tuesday, August 2, 2011

हम छोटे छोटे बच्चे हैं



मंजु मिश्रा
हम छोटे -छोटे बच्चे हैं
पर काम हमारे अच्छे हैं
हम बच्चे मन के सच्चे हैं
हम जो चाहें कर सकते हैं
हम छोटे छोटे बच्चे हैं
मम्मी पापा दादी -दादा
नानी -नाना चाची -चाचा
प्यार हमें सब करते हैं
हम खुशियों से घर भरते है
हम छोटे छोटे बच्चे हैं 
 चाहें तो हम आसमान में
पंख बिना उड़ सकते हैं
चाहें तो हम सागर की
लहरों पर चल सकते हैं
हम छोटे छोटे बच्चे हैं
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Sunday, July 10, 2011

त्रिलोक सिंह ठकुरेला की बाल कविताएँ

त्रिलोक सिंह ठकुरेला
जन्म तिथि :01–10–1966
जन्म स्थान :नगला मिश्रिया (हाथरस), उत्तर प्रदेश
साहित्य सृजन :विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में, कविता, दोहे, गीत, नवगीत, हाइकु, कुण्डलियां, बालगीत, लघुकथा एवं कहानी प्रकाशित
प्रकाशित कृति :नया सवेरा (बालगीत संग्रह)
संकलन :सृजन संगी, निर्झर, कारवाँ, फूल खिलते रहेंगे,
देषभक्ति की कविताएँ (काव्य संकलन),नवगीत : नई दस्तकें (नवगीत संकलन)
हाइकु–2009 (हाइकु संकलन), कई संकलनों में लघुकथाएँ
सम्मान : कई सम्मान प्राप्त
संप्रति:उत्तर पश्चिम रेलवे में इंजीनियर
सम्पर्क:बंगला संख्या एल – 99,रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबूरोड –307026 (राजस्थान)
मोबाइल :09460714267
      trilokthakurela@yahoo.com
त्रिलोक सिंह ठकुरेला की कुछ बाल कविताएँ ।ये कविताएँ इनके नए संग्रह  'नया  सवेरा' से ली गई हैं ।
1-नया सवेरा लाना तुम

टिक टिक करती घडि़याँ कहतीं
मूल्य समय का पहचानो ।
पल पल का उपयोग करो तुम
यह संदेश मेरा मानो  ।।

जो चलते हैं सदा, निरन्तर
बाजी जीत वही पाते ।
और आलसी रहते पीछे
मन मसोस कर पछताते ।।

कुछ भी नहीं असम्भव जग में ,
यदि मन में विश्वास अटल ।
शीश झुकायेंगे पर्वत भी ,
चरण धोयेगा सागर -जल।।

बहुत सो लिये अब तो जागो ,
नया सवेरा लाना तुम ।
फिर से समय नहीं आता है ,
कभी भूल मत जाना तुम ।।


2-मीठी बातें

मीठे  मीठे बोल सुनाती ,
फिरती डाली  डाली ।
सब का ही मन मोहित करती
प्यारी कोयल काली  ।।

बाग बाग में , पेड़ पेड़ पर,
मधुर सुरों में गाती ।
रूप नहीं , गुण प्यारे सबको
सबको यह समझाती ।।

मीठी  मीठी बातें कहकर
सब कितना सुख पाते ।
मीठी-मीठी बातें सुनकर
सब अपने हो जाते ।।

कहती कोयल प्यारे बच्चो !
तुम भी मीठा बोलो ।
प्यार भरी बातों से तुम भी
सब के प्यारे हो लो ।।


3-सीख

वर्षा आई , बंदर भीगा ,
लगा काँपने थर थर थर ।
बया घोंसले से यूँ बोली
भैया क्यों न बनाते घर ।।

गुस्से में भर बंदर कूदा ,
पास घोंसले के आया ।
तार तार कर दिया घोंसला
बड़े जोर से चिल्लाया ।।

बेघर की हो भीगी चिडि़या ,
दे बन्दर को सीख भली ।
मूरख को भी क्या समझाना,
यही सोच लाचार चली ।।

सीख उसे दो जो समझे भी ,
जिसे जरूरत हो भरपूर ।
नादानों से दूरी अच्छी ,
सदा कहावत है मशहूर ।।
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Tuesday, May 24, 2011

रोचक पुस्तकें । समीक्षा


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
रेल भारती , मार्च -अप्रैल 2011 

Wednesday, April 20, 2011

नन्हें चित्रकार

मयंक ने रंग भरे
मिहिर ने रंग भरे

Saturday, April 16, 2011

मूर्खता की नदी


सुधा भार्गव


एक लड़का था ।   उसका नाम मुरली था ।  उसको  किताबें बहुत पसंद थीं ।  मगर वह उनकी भाषा  नहीं समझता  था । खिसियाकर अपना सिर खुजलाने लगता  ।  उसकी हालत देख किताबें खिलखिलाकर हँसने लगतीं । 

एक दिन उसने वकील साहब को मोटी सी किताब पढ़ते देखा । उनकी नाक पर चश्मा रखा था ।   जल्दी -जल्दी उसके पन्ने पलट रहे थे । 
कुछ सोचकर वह कबाड़ी की दुकान पर गया जहाँ पुरानी और सस्ती किताबें मिलती थीं
-चाचा मुझे बड़ी से ,मोटी  सी किताब दे दो । 
-किताब का नाम ?
-कोई भी चलेगी । 
-कोई भे चलेगी ....कोई भी दौड़ेगी ......!तू अनपढ़ ...किताब की क्या जरूरत पड़ गई 
-पढूँगा  । 
-पढ़ेगा---- !चाचा की आँखों से हैरानी टपकने लगी  
-कैसे पढ़ेगा ?
-बताऊँ ...। 
-बता तो ,तेरी खोपड़ी में क्या चल रहा है । 
-बताऊँ ..बताऊँ ...। 
मुरली धीरे से उठा , कबाड़ी की तरफ बढ़ा और उसका चश्मा खींचकर भाग गया  । 
भागते भागते  बोला --चाचा ..चश्मा लगाने से सब पढ़ लूँगा । मेरा मालिक ऐसे ही पढ़ता है  ।  २-३ दिन बाद तुम्हारा चश्मा,और किताब लौटा जाऊँगा  

वकील साहब की लायब्रेरी में ही जाकर उसने दम लिया ।  कालीन पर आराम  से बैठ कर अपनी  थकान मिटाई ।  चश्मा लगाया  और किताब खोली । 
किताब में क्या लिखा है ...कुछ समझ नहीं पाया  ।  उसे तो ऐसा लगा जैसे छोटे  -छोटे काले कीड़े हिलडुल रहे हों ।  कभी चश्मा उतारता,कभी आँखों पर चढ़ाता । 

-क्या जोकर की तरह इधर-उधर देख रहा है ।  चश्मा भी इतना बड़ा  .....आँख -नाक सब ढक गये ,चश्मा है या तेरे मुँह  का ढक्कन ।   किताब  ने मजाक उड़ाया । 
-बढ़ -बढ़ के मत बोल ।  इस चश्मे से सब समझ जाऊँगा तेरे मोटे से पेट में क्या लिखा है । 
-अरे मोटी  बुद्धि के - - चश्मे से नजर पैनी होती है बुद्धि नहीं  ।   बुद्धि तो तेरी मोटी ही रहेगी ।  धेल्ला भर मुझे नहीं पढ़ पायेगा । 

मुरली घंटे भर किताब से जूझता रहा पर कुछ उसके पल्ले न पड़ा  ।  झुँझलाकर  किताब मेज के नीचे पटक दी । 
रात में उसने लाइब्रेरी में झाँका देखा -- मालिक के हाथों में पतली -सी किताब है ।  बिजली का लट्टू चमचमा रहा है और उन्होंने चश्मा भी नहीं पहन रखा है । 
मुरली उछल पडा --रात में तो मैं  जरूर --पढ़ सकता हूं ।  चश्मे की जरूरत ही नहीं । 

सुबह होते ही वह किताबों की  दुकान पर जा पहुँचा । 
-लो चाचा अपनी किताब और चश्मा ।  मुझे तो पतली- सी किताब दे दो  ।  लट्टू की रोशनी में चश्मे का क्या काम है । 
बिना चश्मे के कबाड़ी देख नहीं पा रहा था ।  उसे पाकर बहुत खुश हुआ बोला -
-तू एक नहीं  दस किताबें ले जा पर खबरदार ---मेरा चश्मा छुआ तो......। 
मुरली ने चार किताबें बगल में दबायीं ।  झूमता हुआ वहाँ से चल दिया  ।  घर में जैसे ही पहला बल्ब जला उसके नीचे किताब खोलकर बैठ गया ।  पन्नों के कान उमेठते -उमेठते उसकी उँगलियाँ दर्द करने लगीं पर वह एक अक्षर न पढ़ सका

कुछ देर बाद लाइब्रेरी में रोशनी हुई ।  मुरली चुपके से अन्दर गया और सिर झुकाकर बोला -मालिक आप मोटी किताब के पन्ने पलटते हो ,उसमें क्या लिखा है --सब समझ जाते हो क्या ?
-समझ तो आ जाता है ,क्यों ?क्या बात है ?
-मैं मोटी किताब लाया ,फिर पतली किताब लाया मगर वे मुझसे बातें ही नहीं करतीं । 
-बातें कैसे करें !तुम्हें तो उनकी भाषा आती नहीं  ।  भाषा समझने के लिए उसे सीखना होगा  ।  सीखने के लिए मूर्खता की नदी पार करनी पड़ेगी । 
--नदी --। 
-हाँ ,,,। अच्छा बताओ ,तुम नदी कैसे पार करोगे 
 -हमारे गाँव में एक नदी है।  एक बार हमने  देखा छुटकन को नदी पार करते ।  किनारे पर खड़े होकर जोर से उछल कर वह नदी में कूद गया । 
-तब तो तुम भी नदी पार कर लोगे । 
-अरे हम कैसे कर सके हैं  । हमें तैरना ही नहीं आता  - - ड़ूब जायेंगे  । 
-तब तो तुम समझ गये --नदी पार करने के लिए तैरना आना   जरूरी है । 
-बात तो ठीक है । 
-इसी तरह मूर्खता की नदी पार करने के लिए पढ़ना  जरूरी है। पढ़ाई की शुरुआत भी  किनारे से करनी होगी  । 
वह किनारा कल दिखाऊँगा । 

कल का मुरली बेसब्री से इन्तजार करने लगा ।  उसका उतावलापन टपका पड़ता था । 
-माँ ---माँ ,कल मैं मालिक के साथ घूमने जाऊँगा
-क्या करने !
-तूने तो केवल नदी का किनारा देखा होगा ,मैं पढ़ाई  का किनारा देखने जाऊँगा । 
माँ की  आँखों में अचरज  झलकने लगा । 

दूसरे दिन मुरली जब अपने मालिक से मिला,वे लाईब्रेरी में एक पतली सी किताब लिये बैठे थे ।  मुरली को देखते ही वे उत्साहित हो उठे --
-मुरली यह रहा तुम्हारा किनारा !किताब को दिखाते हुए बोले । 
-नदी का किनारा तो बहुत बड़ा होता है ---यह इतना छोटा !इसे तो मैं एक ही छलांग में पार कर लूंगा । 
-इसे पार करने के लिए अन्दर का एक -एक अक्षर प्यार से दिल में बैठाना होगा  ।  इन्हें याद करने के बाद दूसरी किताब फिर तीसरी किताब - - - -। 
-फिर मोटी किताब ---और मोटी किताब --मुरली ने अपने छोटे -छोटे हाथ भरसक फैलाये । 
कल्पना के पंखों पर उड़ता वह चहक रहा था। थोड़ा थम  कर बोला --
-क्या मैं आपकी तरह किताबें पढ़ लूँगा ?
-क्यों  नहीं !लेकिन  किनारे से चलकर धीरे -धीरे गहराई में जाओगे ।  फिर कुशल तैराक की तरह मूर्खता की नदी पार करोगे  । उसके बाद तो मेरी किताबों से भी बातें करना सीख जाओगे । 

मुरली ने एक निगाह किताबों पर डाली वे हँस-हँसकर उसे अपने पास बुला रही थीं ।  लेकिन मुरली ने भी निश्चय कर लिया था -किताबों के पास जाने से पहले उनकी भाषा सीख कर ही रहूँगा । 

वह बड़ी लगन से अक्षर माला पुस्तक खोलकर बैठ गया तभी सुनहरी किताब परी की तरह फर्र -फर्र उड़कर आई । 
बोली --मुरली तुम्हें पढ़ता देख कर हम  बहुत खुश हैं ।  अब तो हँस -हंसकर गले मिलेंगे और खुशी के गुब्बारे उड़ायेंगे
मुरली के गालों पर दो गुलाब खिल उठे और उनकी महक चारों तरफ फैल गई
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Thursday, January 6, 2011

HAPPY NEW YEAR

 
HAPPY NEW YEAR
 
HANDBOOK For 2011 
Health:  
1.      Drink plenty of water.
2.      Eat breakfast like a king, lunch like a prince and dinner like a beggar.
3.      Eat more foods that grow on trees and plants and eat less food that is manufactured in plants..
4.      Live with the 3 E's - Energy, Enthusiasm and Empathy.
5.      Make time to pray.
6.      Play more games.
7.      Read more books than you did in 2010.
8.      Sit in silence for at least 10 minutes each day.
9.      Sleep for 7 hours.
10.    Take a 10-30 minutes walk daily. And while you walk, smile. 

Personality 
11.    Don't compare your life to others. You have no idea what their journey is all about.
12.    Don't have negative thoughts or things you cannot control. Instead invest your energy in the positive present moment.
13.    Don't over do. Keep your limits.
14.    Don't take yourself so seriously. No one else does.
15.    Don't waste your precious energy on gossip.
16.    Dream more while you are awake.
17.    Envy is a waste of time. You already have all you need..
18.    Forget issues of the past. Don't remind your partner with His/her mistakes of the past. That will ruin your present happiness.
19.    Life is too short to waste time hating anyone. Don't hate others.
20.    Make peace with your past so it won't spoil the present.
21.    No one is in charge of your happiness except you.
22.    Realize that life is a school and you are here to learn.
23.    Smile and laugh more.
24.    You don't have to win every argument. Agree to disagree... 

Society:  
25.    Call your family often.
26.    Each day give something good to others.
27.    Forgive everyone for everything.
28.    Spend time with people over the age of 70 & under the age of 6.
29.    Try to make at least three people smile each day.
30.    What other people think of you is none of your business.
31.    Your job won't take care of you when you are sick. Your friends will. Stay in touch. 


Life 
32.    Do the right thing!
33.    Get rid of anything that isn't useful, beautiful or joyful.
34.    GOD heals everything.
35.    However good or bad a situation is, it will change..
36.    No matter how you feel, get up, dress up and show up.
37.    The best is yet to come..
38.    When you awake alive in the morning, thank GOD for it.
39.    Your Inner most is always happy. So, be happy.
  श्री भूपाल सुद [ अयन प्रकाशन नई दिल्ली द्वारा प्रेषित ]

Saturday, November 20, 2010

राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह

राष्ट्रीय पुस्तक सप्ताह एवं बटुकेश्वर दत्त जन्मशती के अवसर पर
      पुस्तकों का लोकार्पण संपन्न
कामरेड बटुकेश्वर दत्त जन्म शताब्दी के अवसर पर दिनांक 19 नवम्वर 2010 लखनऊ माण्टेसरी इन्टर कालेज पुराना किला सदर के प्रांगण में नेशनल  बुक ट्रस्ट इण्डिया, नई दिल्ली एवं ‘शहीद स्मारक स्वतन्त्रता संग्राम शोध केन्द्र’ के सौजन्य से पुस्तक लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया। इस समारोह की मुख्य अतिथि शहीद बटुकेश्वर दत्त की पुत्री श्रीमती भारती दत्त बागची थी। विशेष अतिथि प्रो जगमोहन सिंह  (सरदार भगत सिंह के भानजे) थे। नेशनल  बुक ट्रस्ट ने हिन्दी भाषी लोगों के लिए बटुकेश्वर दत्त पर प्रथम पुस्तक प्रकाशित की है। जिसका शीर्षक ‘‘बटुकेश्वर दत्तः भगत सिंह के साथी’’, के लेखक श्री अनिल वर्मा है। इसके अलावा अन्य दो पुस्तकें क्रमशः भारत के संरक्षित वन क्षेत्र लेखक महेन्द्र प्रताप सिंह और संजीव जायसवाल, कृत बाल पुस्तक चंदा गिनती भूल गया’ का भी लोकार्पण किया गया।
विमोचन कार्यक्रम से पूर्व प्रातः विद्यालय के बच्चों ने विद्यालय प्रंkगण में स्वतन्त्रता संग्राम एवं कामरेड बटुकेश्वर दत्त से सम्बन्धित अविस्मरर्णीय साम्रगी एवं दुर्लभ विषयों को पोस्टर के माघ्यम से प्रदर्शित किया। जिसमें विजेता बच्चों को पुरस्कृत भी किया गया। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ एडवोकेट श्री उमेश चन्द्रा जी ने की। श्री बैजनाथ सिंह द्वारा अतिथियों के स्वागत के साथ प्रारंभ हुए कार्यक्रम में बटुकेश्वर दत्त पुस्तक के लेखक अनिल वर्मा, जिला एवं सत्र न्यायाधीश, म.प्र. ने बताया कि इस पुस्तक के लिए उन्होंने किस तरह से और कहाँ- कहाँ से सामग्री एकत्र की। श्री महेन्द्र प्रताप सिंह ने अपनी पुस्तक भारत के संरक्षित वन क्षेत्र’ का परिचय देते हुए बताया कि जब तक हिंदी का साहित्य ज्ञान-विज्ञान के विषयों से नहीं जुड़ेगा, उसका विस्तार नहीं हो पाएगा । श्री सिंह ने बताया कि इस पुस्तक को तैयार करने में उन्हें कई राज्यों के कई साथियों का सहयोग मिला। श्री संजीव जायसवाल ने अपनी पुस्तक की जानकारी देते हुए बताया कि एक अच्छा लेखक वही है जोकि बच्चों के लिए लिखे।
पुस्तकों की समीक्षा की शृंखला में लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रो. प्रमोद कुमार ने बटुकेश्वर दत्त पुस्तक को एक सार्थक प्रयास बताते हुए कहा कि भारत के इतिहासकारों ने क्रांतिकारियों का सही आकलन नहीं किया। इतिहास का उद्देश्य होता है कि हम अपने आप को समझें। प्रो सूर्य प्रसाद दीक्षित ने भारत के संरक्षित वन पुस्तक की समीक्षा करते हुए कहा कि आज की आवश्यकता है कि ज्ञान-विज्ञान विषयों पर हिंदी में पुस्तकें समय की माँग हैं। मुख्य अतिथि भारती बागची ने अपने पिता से जुड़ी कई यादों को साझा करते हुए कहा कि बटुकेश्वर दत्त की जन्मशती के अवसर पर उन पर डाक टिकट, एक स्मारक का निर्माण जरूर होना चाहिए। प्रो. जगमोहन सिंह ने स्पष्ट किया कि बटुकेश्वर दत्त और भगत सिंह सदैव से एक रहे हैं , उनका आकलन अलग-अलग रख कर नहीं किया जा सकता। उन्होंने बताया कि भगत सिंह जेल में बटुकेश्वर दत्त से बांग्ला सीखा करते थे। अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री उमे’k चंद्राजी ने ऐसे विचारों के प्रचार-प्रसार की जरूरत पर बल दिया ,जिनसे अलगववादी ताकतें कमजोर हों। श्री जयप्रकाश जी ने  आभार व्यक्त किया।
इस आयोजन की महत्त्वपूर्ण घोषणा यह भी रही कि शहीद स्मारक स्वतन्त्रता संग्राम शोध केन्द्र’, लखनऊ के परिसर में बहुत जल्दी नेशनल  बुक ट्रस्ट की पुस्तकों का स्थायी बिक्री केंद्र खुल जाएगा। कार्यक्रम का संचालन नेशनल  बुक ट्रस्ट इण्डिया, नई दिल्ली, के श्री पंकज चतुर्वेदी के द्वारा किया गया जिन्होंने अपनी संस्था के विषय में लोगो को अवगत कराया। कार्यक्रम स्थल पर ट्रस्ट की पुस्तकों की बिक्री बेहद उत्साहजनक रही।

 प्रो. प्रमोद कुमार                           पंकज चतुर्वेदी
मंत्री                                           सहायक संपादक


Friday, November 5, 2010

दीपावली-सन्देश

दीपावली के इस खूबसूरत त्योहार के लिए सुख -समृद्धि और प्रेरणा का सन्देश लेकर  आ रही हैं -तीन संवेदनशील कवयित्रियाँ-डॉ भावना कुँअर , रचना श्रीवास्तव और मंजु मिश्रा , आस्ट्रेलिया ,  और अमेरिका  से । आशा है इनका सन्देश आपको जीवन में नई संकल्प शक्ति से समृद्ध करेगा। प्रस्तुति -रामेश्वर काम्बोज हिमांशु'

1-डॉ भावना कुँअर

रंगोली सजे
दीपों की रोशनी में
अँधेरा मिटे ।

जगमग है
दीपों की कतार से
 हरेक कोना ।

झूम रहे हैं
रंगीन कंदीलों से
घर-आँगन ।

हँसी रोशनी
जीत पर अपनी
अँधेरा रोया ।

करो रोशन
बुझते चिराग़ों को
 इस पर्व में ।
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2-रचना श्रीवास्तव
स्नेह की ,उन्नति की ,ज्ञान की ,वैभव की रौशनी आप को और आप के पूरे परिवार को सदा महकाती रहे -

मस्ज़िद में जलूँ या मंदिर में
झोपड़ी में जलूँ या महल में
भजन में जलूँ या दरगाह पर
चौखट में जलूँ या राह पर
प्रेम गीत गुनगुनाऊँगा
मै दिया हूँ रौशनी फैलाऊँगा ।

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3--मंजु मिश्र
"आँधियों की टक्करों में 
दीप कितने बुझ गए हों
पर भला कब हार माने
हैं, अँधेरों से उजाले  
एक दीपक फिर जला ले।"



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