मेरा आँगन

मेरा आँगन

Saturday, April 24, 2010

SOME INTERESTING FACTS

From: progya shankar
Subject: [AASICS] SOME INTERESTING FACTS: please share with students
To: AASICS@yahoogroups.com
Date: Saturday, April 24, 2010, 8:17 AM



1. MOPED is the short term for 'Motorized Pedaling'.

2. POP MUSIC is 'Popular Music' shortened.


3. BUS is the short term for 'Omnibus' that means everybody.


4. FORTNIGHT comes from 'Fourteen Nights' (Two Weeks).


5. DRAWING ROOM was actually a 'withdrawing room' where people withdrew after Dinner. Later the prefix 'with' was dropped..


6. NEWS refers to information from Four directions N, E, W and S..


7. AG-MARK, which some products bear, stems from 'Agricultural Marketing'.


8. JOURNAL is a diary that tells about 'Journey for a day' during each Day's business.


9. QUEUE comes from 'Queen's Quest'. Long back a long row of people as waiting to see the Queen. Someone made the comment Queen's Quest..


10. TIPS come from 'To Insure Prompt Service'. In olden days to get Prompt service from servants in an inn, travelers used to drop coins in a Box on which was written 'To Insure Prompt Service'. This gave rise to the custom of Tips.


11. JEEP is a vehicle with unique Gear system. It was invented during World War II (1939-1945). It was named 'General Purpose Vehicle (GP)'.GP was changed into JEEP later.


14. The name of all the continents end with the same letter that they start with.


20.. People say "Bless you" when you sneeze because when you sneeze, your heart stops for a millisecond.


21. It is physically impossible for pigs to look up into the sky.


22. The "sixth sick sheik's sixth sheep's sick" is said to be the toughest tongue twister in the English language.


23. Each king in a deck of playing cards represents a great king from history.


Spades - King David

Clubs - Alexander the Great,
Hearts - Charlemagne
Diamonds - Julius Caesar.

24. Horse Statue in a Park…
If a statue of a person in the park on a horse has both front legs in the air, the person died in battle.
If the horse has one front leg in the air, the person died as a result of wounds received in battle
If the horse has all four legs on the ground, the person died of natural causes.

25. What do bullet proof vests, fire escapes, windshield wipers and laser printers all have in common? Ans. - All invented by women.

26. A crocodile cannot stick its tongue out.

27. A snail can sleep for three years.

28. All polar bears are left handed.

29. Butterflies taste with their feet.

31. In the last 4000 years, no new animals have been domesticated.

32. On average, people fear spiders more than they do death.

33. Shakespeare invented the word 'assassination' and 'bump'.
35. The ant always falls over on its right side when intoxicated.

36. The electric chair was invented by a dentist.
38. Rats multiply so quickly that in 18 months, two rats could have over million descendants.

39. Wearing headphones for just an hour will increase the bacteria in your ear by 700 times.

40. If you sneeze too hard, you can fracture a rib.
If you try to suppress a sneeze, you can rupture a blood vessel in your head or neck and die.

41. The cigarette lighter was invented before the matchbox.

42. Most lipstick contains fish scales.



--
Shyam Suri
I.A.S. (Retd.)
A 192, First Floor
New Friends Colony
New Delhi - 110025
Phone: 91-9810130433





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Progya

Friday, April 23, 2010

विश्व पुस्तक -दिवस के अवसर पर विशेष



धनेश के बच्चे ने उड़ना सीखा

लेखक: दिलीप कुमार बरूआ ,अनुवाद : पंकज चतुर्वेदी ,चित्रांकन:पार्थ सेनगुप्ता

खरगोश और कछुए की दौड़

लेखक: किरण तामूली ,अनुवाद : पंकज चतुर्वेदी ,चित्रांकन:समरज्योति दास

प्रथम संस्करण: 2010 , मूल्य : 16 रुपये , पृष्ट :20 (आवरण सहित)

प्रकाशक: नेशनल बुक ट्रस्ट ,इण्डिया , नेहरू भवन ,5 इंस्टीट्यूशनल एर्या फेज़-दो , वसन्तकुंज , नई दिल्ली-110070

धनेश के बच्चे ने उड़ना सीखा में धनेश ( कठफोड़वा)पक्षी की जीवन शैली को कहानी के माध्यम से प्रस्तुत किया है । अण्डे देने के समय किस प्रकार धनेश बीट से मादा के आवास को सुरक्षित कर देता है, यह जानकारी बहुत रोचक है । साथ ही अण्डे देने और उन्हें सेने के समय नर धनेश किस निष्ठा से मादा के पोषण ध्यान रखता है, सचमुच बहुत महत्त्वपूर्ण है ।

खरगोश और कछुए की दौड़ पुस्तक में पुरानी कहानी को नए सन्दर्भों में प्रस्तुत किया गया है । दौड़ में फिर कछुआ ही जीतता है । अधिक खाने के कारण खरगोश हार जाता है । औसे अवसर पर अन्य जंगली जानवरों की उपस्थिति कथा को और अधिक रोचक बना देती है ।

पुस्तकें सजीव एवं उत्कृष्ट चित्रों से सुसज्जित है । चित्रांकन कथा को सरस बनाने और छोटे बच्चों का मन मोहने में हर दृष्टि से सक्षम हैं । पंकज जी के अनुवाद में मूल जैसा कथा-प्रवाह दृष्टिगोचर होता है।

इन दोनों पुस्तकों की पाण्डुलिपियाँ असमिया बाल पत्रिका “मौचक” के सहयोग से जोरहाट में आयोजित कार्यशाला में तैयार की गई थीं ।

-प्रस्तुति- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Sunday, April 18, 2010

हरियाली और पानी





-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
बहुत दिन पहले की बात है-हरियाली और पानी बहुत प्रेम से रहते थे ।बरगद ,पीपल ,आम और नीम की छाया में लेटकर पानी को बहुत सुख मिलता था। इन वृक्षों की हरियाली पानी पीकर और भी गहरी हो गई थी ।
एक दिन हरियाली बोली-“भाई पानी !तुम बहुत आलसी हो । दिन भर लेटे रहते हो। थोड़ी देर के लिए घूम -फिर लिया करो।”
पानी को हरियाली की यह सलाह अच्छी नहीं लगी ।वह नाराज़ होकर बोला-“यदि मैं यहाँ से चला गया, तो तुम नष्ट हो जाओगी।”
हरियाली तुनुक उठी-“जाना चाहते हो, जाओ । किसने रोका है तुमको?”
“ मैं जा रहा हूँ”-कहकर पानी चल दिया, “कुछ ही दिनों में पत्ते सूख जाएँगे ।उसके बाद तना और जड़ भी। तब तुम्हें पता चलेगा।”
पानी रूठकर कहीं दूर चला गया ।
पानी के वहाँ न होने से चारों तरफ़ धूल उड़ने लगी, बरगद ,पीपल ,आम और नीम के पत्ते मुरझाने लगे ।कुछ ही दिनों में सारे पत्ते पीले पड़ गए ।
बूढ़े बरगद ने बीमार और कमज़ोर हरियाली से कहा-“ तुमने पानी के साथ झगड़ा करके अच्छा नहीं किया ।पानी के बिना मेरा सिर चकराने लगा है।”
“गर्मी से हमारा भी जी घबराने लगा है”- आम ,नीम और पीपल बोले ।
“मुझसे भूल हो गई है । मैं पानी से क्षमा माँगना चाहती हूँ ”-हरियाली ने चारों वृक्षों से कहा ।
“ हाँ ,यही ठीक रहेगा”-चारों वृक्ष बोले ।
उधर हरियाली के बिना पानी भी दु:खी रहने लगा था । दिन भर धूल उड़ती और उसकी आँखोंमें भरती रहती ।सूरज तपता , जिससे उसके शरीर में जलन होने लगती। पानी जब हरियाली की बातें याद करता तो गुस्से से भर उठता ।उधर पीले पत्ते सूखकर धरती पर गिर पड़े ।
एक दिन पत्ते तेज़ हवा के झोंके के साथ उड़कर पानी को ढूँढ़ने के लिए निकल पड़े ।दिन भर उड़ते रहने के बाद उन्होंने पानी को ढूँढ़ लिया ।
सूखे पत्तों की दशा देखकर पानी को बहुत पश्चात्ताप हुआ ।पत्तों ने पानी को सभी वृक्षों की दुर्दशा के बारे बारे में विस्तार से बता दिया । सभी वृक्ष प्यास के कारण सूखने लगे थे ।
पानी ने वृक्षों की प्यास बुझाकर हरियाली को बचाने का दृढ़ निश्चय किया ।सूर्य की तेज़ धूप में उसका शरीर झुलसने लगा । चलते-चलते साँस फूलने लगी। सामने रेतीला मैदान था । पानी ने सोचा-रेतीला मैदान मुझे पी जाएगा। बरगद ,पीपल ,आम और नीम तक पहुँचना कठिन हो जाएगा ।
गर्मी के कारण धरती में जगह-जगह दरारें पड़ गई थीं ।पानी धीरे -धीरे बहकर उन दरारों में भर गया ।वह तीव्रता से आगे बढ़ने लगा ।
पानी ज़मीन के भीतर चलने लगा । रास्ते में कई चट्टानों ने उसका मार्ग रोकने की चेष्टा की ।पानी प्रयास करके फिर रास्ता ढूँढ़ लेता । चलते-चलते थकान के कारण वह हाँफने लगा । आगे बढ़ना कठिन हो गया । उसे कुछ जानी-पहचानी खुशबू महसूस हुई ।उसने छुआ- सूखी-सूखी उँगलियाँ-सी भीगने लगी। वह खुशी से उछल पड़ा-अरे! यह तो नीम है!”
वह दुगुने जोश से चलने लगा ।दूर- दूर तक फैली बरगद दादा की जड़ें भीगने लगीं। पानी ने थोड़ी ही देर में चारों वृक्षों की जड़ों को भिगो दिया । सूखी डालियों में नमी भरने लगी ।कुछ ही दिनों में कोंपलें निकल आईं । चारों वृक्ष हरे -भरे हो उठे ।
हरियाली ने पानी को गले से लगा लिया-“भैया !मुझे क्षमा कर दो ।मैं तुम्हें कभी बुरा-भला नहीं कहूँगी।”
“ग़लती मेरी ही थी”-पानी रोने लगा। टप्-टप् आँसू गिर रहे थे-“मैं तुम्हें छोड़कर कभी नहीं जाऊँगा।”
तब से हरियाली और पानी साथ-साथ रह रहे हैं ।
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Friday, April 9, 2010

गुलब्बो रानी


सुधा भार्गव
झूमर चलती तो लगता पायल खनक रही हैI बोलती तो मैना भी उसके पास फुदक कर बैठती I पढ़ती तो केवल किताबों की दुनिया में रम जाती I ऐसी थी हमारी गुलब्बो I
एक बार उसकी नानी बीमार हो गईं I खबर पाकर माँ तो खाना -पीना भी छोड़ बैठीं I अगले ही दिन पहली ट्रेन से अजमेर जाने का निश्चय किया । झूमर की समझ में नहीं रहा था कि वह क्या करे I पढ़ाई का नुकसान नहीं करना चाहती थी और माँ के बिना रह भी नहीं सकती थी Iउसके पिता जी उसकी दुविधा को भाँप गये I वे बोले -''बेटी ,तुम्हारी माँ का जाना तो जरूरी है I जैसे तुम अपनी माँ को प्यार करती हो; वैसे ही वे अपनी माँ को प्यार करती हैंI तुम यदि उनके साथ नहीं जाना चाहो तो मत जाओI तींन- चार दिनों की ही बात है I फिर मैं तो तुम्हारे साथ हमेशा रहूँगा ही I''
झूमर ने भारी मन से अपनी माँ को अजमेर जाने की सहमति दे दी I
अगले दिन वह स्कूल बस से घर के सामने उतरी I वहाँ उसे अपने प्यारे पिताजी खड़े मिले I
वह इतराती इठलाती बोली -"पिता जी , मैं तो आज खीर खाऊँगी। ''
''चलो ,घर में हम अपनी लाडली को ठंडी -ठंडी खीर खिलायेंगे i''
''आप कहाँ से लाएँगे ,आपको तो बनाना ही नहीं आता I''
झूमर की आँखों में खुशी की फुलझड़ियाँ छूटने लगीं I वह खीर का स्वाद लेती जाती और कहती जाती -''मेरी माँ बहुत प्यारी हैं I''
''तुम्हारी माँ को मालूम है कि खीर बहुत पसंद है ,इसलिए वे फ्रिज में रख गई हैं I ''
''पिताजी , मुझे तो कल अपनी सहेली कंगन के जन्मदिवस पर जाना है । कौन सा फ़्राक पहन कर जाऊँ,उसे क्या उपहार में दूँ ,कुछ समझ में नहीं आता I एक साँस में कह गई झूमर I
इतने में फ़ोन की घंटी बज उठी ,''हेलो ----मैं झूमर बोल रही हूं---माँ, मैंने खीर चट कर ली - - - - आप बहत अच्छी हैं ,जल्दी - - - - !''
''बेटी ,ध्यान से सुनो ,अपनी सहेली के घर शाम को गुलाबी फ़्राक पहन कर जाना I
उसके लिए अलमारी के सबसे ऊपर के रैक में उपहार भी रखा हैI''झूमर की बात को काटते हुए उसकी माँ बोल उठीं ,नहीं तो वह ही बोलती रहती I
''ओह अच्छी माँ !----आपको मेरी हर बात का ध्यान रहता है I''
''झूमर मैं तो हमेशा तुम्हारे साथ हूँ - माँ ने कहा I
शाम को गुलब्बो रानी बनी झूमर अपनी सहेली के घर गई Iसबने उसकी ड्रेस की खूब प्रशंसा कीIउसे अपनी माँ पर गर्व हो आया Iवह उनकी पसंद ही तो थी I
रात को अपना गृहकार्य करने बैठी झूमर I उसको एक पैराग्राफ लिखना था I विषय था -तुम घर में सबसे ज्यादा प्यार किसे करते हो और क्यों ?उसने १० मिनट में कार्य समाप्त किया और गहरी नींद में सो गई I
सुबह झूमर और उसके पिताजी घर से निकले तो साथ -साथ, पर आगे चलकर रास्ते उनके अलग-अलग हो गये I झूमर को विद्यालय जाना था और दीनानाथ जी को रेलवे स्टेशन की ओर I उसकी माँ अजमेर से जो लौट रही थीं I
स्कूल से लौटने पर सदैव की तरह माँ उसकी प्रतीक्षा करती मिलीं I उनके आँचल से लिपटते हुए झूमर बोली - - - ''माँ --माँ --देखो तो मुझे कॉपी में क्या मिला है !''
''क्या मिला है मेरी रानी बिटिया को ?''
''वैरी गुड I ''
''किसमें ?''
''जिसे मैं सबसे ज्यादा प्यार करती हूं उसके बारे मे लिखना था I '
''हमारी बिटिया तो बहुत सयानी हो गई है Iदिखाओ तो क्या लिखा है ?''
माँ की नजरें जल्दी -जल्दी शब्दों के ऊपर से फिसलने लगीं --------
--मैं घर में सबसे ज्यादा माँ को प्यार करती हूं I वे बिना कहे ही मेरे मन की बात समझ जाती हैं I दूर रहकर भी वे मेरे पास रहती हैं I मैं सवेरे उठकर रोज माँ को प्रणाम करती हूँ; क्योंकि वे मेरे मनमंदिर की देवी हैं - - - ''इससे आगे झूमर की माँ पढ़ सकी I आँखों में खुशी के आँसू उमड़ पड़े थे I उसे आज ही मालूम हुआ कि वह बेटी की नजरों में कितनी ऊँची हैI एक माँ अपनी भोली- सी बच्ची को सीने से लगाने के लिए तड़प उठी I

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Sunday, December 20, 2009

पानी



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
मैं पानी हूँ मैं जीवन हूँ
मुझसे सबका नाता ।
मैं गंगा हूँ , मैं यमुना हूँ
तीरथ भी बन जाता ।
मैं हूँ निर्मल पर दोष सभी ,
औरों के हर लेता ।
कल तक दोष तुम्हारे थे जो ,
अपने में भर लेता ।
पर सोचो तो मैं यों कब तक ,
कचरा भरता जाऊँ !
मुझको जीवन भी कहते हैं ,
मैं कैसे मरता जाऊँ !
गन्दा लहू बहा अपने में
कब तक चल पाता तन
मैं धरती की सुन्दरता हूँ ,
हर प्राणी की धड़कन ।
मेरी निर्मलता से होगी,
धरती पर हरियाली ।
फसलों में यौवन महकेगा,
हर आँगन दीवाली ।
नदियाँ ,झरने ,ताल-तलैया ,
कुआँ हो या कि सागर ।
रूप सभी ये मेरे ही हैं,
एक बूँद या गागर ।
हर पौधे की हर पत्ती की
प्यास बुझाऊँ जीभर ।
पर जीना दूभर होगा ये,
दूषित हो जाने पर ।
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Wednesday, October 28, 2009

विजया दशमी मंगलमय हो !

विजया दशमी मंगलमय हो !

विजया दशमी मंगलमय हो !

जीवन सबका सदा अभय हो !

दूर     अभावों   की  बस्ती से,

हो प्यार ,तन-मन निरामय हो !

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Monday, September 14, 2009

‘कारगिल युद्ध’ एक मंजिल



वैशाली काम्बोज कक्षा 9

आँखों में ख्वाब लिये हम सब चल दिये।

रस्ता था ऐसा कभी देखा नहीं,

कठिनाई भी इतनी कभी सही नहीं,

आँखों में था ख्वाब कि कुछ कर दिखाना है,

और अपनी मंजिल को पाना है ।

आँखों में ख्वाब लिये हम सभी जवान चल दिये

अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते जाना था,

मंजिल को पाना था, दुश्मनों को मार गिराना था,

देश का नाम बढ़ाना था, और बढ़ते ही जाना था,

आँखों में ख्वाब लिये हम सभी जवान चल दिये।

सर्द मौसम से लड़ते हुए, पहाड़ियों पर चढ़ते हुए,

सीनों पर गोली खाते हुए दुश्मनों को मार गिराते हुए,

मंजिल को पाते हुए आँखों में ख्वाब लिये,

हम सभी जवान चल दिये।

मुश्किलों का सामना कर दिखाया,

अपनी मँजिल को पाया।

पर्वत शिखर पर भारत का झंडा लहराया,

यह था ऐसा लम्हा जिसे मुश्किल था भूल पाना,

बस अपने देश पर है मर मिट जाना,

यही संदेश है हमारा, यही संदेश है हमारा।

वैशाली काम्बोज

कक्षा 9 ब

केन्द्रीय विद्यालय, आवडी

चेन्नै-55

Monday, September 7, 2009


बच्चों के मन में सेंध लगानी होगी
31 अगस्त ,2009,प्रगति मैदान का प्रगति ऑडिटोरियम, अवसर दिल्ली पुस्तक मेला । नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया ने विचार गोष्ठी-‘बच्चों के लिए पुस्तकों का लेखन ,चित्रांकन ,विपणन : वर्त्तमान चुनौतियाँ’ का आयोजन किया । गोष्ठी की अध्यक्षता देवेन्द्र मेवाड़ी ने की ।विचार गोष्ठी में अलका पाठक , मधु पन्त , और दिनेश मिश्र ने अपने विचार प्रकट किए ।साथ ही ‘सौर मण्डल की सैर’( लेखक-देवेन्द्र मेवाड़ी, चित्रांकन-अरूप गुप्ता ),हमारे जल -पक्षी ( राजेश्वर प्रसाद नारायण सिंह),अंजाम (मौलवी क़मर अब्बास,चित्रांकन:हाज़ी बिन सुहेल)पुस्तकों का लोकार्पण किया गया। पुस्तक लोकार्पण विभिन्न विद्यालयों के बच्चों ने किया ।
नेशनल बुक ट्रस्ट इण्डिया के सम्पादक श्री मानस रंजन महापात्र कई महीने से विचार गोष्ठी के माध्यम से वैचारिक जाग्रति का अभ्यान चलाए हुए हैं । आपने विषय का प्रवर्तन करते हुए कहा कि बच्चों के लिए कुछ करें। वक्ताओं का आह्वान करने से पूर्व आज की विचार गोष्ठी के संचालक श्री पंकज चतुर्वेदी ने कहा –‘बच्चों का वर्ग बहुत बड़ा है,जो किताबों का पाठक है। लेखक ,चित्रकार ,प्रकाशक सब इसी उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत हैं । बचपन को याद करना बहुत सुखद होता है।सुकून देने के लिए बच्चों की एक अहम भूमिका होती है । आज जो नीतियाँ समय के साथ नहीं चल पा रही हैं , उन्हें बदलना पड़ रहा है।
श्रीमती अलका पाठक ने अपने बचपन को याद करते हुए कहा कि हमने माता-पिता से किताबें खरीदने की ज़िद की। लेखक के दायित्वबोध पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बाल साहित्य –लेखन अपने बीते हुए कल का आने हुए कल संवाद करना है । हमारे बचपन में न दैत्य थे न राजा-रानी । आज रंगरूप बदलकर वह सच, बड़ों के अधूरे सपने का बोझ बन कर आ गया है। अब वह पढ़ लेना है ,जो पढ़ा नहीं गया ।‘एक थाल मोती से भरा , सबके सिर पर औंधा धरा । चारों ओर वह थाली फिरे ,मोती उससे एक न गिरे।’ का आसमान शहर में कहाँ है? बाल साहित्य में जानवर पात्र हैं ,पर मानव की तरह चालाक हैं ।बच्चों की दुनिया में चाचा चौधरी भी आ टपकते हैं । ‘नदी की धारा में नानू की नाव’ चल पड़ती है ।बच्चों के पास समय की कमी है लेकिन सपनों की कमी नहीं है। बालगीत ,खेलगीत कहीं पीछे रह गए हैं। बच्चों को पढ़ने के लिए दिया गया है,उसमें कहा क्या गया है; यह महत्त्वपूर्ण है । कोई भी बाल- पत्रिका बच्चों के माँ-बाप की तरह है। अन्य पत्रिकाओं में बाल साहित्य की चर्चा होती ही नहीं । ‘बरसो राम धड़ाके से ,बुढ़िया मर गई फ़ाके से’ या ‘अल्लाह मेघ दे’ जैसे जनगीत कहाँ हैं।
डॉ मधु पन्त ने कहा-‘मेरी नज़र में वह आम बच्चा रहा है जो पुस्तक पढ़ने से वंचित रह जाता है । आज का दुखद सच यह है कि बच्चे का बचपन छीनकर , उसके सपनों को तोड़कर ,उसे बोंज़ाई बनाकर छोड़ देते हैं । उसके सम्पूर्ण व्यक्तित्व के विकास की बात कहीं दूर खो जाती है । अभिभावक या शिक्षक ,आज सबके लिए चुनौतियाँ हैं। लेखक बनने के लिए बच्चों के मन में सेंध लगानी होगी, तभी वह बच्चों के लिए लिख सकेगा ।लेखक को बच्चा बनना पड़ेगा जो बहुत कठिन है; क्योंकि हमने बच्चे को असमय बूढ़ा बना दिया है। । चित्रकार को शब्दों का पूरक होना चाहिए ।आच्छा चित्रकार वह है जो अपनी संकल्पना से बच्चों को किताबों की दुनिया की सैर करा दे। किताब इतनी आकर्षक हो कि बच्चे का हाथ खुद-बखुद किताब की तरफ़ बढ़े । चित्रों की चमक ,अक्षरों का आकार, उपयुक्त दाम बच्चों को किताब खरीदने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। तालों मे बन्द किताबें कितनी बेचैन हैं , इसको महसूस करें।बच्चों की पहुँच किताबों तक बेरोकटोक होने दें।’
श्री दिनेश मिश्र ने कहा-बच्चों का साहित्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं ,वरन् पूरे समाज और सृष्टि के निर्माण की शुरूआत है ।समाज ,परिवार देश में बच्चों की स्थिति क्या है , यही पैमाना है। देश के बज़ट में शिक्षा के लिए कितना बज़ट है और उसमें बच्चों के लिए कितना खर्च किया जाता है? आपका चरित्र इससे भी तय होता है कि आप उसे खर्च कैसे करते हैं? जो समाज बच्चों की अनदेखी करता है , वह अपने भविष्य को नष्ट कर रहा है। हमारे समाज में इस आत्मघाती प्रवृत्ति के सभी लक्षण मौज़ूद हैं। बाल-साहित्य लेखन के लिए समर्पण ज़रूरी है । बाल-साहित्य लेखन आपके लेखन के केन्द्र में है या ‘बाल –साहित्य भी लिखते हैं’ में अन्तर है । ‘यह है तो मैं हूँ , यह नही है तो मैं नहीं हूँ।’की सोच ज़रूरी है।बाल साहित्य देश की आवश्यकता है ; मेहरबानी नहीं है। बाल साहित्य में उपदेश नहीं होना चाहिए ; लेकिन केवल मनोरंजन ही हो, उचित नहीं है ।दिमाग के लिए भी खुराक होनी चाहिए । सही –गलत का विवेक भी होना चाहिए ।यदि ऐसा हो गया तो समझो आधी लड़ाई जीत ली।फ़ायदे की सुनामी से बचकर नेशनल नेटवर्क बनाया जाना चाहिए। सरकार यह कर सकती है, क्योंकि सरकार बेबस भले ही नज़र आए ,परन्तु होती नहीं ।मॉल बने तो वहाँ किताबों की दूकान भी हो । जब उपहार देने का मौका हो , किताबें दी जाएँ।बाल साहित्य मानवता का भविष्य है।
अध्यक्षीय भाषण में श्री देवेन्द्र मेवाड़ी ने कहा –हमने चिड़ियाँ , कलियाँ , बादल , नदियाँ झरने ,हवाएँ , देखे हैं । चीड़ के बीज गिरते देखे हैं।लेखकीय दायित्व पर अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि बच्चे से पूरी आत्मीयता महसूस करके लेखक को एक प्रकार से परकाया –प्रवेश करना पड़ता है । लेखक अपने में बच्चे को जीवित करेगा , तभी वह सार्थक सर्जन कर पाएगा । इस लेखन में चित्रकार भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण है ।वह लेखक की कल्पना के बिम्बों को आकार ही नही देता वरन् चित्र के रूप में अनुवाद करता है ।माँ-बाप अपनी दमित इच्छाएँ बच्चे पर न लादें।बच्चे में सहजभाव से बढ़ने की अपार सम्भावनाएँ होती हैं। हमारी भाषाओं में हैरी पॉटर से भी अधिक उत्कृष्ट साहित्य है , उसे सामने लाया जाए।
दूसरे सत्र में पुस्तक –लोकार्पण का अभिनव प्रयोग किया गया ।सभि पुस्तकों का लोकार्पण विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थियों द्वारा कराया गया । अन्तर्राष्ट्रीय खगोल वर्ष 2009 के अवसर पर ‘सौर मण्डल की सैर’ के लेखक और चित्रकार तथा ‘अंजाम’ के चित्रकार भी इस वसर पर मौजूद थे ।इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी उपलब्धि थी इन पुस्तकों पर पढ़ी गई समीक्षा। ‘अंजाम’ (उर्दू पुस्तक)पर अमीना ने ‘सौर मण्डल की सैर’पर –खुशबू ,अनीता सपना चौधरी ,पूर्णिमा यादव राक्या परवीन ने ; ‘हमारे जल -पक्षी’ पर सेवानिवृत्त शिक्षिका श्रीमती विमला सचदेव की प्रेरणा से कमल ,हसीना ,नाज़,राधा , रेणु ने समीक्षाएँ प्रस्तुत कीं ।
श्री मानस रंजन महापात्र जी ने सबके प्रति आभार व्यक्त किया । इस प्रकार के सार्थक कार्यक्र्म की प्रस्तुति के लिए ‘नेशनल बुक ट्रस्ट’ और इसकी कर्मठ टीम ‘बधाई के पात्र हैं।
-प्रस्तुति- रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
rdkamboj@gmail.com

Friday, August 21, 2009

शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया

शिक्षकों के लिए ई-मंच - टीचर्स आफ इंडिया 
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि शिक्षक हमारी शिक्षा व्‍यवस्‍था के हृदय हैं। शिक्षा को अगर बेहतर बनाना है तो शिक्षण विधियों के साथ-साथ शिक्षकों को भी इस हेतु पेशेवर रूप से सक्षम तथा बौद्धिक रूप से सम्‍पन्‍न बनाए जाने की जरूरत है।

राष्‍ट्रीय पाठ्यचर्या 2005 में भी शिक्षक की भूमिका पर विशेष रूप से चर्चा की गई है। इसमें कहा गया है कि शिक्षक बहुमुखी संदर्भों में काम करते हैं। शिक्षक को शिक्षा के संदर्भों,विद्यार्थियों की अलग-अलग पृष्‍ठभूमियों,वृहत राष्‍ट्रीय और खगोलीय संदर्भों,समानता,सामाजिक न्‍याय, लिंग समानता आदि के उत्‍कृष्‍ठता लक्ष्‍यों और राष्‍ट्रीय चिंताओं के प्रति ज्‍यादा संवेदनशील और जवाबदेह होना चाहिए। इन अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए आवश्‍यक है कि शिक्षक-शिक्षा में ऐसे तत्‍वों का समावेश हो जो उन्‍हें इसके लिए सक्षम बना सके।

इसके लिए हर स्‍तर पर तरह-तरह के प्रयास करने होंगे। टीचर्स आफ इंडिया पोर्टल ऐसा ही एक प्रयास है। गुणवत्‍ता पूर्ण शिक्षा की प्राप्ति के लिए कार्यरत अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन (एपीएफ) ने इसकी शुरुआत की है। महामहिम राष्‍ट्रपति महोदया श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने वर्ष 2008 में शिक्षक दिवस इसका शुभांरभ किया था। यह हिन्‍दी,कन्‍नड़, तमिल,तेलुगू ,मराठी,उडि़या, गुजराती ‍तथा अंग्रेजी में है। जल्‍द ही मलयालम,पंजाबी,बंगाली और उर्दू में भी शुरू करने की योजना है। पोर्टल राष्‍ट्रीय ज्ञान आयोग द्वारा समर्थित है। इसे आप www.teachersofindia.org पर जाकर देख सकते हैं। यह सुविधा नि:शुल्‍क है।

क्‍या है पोर्टल में !

इस पोर्टल में क्‍या है इसकी एक झलक यहाँ प्रस्‍तुत है। Teachers of India.org शिक्षकों के लिए एक ऐसी जगह है जहाँ वे अपनी पेशेवर क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं। पोर्टल शिक्षकों के लिए-

1. एक ऐसा मंच है, जहां वे विभिन्‍न विषयों, भाषाओं और राज्‍यों के शिक्षकों से संवाद कर सकते हैं।

2. ऐसे मौके उपलब्‍ध कराता है, जिससे वे देश भर के शिक्षकों के साथ विभिन्‍न शैक्षणिक विधियों और उनके विभिन्‍न पहुलओं पर अपने विचारों, अनुभवों का आदान-प्रदान कर सकते हैं।

3. शैक्षिक नवाचार,शिक्षा से सम्बंधित जानकारियों और स्रोतों को दुनिया भर से विभिन्‍न भारतीय भाषाओं में उन तक लाता है।

Teachers of India.org शिक्षकों को अपने मत अभिव्‍यक्‍त करने के लिए मंच भी देता है। शिक्षक अपने शैक्षणिक जीवन के किसी भी विषय पर अपने विचारों को पोर्टल पर रख सकते हैं। पोर्टल के लिए सामग्री भेज सकते हैं। यह सामग्री शिक्षण विधियों, स्‍कूल के अनुभवों, आजमाए गए शैक्षिक नवाचारों या नए विचारों के बारे में हो सकती है।

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शिक्षक विभिन्न स्‍तम्‍भों के माध्‍यम से पोर्टल पर भागीदारी कर सकते हैं।

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Saturday, August 15, 2009

जागरूक भारत



रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
  धर्मान्धता संक्रामक रोग है , मतान्धता विष है , जातिवाद पागलपन है , क्षेत्रीयतावाद राष्ट्र की जड़ों को खोखला करने वाला घुन है और भ्रष्टाचार इन सबका बाप है । स्वयं को श्रेष्ठ न होते हुए भी श्रेष्ट होने की भावना इन मरणान्तक व्याधियों को बढ़ावा देती है । ये सभी व्याधियाँ राष्ट्र को कमज़ोर करती हैं ।
  चुनाव के समय इनका असली प्रकोप देखा जा सकता है । अच्छे लोकतन्त्र के लिए ये सबसे बड़ा खतरा हैं । इनका सहारा लेकर जब तक वोट माँगने का सिलसिला बरकरार रहेगा ; तब तक ये राष्ट्र को कुतरते रहेंगे । इस अवसर पर जैसे भी जीत मिले ; उसी तरह के हथकण्डे अपनाए जाते हैं ।
  आर्थिक शक्तियाँ कुछ लोगों तक सीमित होती जा रही हैं ।भ्रष्टाचार शिष्टाचार का स्थान लेता जा रहा है । शिक्षा समर्पित लोगों के हाथ में न होकर व्यापारियों के हाथ में चली गई है ।यह ख़तरा देश का सबसे बड़ा ख़तरा है । भू माफिया की तरह शिक्षा माफिया का उदय इस सदी की सबसे बड़ी विडम्बना और अभिशाप हैं । भारत की बौद्धिक सम्पदा का एक बड़ा भाग उच्च शिक्षा से निकट भविष्य में वंचित होने वाला है । इसका कारण बनेंगी लूट का खेल खेलनेवाली धनपिपासु शिक्षा संस्थाएँ; जहाँ शिक्षा दिलाने की औक़ात भारत के ईमानदार 'ए' श्रेणी के अधिकारी के बूते से भी बाहर हो रही है । सामान्यजन किस खेत की मूली है ।
  एक वर्ग वह है जो सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं को अपनी तिकड़म से पलीता लगाने में माहिर है । वह सारी सुविधाओं को आवारा साँड की तरह चर जाता है । तटस्थ रहकर काम नहीं चल सकता । हमें समय रहते चेतना होगा; अन्यथा हम भी बराबर के कसूरवार होंगे । समृद्ध भारत के लिए हमें सबसे पहले जागरूक भारत बनाना होगा । सोया हुआ
उदासीन भारत सब प्रकार की कमज़ोरियों का कारण न बने ; हमें यह प्रयास करना होगा । हमें आन्तरिक षड़यन्त्रों पर काबू पाना होगा; तभी हम देश के बाहरी दुश्मनों का मुकाबला कर सकते हैं । हम यह बात गाँठ बाँध लें कि कोई देश किसी का सगा नहीं होता , सगा होता है उनका राष्ट्रीय हित । हम राष्ट्रीय हितों की बलि देकर सम्बन्ध बनाएँगे तो धोखा खाएँगे, जैसा अतीत में खाते रहे हैं ।
15 अगस्त 09


Wednesday, July 15, 2009

भावना का फल




भावना का फल

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

अँधेरी रात थी । हाथ को हाथ नहीं सूझता था ।एक बूढ़ा साधु गाँव में पहुँचा । वह थककर चूर हो चुका था ।जिसका घर सबसे पहले पड़ेगा; वहीं रुकना ठीक रहेगा- उसने सोचा । सामने ही एक बहुत बड़ा मकान था ।उसने दरवाज़ा खटखटाया ।एक भारी-भरकम आदमी निकलकर आया –“क्यों क्या बात है ? किससे मिलना है ? क्या काम है ?

मुसाफ़िर हूँ ।रात भर ठहरना चाहता हूँ ।थक गया हूँ ।सुबह होते ही चला जाऊँगा।

सुबह होते ही चला जाऊँगा- मोटा आदमी मिनमिनाया-जाओ ! अपना रास्ता नापो ले आते हैं चोर-उचक्के साधु बनकर -और उसने भड़ाक् से दरवाज़ा बन्द कर लिया। दरवाज़ा बन्द करने वाले थे सेठ मगन लाल। इनके यहाँ कोई खास रिश्तेदार भी आ जाए तो उसे जितने दिन खिलाते-पिलाते, उतने दिन का किश्तों में उपवास ज़रूर रखते थे।

साधु आगे बढ़ा ।एक खण्डरनुमा घर में दिया टिमटिमा रहा था । दरवाज़ा खटखटाया तो एक कमज़ोर औरत ने दरवाज़ा खोला । साधु ने अँधेरा होने की बात की तो वह बोली –“आइए महाराज !इसे अपना ही घर समझिए।

घर में जो रूखा सूखा था, औरत ने साधु को आग्रहपूर्वक खिलाया । साधु की दृष्टि घर की हालत को परख रही थी । औरत बोली- मेरे पति कई साल पहले स्वर्ग सिधार गए ।थोड़ी-बहुत मेहनत मज़दूरी करती हूँ । उसी से घर चलता है । आपका ज़्यादा स्वागत सत्कार नहीं कर पाई। बच्चे भी छोटे-छोटे हैं ।इन्हें भी अच्छा खिला-पिला नहीं सकती । आपको इस घर में दिक्कत हो तो माफ़ करना।

सुबह साधु जब चलने लगा तो बोला-तुम सुबह के समय जो काम करने लगोगी , वही शाम तक करती रहोगी।औरत कुछ नहीं समझी । साधु अपनी राह निकल गया ।

वह उठी और बच्चों के लिए कुर्ता सिलने के लिए कपड़ा नापने लगी ।शाम तक कपड़ा ही नापती रह गई घर में कपड़े का ढेर लग गया । कपड़ा कई हज़ार का रहा होगा । वह उस कपड़े को बेचकर बरसों तक घर का खर्च चला सकती थी ।

सेठ मगनलाल के कानों में यह भनक पड़ी तो वह उतावला हो उठा और इस रहस्य का पता लगाने लगा ।

साधु कि बात सुनकर वह बहुत पछताया । उसने अपने दो नौकर साधु को ढूँढने के लिए पीछे-पीछे दौड़ा दिए ।अगले दिन वह साधु दूर के गाँव में मिला । आग्रह करके दोनों नौकर साधु को वापस ले आए। सेठ ने उसको खूब खिलाया पिलाया। साधु कई दिन तक सेठ के यहाँ खूब खाता-पीता रहा ।सेठ मन ही मन बहुत कुढ़ता रहा , पर बोला कुछ नहीं।जब साधु चलने लगा तो सेठ से बोला-तुम सुबह ही जो करने लगोगे ,शाम तक करते रहोगे-सुनकर सेठ की आँखें खुशी से चमक उठीं।

साधु कुछ ही दूर गया होगा कि सेठ के बगीचे में एक गधा घुस गया । सेठ का सहज क्रोध जाग उठा । गधे की इतनी हिम्मत कि बगीचे में आ घुसे !। वह गधे को निकालने के लिए दौड़कर गया । गधा उसे देखकर भागा ।सेठ भी पीछे पीछे दौड़ा ।गधा भी कभी इस गली में तो कभी उस गली में घुस जाता । सेठ जी भी पीछे पीछे ।

गाँव के सब लोग हँस रहे थे ; परन्तु सेठ को इसकी फ़िक्र नहीं थी ।वह थककर चूर हो गया ।दम निकला जा रहा था ।थकने के कारण गधा भी धीरे-धीरे चलने लगा ।सेठ ने भी रफ़्तार कम कर दी। सूर्यास्त होने तक सेठ जी उसके पीछे घूमते रहे । गधा गिर पड़ा ।सेठ जी भी बेदम होकर उसके पैरों के पास गिर पड़े ।




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ऊँटों का बटवारा


ऊँटों का बटवारा

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

गाँव में एक ज़मीदार रहता था ।उसके तीन बेटे थे । मरते समय उसने अपने तीनों बेटों को पास बुलाकर कहा –“मेरे पास सतरह ऊँट हैं ।इन्हें तुम आपस में बाँट लेना ।इतना ध्यान रहे कि किसी को भी उसके निर्धारित भाग से कम न मिले । बड़ा आधे ऊँट रख ले ।मँझला एक तिहाई और सबसे छोटा कुल ऊँटों का नौवाँ हिस्सा। बड़े के हिस्से में आधे ऊँट आते थे अर्थात् 8½ ऊँट ।वह ऊँट किस प्रकार ले ?आठ वह ले नहीं सकता था ।

मँझले के सामने भी यही परेशानी थी ।उसके हिस्से में छह ऊँट से कुछ कम आते थे । छोटे बेटे के हिस्से में दो ऊँट से कुछ कम , पूरे दो ऊँट भी नहीं । कई दिनों तक कुछ फ़ैसला नहीं हो सका ।

हारकर तीनों भाई पास के गाँव वाले एक बुद्धिमान् किसान के पास पहुँचे और उसे अपनी समस्या बताई । किसान ने कहा –‘ जितना तुम्हारा भाग है , तुम्हें उससे कुछ ज़्यादा ही मिल जाएगा ।इस पर तुम्हें एक दूसरे से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए ।

सबने किसान की बात मान ली। किसान के पास एक ऊँट था ।उसने वह भी उन ऊँटों में मिला दिया । इस प्रकार अठारह ऊँट हो गए ।किसान ने सबसे पहले बड़े बेटे से कहा –“ तुम नौ ऊँट ले जा सकते हो । बस मेरा ऊँट नहीं लेना है।"
वह नौ ऊँट लेकर जल्दी से चलता बना ।
इसी प्रकार मँझले से कहा –“ तुम्हें छह ऊँट से कम मिलने थे । तुम मेरा ऊँट छोड़कर कोई छह ऊँट ले जा सकते हो।”
वह भी छह ऊँट लेकर खुशी से चलता बना ।
सबसे छोटे से कहा –“तुम दो ऊँट ले जा सकते हो।"
वह भी दो ऊँट लेकर चल दिया ।किसान का ऊँट बच गया और उनका बँटवारा भी ठीक ढंग से हो गया ।




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