मेरा आँगन

मेरा आँगन

Wednesday, July 15, 2009

भावना का फल




भावना का फल

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

अँधेरी रात थी । हाथ को हाथ नहीं सूझता था ।एक बूढ़ा साधु गाँव में पहुँचा । वह थककर चूर हो चुका था ।जिसका घर सबसे पहले पड़ेगा; वहीं रुकना ठीक रहेगा- उसने सोचा । सामने ही एक बहुत बड़ा मकान था ।उसने दरवाज़ा खटखटाया ।एक भारी-भरकम आदमी निकलकर आया –“क्यों क्या बात है ? किससे मिलना है ? क्या काम है ?

मुसाफ़िर हूँ ।रात भर ठहरना चाहता हूँ ।थक गया हूँ ।सुबह होते ही चला जाऊँगा।

सुबह होते ही चला जाऊँगा- मोटा आदमी मिनमिनाया-जाओ ! अपना रास्ता नापो ले आते हैं चोर-उचक्के साधु बनकर -और उसने भड़ाक् से दरवाज़ा बन्द कर लिया। दरवाज़ा बन्द करने वाले थे सेठ मगन लाल। इनके यहाँ कोई खास रिश्तेदार भी आ जाए तो उसे जितने दिन खिलाते-पिलाते, उतने दिन का किश्तों में उपवास ज़रूर रखते थे।

साधु आगे बढ़ा ।एक खण्डरनुमा घर में दिया टिमटिमा रहा था । दरवाज़ा खटखटाया तो एक कमज़ोर औरत ने दरवाज़ा खोला । साधु ने अँधेरा होने की बात की तो वह बोली –“आइए महाराज !इसे अपना ही घर समझिए।

घर में जो रूखा सूखा था, औरत ने साधु को आग्रहपूर्वक खिलाया । साधु की दृष्टि घर की हालत को परख रही थी । औरत बोली- मेरे पति कई साल पहले स्वर्ग सिधार गए ।थोड़ी-बहुत मेहनत मज़दूरी करती हूँ । उसी से घर चलता है । आपका ज़्यादा स्वागत सत्कार नहीं कर पाई। बच्चे भी छोटे-छोटे हैं ।इन्हें भी अच्छा खिला-पिला नहीं सकती । आपको इस घर में दिक्कत हो तो माफ़ करना।

सुबह साधु जब चलने लगा तो बोला-तुम सुबह के समय जो काम करने लगोगी , वही शाम तक करती रहोगी।औरत कुछ नहीं समझी । साधु अपनी राह निकल गया ।

वह उठी और बच्चों के लिए कुर्ता सिलने के लिए कपड़ा नापने लगी ।शाम तक कपड़ा ही नापती रह गई घर में कपड़े का ढेर लग गया । कपड़ा कई हज़ार का रहा होगा । वह उस कपड़े को बेचकर बरसों तक घर का खर्च चला सकती थी ।

सेठ मगनलाल के कानों में यह भनक पड़ी तो वह उतावला हो उठा और इस रहस्य का पता लगाने लगा ।

साधु कि बात सुनकर वह बहुत पछताया । उसने अपने दो नौकर साधु को ढूँढने के लिए पीछे-पीछे दौड़ा दिए ।अगले दिन वह साधु दूर के गाँव में मिला । आग्रह करके दोनों नौकर साधु को वापस ले आए। सेठ ने उसको खूब खिलाया पिलाया। साधु कई दिन तक सेठ के यहाँ खूब खाता-पीता रहा ।सेठ मन ही मन बहुत कुढ़ता रहा , पर बोला कुछ नहीं।जब साधु चलने लगा तो सेठ से बोला-तुम सुबह ही जो करने लगोगे ,शाम तक करते रहोगे-सुनकर सेठ की आँखें खुशी से चमक उठीं।

साधु कुछ ही दूर गया होगा कि सेठ के बगीचे में एक गधा घुस गया । सेठ का सहज क्रोध जाग उठा । गधे की इतनी हिम्मत कि बगीचे में आ घुसे !। वह गधे को निकालने के लिए दौड़कर गया । गधा उसे देखकर भागा ।सेठ भी पीछे पीछे दौड़ा ।गधा भी कभी इस गली में तो कभी उस गली में घुस जाता । सेठ जी भी पीछे पीछे ।

गाँव के सब लोग हँस रहे थे ; परन्तु सेठ को इसकी फ़िक्र नहीं थी ।वह थककर चूर हो गया ।दम निकला जा रहा था ।थकने के कारण गधा भी धीरे-धीरे चलने लगा ।सेठ ने भी रफ़्तार कम कर दी। सूर्यास्त होने तक सेठ जी उसके पीछे घूमते रहे । गधा गिर पड़ा ।सेठ जी भी बेदम होकर उसके पैरों के पास गिर पड़े ।




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ऊँटों का बटवारा


ऊँटों का बटवारा

रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

गाँव में एक ज़मीदार रहता था ।उसके तीन बेटे थे । मरते समय उसने अपने तीनों बेटों को पास बुलाकर कहा –“मेरे पास सतरह ऊँट हैं ।इन्हें तुम आपस में बाँट लेना ।इतना ध्यान रहे कि किसी को भी उसके निर्धारित भाग से कम न मिले । बड़ा आधे ऊँट रख ले ।मँझला एक तिहाई और सबसे छोटा कुल ऊँटों का नौवाँ हिस्सा। बड़े के हिस्से में आधे ऊँट आते थे अर्थात् 8½ ऊँट ।वह ऊँट किस प्रकार ले ?आठ वह ले नहीं सकता था ।

मँझले के सामने भी यही परेशानी थी ।उसके हिस्से में छह ऊँट से कुछ कम आते थे । छोटे बेटे के हिस्से में दो ऊँट से कुछ कम , पूरे दो ऊँट भी नहीं । कई दिनों तक कुछ फ़ैसला नहीं हो सका ।

हारकर तीनों भाई पास के गाँव वाले एक बुद्धिमान् किसान के पास पहुँचे और उसे अपनी समस्या बताई । किसान ने कहा –‘ जितना तुम्हारा भाग है , तुम्हें उससे कुछ ज़्यादा ही मिल जाएगा ।इस पर तुम्हें एक दूसरे से कोई शिकायत नहीं होनी चाहिए ।

सबने किसान की बात मान ली। किसान के पास एक ऊँट था ।उसने वह भी उन ऊँटों में मिला दिया । इस प्रकार अठारह ऊँट हो गए ।किसान ने सबसे पहले बड़े बेटे से कहा –“ तुम नौ ऊँट ले जा सकते हो । बस मेरा ऊँट नहीं लेना है।"
वह नौ ऊँट लेकर जल्दी से चलता बना ।
इसी प्रकार मँझले से कहा –“ तुम्हें छह ऊँट से कम मिलने थे । तुम मेरा ऊँट छोड़कर कोई छह ऊँट ले जा सकते हो।”
वह भी छह ऊँट लेकर खुशी से चलता बना ।
सबसे छोटे से कहा –“तुम दो ऊँट ले जा सकते हो।"
वह भी दो ऊँट लेकर चल दिया ।किसान का ऊँट बच गया और उनका बँटवारा भी ठीक ढंग से हो गया ।




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Thursday, June 18, 2009

महत्त्वपूर्ण पत्रिकाएँ








ड्रीम 2007
एक अंक : 5 रुपए
सम्पादक :डॉ वी बी काम्बले
हिन्दी और अंग्रेज़ी में प्रकाशित होने वाली विज्ञान की महत्त्वपूर्ण पत्रिका है । इसमें प्रत्येक लेख दोनों भाषाओं में प्रकाशित किया जाता है ।विज्ञान में रुचि रखने वाले अध्यापकों एवं छात्रों के लिए एक ज़रूरी पत्रिका है । यह पत्रिका रटने के बजाय व्यावहारिक ज्ञान एवं वैज्ञानिक अभिरुचि को प्रोत्साहित करती है । विज्ञान को रोचक ढंग से प्रस्तुत करना इस पत्रिका का प्रमुख उद्देश्य है ।00000
विपनेट संवाद[ VIPNET NEWS ]
मूल्य :दो रुपए

सम्पादक : बी के त्यागी
सहायक सम्पादक : निमिष कपूर
इस संवाद पत्रिका में विज्ञान क्लब के समाचार और गतिविधियों की जानकारी रहती है ।इस समाचार पत्रिका में हिन्दी और अंग्रेजी में महत्त्वपूर्ण लेख एवं रोचक पहेलियाँ भी रहती हैं। विद्यालयों को भारत सरकार के इस पवित्र कार्य से ज़रूर जुड़ना चाहिए ।
पत्रिकाओं के मिलने का पता:-

विज्ञान प्रसार,सी-24 , कुतुब इंस्टीट्यूशनल एरिया, नई दिल्ली-110016
Vigyan Prasar ,C-24, Qutub Institutional Area New Delhi 110016
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प्रस्तुति-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Wednesday, June 3, 2009

पुस्तक समीक्षा


मास्टर जी ने कहा था :कमल चोपड़ा

ए आर एस पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स

1362, कश्मीरी गेट,

दिल्ली – 110 006


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इस बाल उपन्यास में एक ऐसे शरारती लड़के की कहानी है जिसका नाम किन्नू है। किन्नू अपने माँबाप की इकलौती संतान है। पिता गाँव के जमींदार हैं। रूप्एपैसे वाले आदमी हैं। गाँव में उनका बड़ा रौब है। इसी कारण अक्सर लोग उनसे घबराते कतराते हैं।

बेटा किन्नू अपने पिता के नक्शेकदम पर चल रहा था। गांव की पाठशाला में आए दिन अपने सहपाठियों को तंग करता था। उसको यह सब करना अच्छा लगता था। चाहे किसी का दिल दुखे, इसकी परवाह वह नहीं करता था। आए दिन कक्षा अध्यापक से उलझ जाता। पिटाई खाता और अध्यापक से बदला लेने की फिराक में रहता है ।

अध्यापक हमेशा उसे सुधर जाने की नसीहत देते। पर वह तो चिकना घड़ा था। इस कान से सुनता और दूसरे कान से अनसुना कर निकल जाता।

किन्नू की शरारत के कारण ही अध्यापक को स्कूल छोड़ना पड़ा। स्कूल किन्नू के पिता की दान राशि पर चलता था।

अचानक किन्नू के घर आग गई। माँबाप घर में फँस गए। पिता को लोग बचा नहीं पाए। माँ अकेली रह गई। किन्नू पढ़ालिखा नहीं था। मुनीम ने जमीनजायदाद पर कब्जा कर लिया। हार कर किन्नू शहर आ गया। किन्नू कई मुसीबतों में घिरा, अत्याचार भी सहा, ऐसे में उसे एक अपाहिज लड़की मिली जिसने किन्नू को भाई माना। किन्नू को समझ में आने लगा था कि काश उसने पढ़ाई को गंभीरता से लिया होता ! पुस्तक में कई रोचक प्रसंग हैं। लेखक की शैली वाकई प्रभावशाली है। पुस्तक का चित्रांकन सुन्दर है।

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-ललित किशोर मंडोरा

Monday, June 1, 2009

हर कदम परीक्षा



कमल चोपड़ा
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काम की तलाश में इधर–उधर धक्के खाने के बाद निराश होकर मधुकांत घर लौटने लगा तो पीछे से आवाज आई, ‘ऐ भाई, यहाँ कोई मजदूर मिलेगा क्या?’
मधुकांत ने मुड़कर देखा तो एक झुकी हुई कमर वाला बूढ़ा तीन गठरियाँ उठाए हुए खड़ा है। मधुकांत ने कहा, ‘‘हाँ बोलो क्या काम है? मैं ही मजदूरी कर लूँगा।’’
मुझे रामपुर जाना है....। दो गठरियाँ मैं उठा लूँगा पर.... मेरी एक गठरी रामपुर पहुँचवा दो, दो रूपए दूँगा। बोलो मंजूर है।
ठीक है। चलो.... आप बुजुर्ग हैं। आपकी इतनी मदद करना तो मैं यों भी फर्ज समझता हूँ।
मधुकांत ने गठरी उठाते हुए कहा, ‘चलिये काफी भारी गठरी है।’
‘हाँ.... इसमें एक–एक रुपये के सिक्के हैं।’ बूढ़े ने फुसफुसाते हुए कहा।
मधुकांत ने सुना तो सोचा, ‘होंगे मुझे क्या? मुझे तो अपनी मजदूरी से मतलब है।ये सिक्के कितने दिन चलेंगे? मधुकांत ने देखा, बूढ़ा उस पर नजर रखे हुए है। उसने सोचा ‘ये सोच रहा होगा कहीं ये भाग ही न जाए। पर मैं ऐसी बेईमानी और चोरी करने में विश्वास नहीं करता। मैं सिक्कों के लालच में फंसकर किसी के साथ बेईमानी नहीं करूँगा।
चलते–चलते आगे एक नदी आ गई। मधुकांत तो नदी पार करने के लिए झट से पानी में उतर गया पर बूढ़ा नदी के किनारे खड़ा रहा। मधुकांत ने कहा.....क्या हुआ? रूक क्यों गए?
‘बूढ़ा आदमी हूँ।’ मेरी कमर ऊपर से झुकी हुई है। दो–दो गठरियों का बोझ नहीं उठा सकता....कहीं मैं नदी में डूब ही ना जाऊँ। तुम एक गठरी और उठा लो....‘मजदूर एक रुपया और ले लेना।’
‘ठीक है लाओ।’
‘पर इसे लेकर कहीं तुम भाग तो नहीं जाओगे?’
‘क्यों, मैं क्यों भागूँगा?’
‘‘इसमें चाँदी के सिक्के हैं’
‘‘मैं आपको ऐसा चोर बेईमान दीखता हूं क्या?... बेफिक्र रहें मैं चांदी के सिक्कों के लालच में किसी को धोखा देने वालों में से नहीं हूँ.... लाइए ये गठरी मुझे दे दीजिये।’
दूसरी गठरी उठाकर मधुकांत ने नदी पार कर ली। चांदी के सिक्कों का लालच भी मधुकांत को नहीं डिगा पाया। थोड़ी दूर आगे चलने के बाद सामने एक पहाड़ी आ गई।
मधुकांत धीरे–धीरे पहाड़ी पर चढ़ने लगा लेकिन बूढ़ा अभी नीचे ही रूका हुआ था। मधुकांत ने कहा, ‘आइये ना, रुक क्यों गये?’’
‘‘मैं बूढ़ा आदमी हूं। ठीक से चल तो पाता नहीं हूँ , ऊपर से कमर पर एक गठरी का बोझ और उसके भी ऊपर पहाड़ी की दुर्ग चढ़ाई।’’
‘‘तो लाइये ये गठरी भी मुझे दे दीजिये। बेशक और मजदूरी भी मत देना।’’
‘‘पर इसे कैसे दे दूं? इसमें सोने के सिक्के हैं और अगर तुम लेकर भाग गए तो मैं बूढ़ा तुम्हारे पीछे भाग भी नहीं पाऊँगा।’’
‘‘बाबा मैं ऐसा आदमी नहीं हूं। ईमानदारी के चक्कर में ही तो मुझे मजदूरी करनी पड़ रही है वरना पहले मैं एक लाला जी के यहां मुनीम की नौकरी करता था। लालाजी मुझसे हिसाब में गड़बड़ करके लोगों को ठगने को कहते थे। मैंने ऐसा करने से मना कर दिया और नौकरी छोड़ कर चला आया।’ मधुकांत ने यों ही गप हाँकी।
‘‘पता नहीं तुम सच कह रहे हो या.....। खैर उठा लो ये सोने के सिक्कों वाली तीसरी गठरी भी। मैं धीरे–धीरे आता हूं। तुम मुझसे पहले पहाड़ी पार कर लो तो दूसरी तरफ नीचे रूककर मेरा इंतजार करना।’
मधुकांत सोने के सिक्कों वाली गठरी उठाकर चल पड़ा। बूढ़ा बहुत पीछे रह गया था। मधुकांत के दिमाग में आया, ‘अगर मैं भाग जाऊँ तो ये बूढ़ा तो मुझे पकड़ नहीं सकता और मैं एक झटके में मालामाल हो जाऊँगा। मेरी पत्नी जो मुझे रोज कोसती रहती है कितना खुश हो जाएगी। इतनी आसानी से मिलने वाली दौलत ठुकराना भी बेवकूफी है..... एक ही झटके में धनवान हो जाऊँगा। पैसा होगा तो इज्जत ऐश–आराम सब कुछ मिलेगा मुझे....।
मधुकांत के दिल में लालच आ गया और बिना पीछे देखे भाग खड़ा हुआ। तीन–तीन भारी गठरियों का बोझ उठाए–उठाए भागते–भागते उसकी साँस फूल गई।
घर पहुँचकर उसने गठरियां खोलकर देखीं तो अपना सिर पीटकर रह गया। गठरियों में सिक्कों जैसे बने हुए मिट्टी के ढेले ही थे। मधुकांत सोच में पड़ गया कि बूढ़े को इस तरह नाटक करने की जरूरत ही क्या थी। तभी उसकी पत्नी को मिट्टी के सिक्कों के ढेर से एक कागज मिला जिस पर लिखा था, यह नाटक इस राज्य के खजाने की सुरक्षा के लिए ईमानदार सुरक्षा मंत्री खोजने के लिए किया गया। परीक्षा लेने वाला बूढ़ा और कोई नहीं स्वयं महाराज ही थे। अगर तुम भाग न निकलते तो तुम्हें मंत्रिपद और मान सम्मान सब कुछ मिलता पर.....।
मधुकांत अपना सिर पीटकर रह गया, ‘मैं लालच ना करता तो मेरा ये जीवन की सफल हो जाता। कुछ नहीं तो कम से कम मजदूरी तो मिलती पर अब.... अब दोबारा जाऊँ या किसी को बताऊँ तो पकड़ा जाऊँगा।
अगले दिन उसे पता चला कि उस परीक्षा में और कोई नहीं मधुकांत का ही बचपन का दोस्त सत्यव्रत सफल हुआ है। मारे जलन के मधुकांत अपने बाल नोचकर रह गया। फिर भी वह अपने दोस्त सत्यव्रत को बधाई देने गया तो वह बोला – ‘‘भाई मेरा तो ख्याल है कि हर आदमी को हर वक्त अपनी ईमानदारी से काम करना चाहिए। ना जाने कब कहाँ कौन किसकी परीक्षा ले रहा हो और परीक्षा में सफल होकर कब किसकी जिन्दगी ही बदल जाए। जैसा कि मेरे साथ हुआ।


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कमल चोपड़ा
1600/114, त्रिनगर,
दिल्ली – 110035.

Friday, May 15, 2009

परिचय:श्याम सुन्दर अग्रवाल



जन्म: 8 फरवरी 1950 को कोट कपूरा (पंजाब) में।
शिक्षा: बी.ए.
लेखन: लघुकथा, बालकथा व कविता (पंजाबी एवं हिंदी में)
प्रकाशित कृतियां:
मौलिक
‘नंगे लोकां दा फिक्र‘ व ‘मारूथल दे वासी’ लघुकथा संग्रह पंजाबी में।
अनुवाद
‘डरे होए लोक’, ‘ठंडी रजाई’(सुकेश साहनी), ‘आखरी सच्च’(डा. सतीश दुबे)
व ‘सिर्फ इंसान’(डा. कमल चोपड़ा) लघुकथाओं का हिंदी से पंजाबी में
अनुवाद। इन के अतिरिक्त हिंदी से पंजाबी व पंजाबी से हिंदी में पाँच सौ से
अधिक रचनाओं का अनुवाद।
संपादन :
•पंजाबी में 23 व हिंदी में 2 लघुकथा संकलनों का संपादन।
•नवसाक्षरों के लिए लोक कथाओं के दो संकलनों का संपादन।
•पंजाबी त्रैमासिक ‘मिन्नी’ का 20 वर्षों से संपादन ।

•••
पंजाब लोक निर्माण से सेवा-निवृत्त
संपर्क: बी-I/575, गली नं. 5, प्रताप सिंह नगर, कोट कपूरा(पंजाब)-151204
दूरभाष: 01635-222517 / 320615 मोबाइल: 09888536437
E.Mail: sundershyam60@gmail.com
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नहीं व्यर्थ बहाओ पानी



श्याम सुन्दर अग्रवाल

सदा हमें समझाए नानी,
नहीं व्यर्थ बहाओ पानी ।
हुआ समाप्त अगर धरा से,
मिट जायेगी ये ज़िंदगानी ।
नहीं उगेगा दाना-दुनका,
हो जायेंगे खेत वीरान ।
उपजाऊ जो लगती धरती,
बन जायेगी रेगिस्तान ।
हरी-भरी जहाँ होती धरती,
वहीं आते बादल उपकारी ।
खूब गरजते, खूब चमकते,
और करते वर्षा भारी ।
हरा-भरा रखो इस जग को,
वृक्ष तुम खूब लगाओ ।
पानी है अनमोल रत्न,
तुम एक-एक बूँद बचाओ ।
-0-

E.Mail: sundershyam60@gmail.com

चिड़िया


श्याम सुन्दर अग्रवाल

सुबह-सवेरे आती चिड़िया,
आकर मुझे जगाती चिड़िया ।
ऊपर बैठ मुंडेर पर,
चीं-चीं, चूँ-चूँ गाती चिड़िया ।
जाना है,नहीं स्कूल उसे
न ही दफ्तर जाती चिड़िया ।
फिर भी सदा समय से आती,
आलस नहीं दिखाती चिड़िया ।
थोड़ा सा चुग्गा लेकर भी,
दिन भर पंख फैलाती चिड़िया ।
इससे सेहत ठीक है रखती ,
नहीं दवाई खाती चिड़िया ।
छोटी-सी है फिर भी बच्चो,
बातें कई सिखाती चिड़िया ।
रखो सदा ध्यान समय का,
सबको पाठ पढ़ाती चिड़िया ।
-0-

E.Mail: sundershyam60@gmail.com

चिड़िया और बच्चा


श्याम सुन्दर अग्रवाल


फर-फर करती आई चिड़िया,
चोंच में तिनका लाई चिड़िया।
जगह सुरक्षित उस को रख गई,
नीड़ बनाने में वह लग गई ।
एक-एक तिनका खूब सजाया,
उसने सुंदर नीड़ बनाया ।
बिस्तर जैसे नर्म गदेला,
उसमें अंडा दिया अकेला ।
सेया अंडा तो निकला बच्चा,
बड़ा ही प्यारा, बड़ा ही सच्चा।
चिड़िया चोंच में दाना लाती,
डाल चोंच में उसे खिलाती ।
रोज रात को लोरी गाती,
बड़े प्यार से उसे सुलाती ।
बच्चे से बतियाती चिड़िया,
सब कुछ उसे सिखाती चिड़िया ।
उड़ना सीख वह बड़ा हो गया,
दूर गगन में कहीं खो गया ।
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संपर्क: बी-I/575, गली नं. 5, प्रताप सिंह नगर,
कोट कपूरा(पंजाब)-151204

E.Mail: sundershyam60@gmail.com

मदन का भाई नन्दू


कमल चोपड़ा

मदन बैलगाड़ी चलाता था। क्योंकि उसके पास नन्दू नाम का एक ही बैल था इसलिए उसने अपनी गाड़ी को थोड़ा छोटा और इस तरीके का बनवा लिया था ताकि उसे खींचने में नन्दू को कोई परेशानी न हो।
उस दिन मदन अपनी बैलगाड़ी से सेठ रामरतन के अनाज के कुछ बोरे सूर्यगढ़ की अनाज मंडी पहुंचाने जा रहा था। आधे रास्ते पहुँचकर उस के बैल नन्दू की तबीयत खराब हो गई। मदन अपने बैल नन्दू को अपने भाई जैसा मानता था। नन्दू को गाड़ी खींचने में बहुत मुश्किल हो रही थी। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। मदन ने उसे रुकने के लिए कहा लेकिन नन्दू किसी तरह धीरे–धीरे चलने की कोशिश करता रहा।
नन्दू को लड़खड़ाता देख मदन ने गुस्से में उसे रुकने के लिए कहा। नन्दू रुक गया।
गाड़ी से उतरकर मदन ने नन्दू को छू कर देखा – अरे तुझे तो बुखार है? और तू है कि .......? मदन ने उसे गाड़ी से खोला और नजदीक के एक पेड़ के नीचे आराम करने को कहा। नजदीक ही एक गाँव था। मदन गाँव से नन्दू के लिये चारा और बाल्टी में पानी ले आया। नन्दू ने थोड़ा सा पानी पिया। थोड़ा सा चारा खाया फिर छोड़ दिया। मदन ने उसे हाथ से सहलाते हुए उसकी हिम्मत बढ़ाई – अरे, कुछ खायेगा पिएगा नहीं तो ठीक कैसे होगा? इतना बलवान हो के बुजदिलों की तरह हिम्मत छोड़ रहा है? हिम्मत रख भाई......
नन्दू बोलता नहीं था लेकिन वह मदन की सब बात समझता था। मदन भी इशारों–इशारों में नन्दू की हर बात समझ लेता था। नन्दू ने आँखों के इशारे से कहा – मुझे अपनी चिन्ता नहीं। मुझे सेठ रामरतन के माल को जल्द से जल्द मंडी पहुँचाने की चिंता है.....
– कोई बात नहीं! जान है तो जहान है! सेठ क्या कर लेगा? ज्यादा से ज्यादा हमारे भाड़े के पैसे काट लेगा या नहीं देगा। देखा जाएगा। तुझे कुछ हो गया तो? तू चिन्ता न कर मैं अभी तेरी दवा–दारू का कुछ प्रबंध करता हूँ।
थोड़ी देर बाद मदन पास के गाँव से एक वैद्य को बुला कर ले आया। वैद्य ने नन्दू को चैक किया फिर अपने झोले से निकाल कर कुछ जड़ी–बूटियाँ नन्दू को खिलाई और पचास रूपये लेकर चलता बना। रात हो गई थी दोनों पेड़ के नीचे लेट गये।
सुबह तक नन्दू की हालत और खराब हो गई थी। उससे उठकर खड़ा भी नहीं हुआ जा रहा था। वहाँ से गुजरने वाले लोग कुछ पल रुकते। नन्दू को देखते और कहते – इसकी हालत तो बहुत खराब है। इसका तो बचना मुश्किल है।
मदन की चिंता बढ़ती जा रही थी। वहाँ से गुजरने वाले एक अन्य व्यक्ति ने मदन को सलाह दी – देसी इलाज -विलाज को छोड़ो। किसी पढ़े–लिखे जानवरों के डाक्टर को दिखाओ। जानवरों के डाक्टर का पता लगाकर मदन उसे बुलाकर ले आया। डाक्टर ने नन्दू का चैक अप किया और कहा – इसे अंतड़ियों का इंफेक्शन हो गया है। जैसे इंसानों के होता है न? ऐसे ही जानवरों को भी इन्फैक्शन हो जाता है। इसे पाँच दिन तक रोज इंजेक्शन लगाने पड़ेंगे। कुछ दव।इयाँ भी देनी पड़ेंगी। मैं लिख देता हूँ। यहाँ से डेढ़ एक मील दूर अगले गाँव में दवाइयों की दुकान है वहाँ से मिल जायेंगी। सात–आठ सौ रुपये की पड़ेंगीं। सौ रुपया रोज का मेरी फीस होगी। इलाज करवाना है तो सोच लो.....?
– डाक्टर साहब, नन्दू ठीक तो हो जायेगा न?
डाक्टर साहब ने पहले मदन की ओर देखा फिर नन्दू की ओर देखा। दोनों की आँखों में आँसू थे। डाक्टर साहब धीरे से बोले – ठीक क्यों नहीं होगा। कोशिश करना हमारा कर्तव्य है। बाकी तो ऊपर वाले की मर्जी पर है। फिलहाल मैं कुछ दवाइयाँ अपने पास से दे देता हूँ। तुम शाम तक मेरी लिखी दवाइयाँ और इंजेक्शन ले आओ। मैं शाम को फिर आऊँगा। कहकर डाक्टर साहब अपनी फीस लेकर चले गये।
मदन नन्दू के पास गया तो नन्दू सिर हिला हिलाकर पूछने लगा – क्यों मेरे लिए इतना परेशान हो रहे हो? मरने दो मुझे। किराये की बैलगाड़ी लेकर माल मंडी में पहुँचा दो। मुझे यहाँ पड़ा रहने दो। वापसी में देख लेना। मैं ठीक हो गया तो ठीक वर्ना.......।
– मैं तुम्हें तुम्हारे हाल पर छोड़कर कैसे जा सकता हूँ? बीमार नहीं होते क्या लोग? इलाज से ठीक नहीं होते क्या?
– इतने पैसे कहाँ से लाओगे? इतने तो हम लोग लेकर भी नहीं चले।
– रास्ते में खाने–नहाने के लिए हम जो बाल्टी–बरतन अपने साथ लेकर चलते हैं न, मैं उन्हें बेच दूँगा। तू चिंता मत कर.....
– मेरे लिए इतना....
– क्या इतना? अपनी बार भूल गया? जब मेरे पिता हमारे सिर पर कुछ कर्ज छोड़कर गुजर गये थे और लोगों ने हमारे खेतों पर कब्जा कर लिया था। तब मैं बीमार चल रहा था। कुछ गुण्डे–लठैत हमारी झुग्गी पर भी कब्जा करने आये थे लेकिन तूने जमकर उनका मुकाबला किया था। उनकी लाठियाँ खाईं लेकिन उन्हें झुग्गी पर कब्जा नहीं करने दिया। मेरी जान बचाई। सींग मार- मारकर खदेड़ दिया था तूने? और आज मैं तुझे यों ही छोड़ दूँ? मुसीबतों में हम दोनों साथ रहे हैं और आगे भी रहेंगे! सुन लिया न!
दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे। तभी वहीं आस–पास मँडरा रहे एक आदमी ने मदन को पास बुलाया और कहा – इस बैल के लिए क्यों इतना परेशान हो रहे हो? आखिर ये है तो जानवर ही?
मदन को गुस्सा आ गया – इंसान भी तो जानवर ही है! बल्कि जानवर तो इंसान को अपना दोस्त समझते हैं और इंसान ...... पशुओं का फायदा उठाता है और बाद में उन्हें मार–काटकर के खा जाता है। इंसान जैसा निर्दय और खुदगर्ज तो कोई जानवर होगा ही नहीं!
वह आदमी हँसते हुए बोला – अरे छोड़ो – छोड़ो ये उपदेश की बातें....! और जरा बु​द्धि से काम लो..... इस बीमार बैल को मुझे एक हजार रुपयों में बेच दो और जो पैसे तुम इसके इलाज में खर्च कर रहे हो वे बच जायेंगे। मेरे दिये एक हजार रुपये और इलाज के बचे पैसों को मिलाकर मैं तुम्हें नया बैल खरीदवा देता हूँ। अपना मजे से जहाँ जाना हो जाओ।
मदन ने हैरानी से पूछा – तुम इस बीमार बैल का क्या करोगे? उस आदमी ने हँसते हुए कहा – इसे किसी कसाई को काटने के लिये दे दूँगा और क्या......।
सुनते ही मदन भड़क उठा। उस आदमी को मारने के लिए डंडा लेने अपनी बैलगाड़ी की ओर भागा। वह आदमी मदन को गुस्से में बेकाबू हुआ देखकर भाग खड़ा हुआ। वर्ना मदन इतने गुस्से में था कि उसे जान से ही मार डालता।
अगले पांच दिन तक मदन वहीं खुले में पड़ा रहा और नन्दू की सेवा करता रहा। कभी उसे दवाई खिलाता कभी चारा खिलाता। कभी उसे नहलाता। डाक्टर आता इंजेक्शन लगाता। छठे दिन नन्दू उठकर खड़ा हो गया। नन्दू के स्वस्थ हो जाने पर मदन की खुशी का ठिकाना नहीं था।
स्वस्थ होते ही नन्दू ने मदन को इशारे से कहा – अब जल्दी से चलो यहाँ से चलकर सेठ राम रतन का माल मंडी में पहुँचा दें।
मदन ने हँसते हुए कहा – सेठ रामरतन तो हमें ढूँढ रहा होगा। वो सोच रहा होगा हम दोनों उसका माल लेकर भाग गये हैं!
ज्यों ही मदन अपनी बैलगाड़ी लेकर मंडी की ओर रवाना होने लगा उसने देखा सामने से गाँव के दो तीन प्रतिष्ठित व्यक्ति चले आ रहे हैं। एक आदमी ने आगे आकर कहा – मैं इस गाँव का प्रधान हूं। मैं तुम्हारे साथ अपनी इकलौती लड़की का रिश्ता करना चाहता हूँ। मुझे तुम्हारे जैसे लड़के की ही तलाश थी। तुम्हारे गाँव अपना आदमी भेजकर मैंने तुम्हारे बारे में सब पता लगा लिया है। तुम मेहनती और ईमानदार आदमी हो। जो आदमी पशुओं से इतना प्यार कर सकता है वह मेरी बेटी को कभी धोखा नहीं देगा। तुम मंडी जा रहे हो जाओ। हम एक माह बाद खुद तुम्हारे गाँव रिश्ता लेकर आएँगे।
दोनों खुशी–खुशी मंडी की ओर चल दिये। मंडी पहुँचे तो सेठ राम रतन जैसे उनके स्वागत में ही खड़ा था। वे तो सोच रहे थे कि सेठ उन्हें देखते ही बिगड़ उठेगा और उन्हें बुरा–भला कहेगा लेकिन सेठ ने हँसते हुए कहा – तुम लोग एक सप्ताह देर से पहुँचे। अच्छा किया। तुम लोग पहले पहुँच जाते तो मेरा माल सस्ते में बिक जाता। इस बीच इधर अनाज के भाव बहुत बढ़ गये हैं। अब मैं अपना माल ऊँचे दामों पर बेचूँगा। मुझे दुगुने का फायदा हो गया है। मैं तुम्हें भी इनाम के रूप में दोगुना किराया दूँगा।
मदन ने नन्दू की ओर देखा। दोनों की खुशी का ठिकाना नहीं था।

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कमल चोपड़ा
1600/114, त्रिनगर,
दिल्ली – 110035.

Wednesday, May 13, 2009

चिन्तन के क्षण

                                      चिन्तन के क्षण

 

प्रसन्न

निराशा भले ही कुछ भी हो़, लेकिन कोई धर्म नहीं है।सदा मुस्कराते हुए प्रसन्न रहकर तुम ईश्वर के समीप पहॅंच सकते हो।क्या खोया , क्या पाया इससे ऊपर उठकर मन को सदा हल्का रखने में एक परम आनन्द है।यह काम किसी भी  प्रार्थ‍ना  से अधिक शक्तिशाली है।

क्षमा

   आत्मप्रशंसा , वैमनस्यभावना  तथा ईर्ष्या का पूर्णतया परित्याग करो।तुम सभी को धरती मॉं की तरह क्षमाशील होना चाहिए।यदि तुममें इस प्रकार की क्षमाशीलता होगी तो संसार तुम्हारे चरणों में झुक जायेगा।क्षमा न करने से जीवन की गति   अवरुद्ध हो जायेगी।

संघर्ष

    पवित्र रहने के लिए संघर्ष करते हुए समाप्त हो जाओ।हजार बार मृत्यु का स्वागत करो।निराश मत होओ।कष्ट के समय में भी धैर्य रखते हुए आशा का पल्ला मत छोड़ो। घबराकर गलत मार्ग पर मत बढ़ो। यदि अमृत प्राप्त नहीं हो सका तो कोई कारण नहीं कि विष ही पी लिया जाये।

पहचान

  प्रशस्त होने का प्रयत्न करो।याद रखो  गति और प्रगति में ही जीवन है।लेकिन जीवन में गति और प्रगति आती हैविनम्रता  , कृतज्ञता और अपने उपकारी के प्रति सच्ची भावना से।अपने कार्य के प्रति निष्ठावान रहते हुए सभी के प्रति उचित सम्मान देना भी सीखो।

संचार

शक्ति और साधन खुद प्राप्त हो जायेंगे। तुम केवल अपने आपको कार्य में रत कर दो और तब तुम्हें ज्ञात होगा कि एक जबरदस्त शक्ति तुम्हारे भीतर आ रही है। दूसरों के प्रति किया गया जरा सा काम भी हमारे भीतर शक्ति का संचार कर देता है। दूसरों के प्रति भलाई के विचार ही हमारी शक्ति के मूल साधन हैं।

                                                                                  

उदारता

          उदारता से बढ़कर कोई गुण नहीं ।नीचतम मनुष्य वह है जो केवल लेने के लिए हाथ बढ़ाता है।वह उच्चतम मनुष्य है जे सदा देता ही रहता है।हाथ देने के लिए ही बनाये गये हैं।भले ही तुम्हारे प्राण निकल रहे हों तो भी अपनी रोटी का अन्तिम टुकड़ा दे दो ,तुरन्त पूर्ण मनुष्य बन जाओगे।एकदम देवता।

प्रयत्न

          असफलताओं के लिए खेद मत करो।वे स्वाभाविक हैं।वे जीवन का सौन्दर्य हैं।इन असफलताओं के बिना जीवन है ही क्या ? यदि जीवन में संघर्ष नहीं है , तो वह जीवन जीने योग्य नहीं। इसलिए एक हजार बार  प्रयत्न करो और यदि एक हजार बार भी असफल रहो तो प्रयत्न और करो। 

उत्पत्ति

          कार्यशीलता एक अच्छा गुण है ; लेकिन उसकी प्राप्ति भी विचारशीलता से होती है।अत: अपने मस्तिष्क को उच्च विचारों और उच्च आदर्शों से परिपूर्ण करो।रातदिन उन्हें अपने सम्मुख रखो और स्मरण करो।फिर उनमें से अपने आप महान कार्यो की उत्पत्ति होगी।

पक्षपात

          पक्षपात को ही सभी बुराइयों की जड़ समझो।पक्षपात दूसरों के मन में अलगाव पैदा कर देता है। अलगाव पैदा होना अच्छी बात नहीं है।इससे व्यक्ति का विश्वास उठ जाता है और वह मान लेता है कि पक्षपात करने वाला अपने चरित्र से गिर गया है।अत: पक्षपात को अपने से दूर रखो तो आपदाएँ भी दूर रहेंगी।

जाग्रति

          उठो और जागो और उस वक्त तक मत रुको जब तक कि मंजिल नही मिल जाती।तुम्हारी मंजिल तुम्हें ही खोजनी है और तुम्हें ही उस तक पहुँचना है।यदि तुम यह मानकर बैठे हो कि कोई आयेगा और तुम्हारा हाथ पकड़कर तुम्हारी मंजिल की तरफ ले जायेगा तो तुम भारी भूल के शिकार हो गये हो।अपनी मंजिल की ओर तुम्हें खुद ही बढ़ना है।

विश्वास

          मैं उस धर्म और भगवान  में विश्वास नहीं रखता जो विधवा के आँसू न पोंछ सके या किसी अनाथ व भूखे तक रोटी का टुकड्रा न ले जा सके।मैं उस धर्म में भी विश्वास नहीं रखता जो किसी को सहारा न दे सके ,किसी डूबते को न बचा सके।धर्म का मूल मंत्र ही यह है कि हम दूसरों के काम आयें।

 

बुद्धिमान

          मृतक वापस नहीं लौटते ।बीती रातें फिर नहीं आतीं ।उतरी हुई लहर फिर नहीं उभरती।मनुष्य फिर से वही शरीर नहीं धारण कर सकता।इसलिए बीती हुई बातों को भूलकर वर्तमान को पूजो।नष्ट और खोई हुई शक्ति अथवा वस्तु का चिन्तन करने की अपेक्षा नये रास्ते पर चलो।जो बुद्धिमान होगा वह इस बात को अवश्य समझेगा।

पुरुषार्थ

                   पुरुषार्थ आलस्य का शत्रु है। आलस्य को हर प्रकार से रोकना चाहिए। पुरुषार्थ करते रहने का अभिप्राय है आलस्य को रोकना सभी बुराइयों को रोकना ;मानसिक व शारीरिक बु्राइयों को रोकना ।और जब तुम ये बुराइयाँ रोकने में सफल हो जाओगे, तो शान्ति और समृ​द्धि स्वयं तुम्हारे पास आ जायेगी।

परिणाम

          प्रत्येक कार्य का परिणाम अच्छाई और बुराई का मिश्रण है।कोई भी अच्छा काम नहीं जिसमें थोडी बहुत बुराई न हो।अग्नि के साथ धुएँ की तरह बुराई भी प्रत्येक कार्य में रहती है।लेकिन हमें अपनेआप को अधिक से अधिक ऐसे कामों में लगाना चाहिये जिनका अच्छा परिणाम अधिक हो और बुरा काम से कम।

विचार

          अपवित्र कल्पना और विचार भी अपवित्र कार्य की तरह बुरे हैं।नियंत्रित इच्छाएँ ही उच्च परिणाम तक पहुँचती हैं।मनुष्य अपवित्र कार्य तभी करता है जब उसके मन में अपवित्र विचार आते हैं।वे अपवित्र विचार उसे बुरे कार्य की ओर घसीट ले जाते हैं।मिर्च खाकर किसका मुँह मीठा हुआ है।

महापाप

          दूसरों की निन्दा करना महापाप है।इससे पूर्णतया बचो।अनेक बातें दिमाग में आती हैं।यदि उन्हें प्रकट करने का  प्रयत्न किया जाये तो राई का पहाड़ बन जाता है।प्रत्येक बात समाप्त हो जाती है यदि तुम चुप हो जाओ व भूल जाओ और क्षमा कर दो।निन्दा की बात पर हमें चुप रहने भूलने और क्षमा करने का गुण अपनाना चाहिए।

सन्तोष

          सुख व्यक्ति के सामने अपने सिर पर दुख का ताज पहनकर आता है।जो सुख का स्वागत करना चाहता है उसे दुख का स्वागत करने के लिए भी सदा तैयार रहना चाहिये।सुख को मात्र सुख मानकर चलने वाला भविष्य में अधिक दुखी भी हो सकता है।अत: ऐसे सुख की कामना करो जो सभी के लिए कल्याणकारी हो।

                                     

साभार: विवेक के आनन्द से

 

प्रस्तुति : चन्द्र देव राम   प्राचार्य  के वि जवाहर नगर(बिहार)

Saturday, April 25, 2009

पुस्तक-परिचय




चूहा सात पूँछों वाला (कहानी –संग्रह)
लेखक : गिजुभाई बधेका
अनुवाद , रूपान्तरण और चित्रांकन: आबिद सुरती
मूल्य:35 रुपये ,पृष्ठ :40 (आवरण पृष्ठ सहित)
प्रकाशक : नेशनल बुक ट्र्स्ट इण्डिया ,नेहरू भवन, 5 इंस्टीट्यूशनल एरिया वसन्तकुंज फेज़-2 ,नई दिल्ली-110070
गिजुभाई जी ने बरसों पहले कहानी के बारे में शिक्षकों से कहा था –“आप इन्हें रसीले ढंग से कहिए ,कहानी सुनाने के लहज़े में कहिए ।कहानी भी ऐसी चुनें ,जो बच्चों की उम्र से मेल खाती हो । भैया मेरे ,एक काम आप कभी न करना ।ये कहानियाँ आप बच्चों को रटाना नहीं।बल्कि ,पहले आप खुद अनुभव करें कि ये कहानियाँ जादू की छड़ी–सी हैं।…।पण्डित बनकर कभी कहानी नहीं सुनाना।कील की तरह बोध ठोंकने की कोशिश नहीं करना । कभी थोपना भी नहीं।”
इन पंक्तियों में कहानी सुनाने में जो उद्देश्य निहित है, वह स्पष्ट है-
1-कहानी पढ़ाने की चीज़ नहीं-कहने की चीज़ है।
2-कहानी कहने का ढंग रसीला होना चाहिए ।
3-कहानी आयु-वर्ग के अनुकूल हो ।
4- कहानी रटवाई न जाए ।
5- कहानी सुनाने में सहजता हो , पाण्डित्य प्रकट न हो ।
6- बोध कील की तरह न ठोंकना न थोपना । बोधगम्यता सहज और स्वाभाविक हो ।
बच्चों को भाषा सिखाने में कहानियों की भूमिका बहुत गहरी है । इस संग्रह में ये आठ कहानियाँ हैं ,जो अपने आप में रोचकता लिये हुए हैं –चूहा सात पूँछोंवाला,जो न बोले सो निहाल ,सौ के साठ ,चिरौटा चार सौ बीस ,किस्सा एक दाने का ,जोगी या भोगी ,फूफू बाबा ,करते हो सो कीजिए ।प्रत्येक कहानी का तेवर और स्वर अलग-अलग है ।
इन कहानियों का हिन्दी अनुवाद प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट आबिद सुरती जी ने किया है । अनुवाद अत्यन्त सरल, सहज एवं ग्राह्य है । चित्रों के साथ लोककथाओं का रंग इन्हें और रोचक बना देता है । बच्चों तक अगर ये कहानियाँ पहुँचती हैं तो नि:सन्देह भाषा के प्रति और अधिक रुचि जाग्रत होगी ।

-रामेश्वर काम्बोज’हिमांशु’

Friday, April 24, 2009

WORLD BOOK DAY(23rd April,2009)

Science Communication amongst Children : Challenges and Prospects
Dr. Manoj Patairiya
Director (Scientist 'F')
National Council. for Science & Technology Communication
Department of Science & Technology, Govt. of India
Technology Bhavan, New Mehrauli Road, New Delhi 110016 (India
)
Phone: +91-11-26537976, 26590238; Fax :26866675
Email : <mkp@nic.in> <manojpatairiya@yahoo.com>
Website : <www.dst.gov.in> <www.iscos.org>


          The World Science Report of UNESCO states, literacy understood as an everyday working knowledge of science, is as necessary as reading and writing (literacy in the commonly understood sense) for a satisfactory way of life in the modern world. Scientific literacy is necessary for there to be a capable workforce, for the economic and healthy well-being of the social fabric and every person, and for the exercise of participatory democracy. It also implies the ability to respond to the technical issues that pervade and influence our daily lives. It rather points out to the comprehension of what might be called the scientific approach, or the scientific way of conduct, or even the method of science. The major segment of these efforts is also focused upon children, as we need to them young to be able to change the country to be a nation of scientifically aware and attitudinally rational people.


          There has been a common belief more -recently that only things having commercial and economic viability will sustain in today fast advancing world that is governed and influenced by commercial and economic factors. The issue of increasing influence of commerce on scientific research and development and problems arising thereof has been the focus of the policy makers and media recently. A step ahead, the efforts directed towards science communication amongst children can someway influence the way we think and behave. Such efforts may also lead to enabling them to take informed and rational decisions in their day to day life without any bias or prejudice and that is the spirit of scientific temper.


          Most of the time, we have been debating on various aspects of communication. When a communicator tries to make it in most cases it turns out as As a contrast, when you try to make it it may turn up as or The real challenge lies in making a balance between both of them, so that it may become scientifically accurate at one hand and palatable to the children on other. Science communication may also be clearly understood in its broad perspective, technical communication and popular communication being sub-sets. More impetus is required to be on popular science communication to improve scientific literacy in the country, especially amongst young people.

         


          It emerged that technical science communication is directed towards dissemination of scientific research especially to the experts such as research papers, research journals, seminar proceedings, etc. Popular science communication has less well-defined goals. It serves the practical function of building the foundation of public awareness on which technical science communication is based but it fulfils other roles as well. It provides trustworthy knowledge about the world and out selves and it is a source of excitement. It helps us develop an attitude of critical rationality and it is a source of non-partisan expertise, a necessity in an age when governments and other organizations require scientific advice when taking many decisions. Popular science is public oriented, not proprietary. Some of its objects include, wealth creation, improving health, preserving the environment, and developing scientific attitude and so on. Society needs both kinds of science communication for its overall development.


          Developmental change emerges within specific economic, social, and ideological contexts, and in turn reshapes the thinking and working of institutions as well as individuals. Awareness and more precisely, the scientific and technological awareness can bring about these positive changes in an appropriate manner. The last two decades have been characterized by the rapid development of new scientific and technological advancements across a wide range of fields. Access to these advancements is distributed very unevenly within the country. Even people in far flung areas often lack access not only to leading edge technologies, but also modern scientific knowledge. Overcoming problems of access to these technologies and knowledge is important for economic and social growth.


          Basic sciences are attracting little talent nowadays for pursuing research and higher studies. It is a matter of grave concern that many of the science departments at undergraduate level are left with substantial number of vacant seats for lack of interest by the younger generation in science. This may lead to a crisis in the area of science and technology and so as in the area of science communication. Induction of a good quantum of talent in science and technology may explicitly or implicitly lead to enhanced scientific awareness. Incidentally, the Department of Science and Technology has recently introduced a number of fellowship schemes to attract young brilliant minds towards basic sciences, such as INSPIRE.


          Some of other challenges that come to the fore are : to arrive at a consensus over quantum of minimum science, ways and means for linking scientific awareness with education campaigns, to cope up with stereotype science education, to develop a science fun learning culture, resolving the gap! conflict between scientists and communicators, forging connecting links between scientific information and development, etc. A fine blend of scientific knowledge and a scientific bent of mind holds the key to develop a problem solving approach and create a conducive environment for the overall child development.


- Manoj Patairiya

 

Wednesday, April 22, 2009

The Blessing of Children

The Blessing of Children

 

Of all blessings we know of none greater than
the begetting of children endowed with intelligence.

 

Those who bear children of blameless character
will be untouched by evil for seven births.

 

It is said that children are a man's real wealth,
and that this wealth is determined by his deeds.

 

Far sweeter than divine nectar is simple boiled rice
stirred by the small hands of one's own child.

 

The touch of one's children is a delight to the body,
and listening to them chatter is a joy to the ear.

 

"Sweet are the sounds of the flute and the lute," say those
who have not heard the prattle of their own children.

 

A father benefits his son best by preparing him
to sit at the forefront of learned councils.

 

What pleasure it is to human beings everywhere
when their children possess knowledge surpassing their own!

 

When a mother hears her son heralded as a good and learned man,
her joy exceeds that of his joyous birth.

 

The son's duty to his father is to make the world ask,
"By what great austerities did he merit such a son?"

Presented By :Devendra Singh